# उत्तराखंड में नवरात्रि की आध्यात्मिक यात्रा, कुमाऊं और गढ़वाल के चौबीस दिव्य देवी धामों की गाथा

> हिमालयी भूभाग उत्तराखंड में स्थित 24 प्रमुख देवी धामों का विस्तृत आध्यात्मिक विवरण, जहां कुमाऊं और गढ़वाल के प्रमुख शक्तिपीठ श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

**Type:** article · **Category:** उत्तराखंड · **Published:** 2026-10-11 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-navaratri-ki-adhyatmika-yatra-kumaon-aura-garhwal-ke-chaubisa-divya-devi-dhamon-ki-gatha-46318 · **Language:** Hindi
**Tags:** उत्तराखंड देवी मंदिर, कुमाऊं शक्तिपीठ, गढ़वाल शक्तिपीठ, नवरात्रि यात्रा, नैना देवी, धारी देवी

उत्तराखंड की पावन धरती पर आध्यात्मिक चेतना का प्रवाह युगों से श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। पर्वतीय अंचलों में स्थित देवी तीर्थ न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के आधार हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और प्राचीन मान्यताओं के सजीव केंद्र भी माने जाते हैं। नवरात्रि के पावन दिनों में विशेष रूप से इन सिद्ध पीठों की यात्रा करना श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत फलदायी और कल्याणकारी माना जाता है। इस पावन धरा को दो प्रमुख सांस्कृतिक अंचलों, कुमाऊं और गढ़वाल में विभाजित देखा जाता है, और दोनों ही क्षेत्रों में बारह-बारह प्रमुख शक्तिपीठ आस्था के केंद्र बिंदु बने हुए हैं।

## कुमाऊं मंडल के बारह पावन शक्ति केंद्र
कुमाऊं अंचल में स्थित माता भगवती महाकालिका का भव्य दरबार अपने दिव्य चमत्कारों के लिए विख्यात माना गया है। पौराणिक विश्वास के अनुसार जो भी भक्त सच्चे हृदय से महाकाली के चरणों में उपासना के पुष्प समर्पित करते हैं, उनके जीवन से समस्त प्रकार के रोग, शोक, निर्धनता तथा विपत्तियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।

इसी अंचल में विख्यात शक्तिपीठों की श्रेणी में मां पूर्णागिरी का धाम आता है, जिसकी भौगोलिक स्थिति टनकपुर से तकरीबन 21 किमी की दूरी पर निर्धारित है। जब भी नवरात्रि का पावन काल आरंभ होता है, भारी संख्या में जनसमूह इस पावन पर्वत पर माता के दर्शन हेतु उमड़ पड़ता है।

चंपावत जिले के देवीधुरा स्थल पर प्रतिष्ठित मां वाराही देवी के मंदिर प्रांगण का अपना एक ऐतिहासिक आकर्षण है। यहां प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन के पावन पर्व पर, श्रावणी पूर्णिमा की तिथि को पारंपरिक पत्थरों का युद्ध अर्थात बग्वाल खेली जाती है, जिसे देखने दूर-दराज से लोग एकत्रित होते हैं।

नैनीताल जनपद के गर्जिया क्षेत्र में स्थापित गर्जिया देवी मंदिर मूलतः माता पार्वती के प्रमुख उपासना स्थलों में गिना जाता है। यह पवित्र तीर्थ स्थल भक्तों के अटूट भरोसे के साथ-साथ अपने नैसर्गिक सौंदर्य, शांत आबोहवा और मनोरम परिवेश के कारण श्रद्धालुओं के मन को अपार शांति प्रदान करता है।

पिथौरागढ़ क्षेत्र में थल कस्बे से करीब 9 किमी दूर कोटगाड़ी (कोकिला) देवी का मंदिर अवस्थित है, जो एक अत्यंत सम्मानित धार्मिक गंतव्य है। इस पावन स्थल की विशिष्ट पहचान अंतिम दिव्य अदालत के रूप में स्थापित है, जहां हर ओर से निराश या वंचित भक्तजन ईश्वर से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और न्याय की गुहार लगाने पहुंचते हैं।

कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत में नंदा देवी मंदिर का स्थान अत्यधिक ऊंचा है। इस प्राचीन स्थल की ऐतिहासिक परंपरा 1000 साल से भी अधिक पुरानी आंकी जाती है। स्थानीय कुमाऊंनी शिल्पविद्या शैली में तराशा गया यह भव्य देवालय चंद राजवंश की कुल ईष्ट देवी को समर्पित रहा है।

द्वाराहाट के पास लगभग 14 किमी की दूरी पर मां दूनागिरी मंदिर विराजमान है। इस विशाल देवालय में जगतजननी मां दूनागिरी की अर्चना वैष्णवी स्वरूप में विधिवत संपन्न की जाती है।

अल्मोड़ा की कसार पहाड़ी पर अवस्थित कसार देवी मंदिर को चुंबकीय ऊर्जा और विलक्षण शक्ति का अनोखा केंद्र माना जाता है। लोकमान्यता है कि इसी पावन स्थल पर साक्षात मां दुर्गा का प्राकट्य हुआ था।

बैजनाथ से महज 3 किमी फासले पर डंगोली के निकट कोट भ्रामरी मंदिर स्थापित है, जिसे लोकभाषा में भ्रामरी देवी या कोट माई के पावन नाम से भी संबोधित किया जाता है।

काशीपुर क्षेत्र में चैती (बाल सुंदरी) मंदिर अत्यंत पूजनीय स्थल है। चैत्र मास के आगमन पर यहां चैती मेला नाम से एक अत्यंत विशाल और प्रसिद्ध जनमेला लगता है। पराशक्ति के बाल स्वरूप की उपासना होने के कारण इस तीर्थ को बाल सुंदरी मंदिर कहा जाता है।

नैनीताल की प्रसिद्ध नैनी झील के उत्तरी तट पर प्रतिष्ठित मां नैना देवी मंदिर में सती के शक्ति रूप का वंदन किया जाता है। देवालय के गर्भगृह में दो नेत्र स्थापित हैं जो प्रत्यक्ष रूप से नैना देवी का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस ऐतिहासिक धर्मस्थल की स्थापना आठवीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी।

लोहाघाट क्षेत्र में हरे-भरे सघन देवदार वनों की छांव में अखिलतारणी मंदिर अवस्थित है, जिसे उप शक्तिपीठ का विशिष्ट दर्जा प्राप्त है। धार्मिक मान्यता बताती है कि महाभारत काल में पांडवों ने वीर घटोत्कच का शीश प्राप्त करने के निमित्त इसी स्थान पर मां भगवती की कठिन तपस्या की थी।

## गढ़वाल मंडल के बारह प्रतिष्ठित शक्तिपीठ
अलकनंदा की कलकल बहती धारा के किनारे धारी देवी का प्राचीन सिद्धपीठ स्थित है। लोकआस्था में धारी देवी को संपूर्ण उत्तराखंड की रक्षक देवी की संज्ञा दी गई है।

रुद्रप्रयाग जनपद के जसोली क्षेत्र में स्थित हरियाली देवी मंदिर प्रसिद्ध सिद्धपीठों में गिना जाता है। इस पावन धाम में विराजित देवी को श्रद्धालु आदरपूर्वक सीता माता, बाला देवी तथा वैष्णो देवी के नामों से भी पुकारते हैं।

पौड़ी गढ़वाल के बीरोंखाल में स्थित कालिंका माता मंदिर को मां काली का ही साक्षात रूप स्वीकार किया गया है। इस पहाड़ी तीर्थ पर प्रत्येक 3 साल के अंतराल में शीतकाल के दौरान एक विशाल पारंपरिक मेले का आयोजन किया जाता है।

चमोली जिले के कुरुड़ गांव की सबसे ऊंची चोटी यानी देवसारी तोक पर नंदा देवी का पवित्र मंदिर विद्यमान है। कुरुड़ क्षेत्र की नंदा देवी को स्थानीय परंपरा में राजराजेश्वरी के नाम से भी पुकारा जाता है।

धर्मनगरी हरिद्वार की मुख्य अधिष्ठात्री देवी के रूप में माया देवी पूजी जाती हैं, जिन्हें साक्षात शक्ति का अवतार माना गया है। प्राचीन काल में इन्हीं भगवती माया देवी के नाम पर हरिद्वार नगरी को मायापुरी नाम से जाना जाता था।

रुद्रप्रयाग अंचल में स्थापित कालीमठ मंदिर को महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली के संयुक्त सिद्धपीठ का गौरव हासिल है। इस सिद्ध स्थल का पावन उल्लेख दुर्गा सप्तशती के श्लोकों में भी भली-भांति प्राप्त होता है।

नयार (नबालिका) नदी के किनारे स्थित देवी मंदिर भी आस्था का बड़ा केंद्र है, जहां नवरात्र उत्सव के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों का भव्य आयोजन होता है।

बालखिला पर्वत की ऊंचाई पर स्थित देवी धाम में भी नवरात्र पर्व के समय भक्तों की भारी कतारें लगी रहती हैं और श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर शीश नवाते हैं।

चंद्रकूट पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर स्थित शक्तिपीठ, माता सती से जुड़े पावन 52 शक्तिपीठों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

टिहरी क्षेत्र के सुरकूट पर्वत पर कद्दूखाल के पास सुरकंडा देवी मंदिर स्थापित है, जिसे भी पौराणिक 52 शक्तिपीठों की गणना में शामिल किया गया है।

ऋषिकेश से करीब 25 किमी की दूरी तय कर नरेंद्र नगर के समीप कुंजापुरी देवी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। यह पावन तीर्थ देवी सती को समर्पित है और मान्यता है कि इसी पर्वत शिखर पर माता सती के पार्थिव शरीर का ऊपरी अंग गिरा था।

देशभर के विख्यात तीर्थ स्थलों में अग्रणी मां चंडी देवी मंदिर हरिद्वार के नील पर्वत शिखर पर प्रतिष्ठित है। प्रमुख शक्तिपीठों में शुमार इस मंदिर की पावन प्रतिमा को भी 8वीं शताब्दी के दौर में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था।

## इसका आप पर असर
उत्तराखंड के इन चौबीस शक्तिपीठों की धार्मिक यात्रा श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के दैनिक जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।

- **भारत में:** देश भर के श्रद्धालुओं को नवरात्रि के पावन दिनों में एक व्यवस्थित धार्मिक यात्रा कार्यक्रम तैयार करने की स्पष्ट भौगोलिक जानकारी प्राप्त होती है। इससे श्रद्धालु विभिन्न जिलों में फैले प्राचीन देवी धामों की दूरी और विशेषताओं के अनुसार अपनी तीर्थयात्रा पूर्व नियोजित कर सकते हैं।
- **उत्तराखंड में:** पर्वतीय अंचलों में तीर्थयात्रियों के आगमन से स्थानीय टैक्सी चालकों, होमस्टे संचालकों, पुजारियों और पूजा सामग्री विक्रेताओं की आजीविका को सीधा संबल मिलता है। इससे दूरदराज के सीमांत और पहाड़ी गांवों में पर्यटन एवं धार्मिक गतिविधियों का विस्तार होता है।
- **तीर्थयात्रियों के लिए:** प्रत्येक मंदिर की भौगोलिक दूरी और विशिष्ट महत्व को जानकर श्रद्धालु कठिन चढ़ाई और पर्वतीय मौसम के अनुसार आवश्यक तैयारी रख सकते हैं। इससे यात्रा के दौरान अचानक होने वाली असुविधाओं से बचा जा सकता है।
- **सांस्कृतिक संरक्षण:** चंद वंश के इतिहास, बग्वाल परंपरा और आदि शंकराचार्य से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों की जानकारी मिलने से नई पीढ़ी अपनी क्षेत्रीय विरासत से जुड़ती है। यह अध्ययनकर्ताओं और पर्यटकों को पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला को समझने का अवसर प्रदान करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में इन चौबीस शक्तिपीठों की गहरी प्रतिष्ठा पौराणिक घटनाओं, प्राकृतिक स्थिति और ऐतिहासिक संरक्षण के मिले-जुले प्रभाव से स्थापित हुई है।

- **पौराणिक पृष्ठभूमि:** देवी सती के अंगों के विभिन्न स्थानों पर गिरने और महाभारत कालीन पात्रों की तपस्या के प्रसंगों ने इन पर्वत शिखरों को सिद्ध पीठों के रूप में मान्यता दिलाई। इसी आस्था के आधार पर श्रद्धालु सदियों से इन स्थलों पर अपनी प्रार्थनाएं लेकर आते रहे हैं।
- **आदि शंकराचार्य का योगदान:** आठवीं शताब्दी के दौरान आदि शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए नैना देवी और चंडी देवी जैसे प्रमुख धामों में मूर्तियों की स्थापना की। उनके इस ऐतिहासिक कदम ने हिमालयी क्षेत्रों में एक सुदृढ़ तीर्थ परंपरा की आधारशिला रखी।
- **राजवंशीय संरक्षण:** कत्यूरी और चंद वंश के शासकों ने नंदा देवी जैसे देवालयों को अपनी कुलदेवी के रूप में स्थापित कर भव्य कुमाऊंनी शैली में संरक्षित किया। इस राजकीय संरक्षण के चलते ये देवालय स्थानीय लोकसंस्कृति और सामाजिक परंपराओं के अविभाज्य अंग बन गए।

## सवाल-जवाब

### 1. नैना देवी मंदिर की स्थापना किस शताब्दी में और किसके द्वारा की गई थी?
नैना देवी मंदिर की स्थापना आठवीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी।

### 2. देवीधुरा के मां वाराही देवी मंदिर में बग्वाल किस पर्व पर आयोजित होती है?
मां वाराही देवी मंदिर के प्रांगण में बग्वाल का आयोजन हर साल रक्षाबंधन पर श्रावणी पूर्णिमा के दिन किया जाता है।

### 3. कुमाऊं का कौन सा मंदिर अंतिम दिव्य अदालत के रूप में जाना जाता है?
पिथौरागढ़ में थल से 9 किमी दूर स्थित कोटगाड़ी (कोकिला) देवी मंदिर को अंतिम दिव्य अदालत के रूप में मान्यता प्राप्त है।

### 4. उत्तराखंड की रक्षक देवी के रूप में किस देवी को पूजा जाता है?
अलकनंदा नदी के तट पर स्थित धारी देवी को उत्तराखंड की रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है।

### 5. हरिद्वार का प्राचीन नाम मायापुरी किस देवी के नाम पर पड़ा था?
हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी मां माया देवी के नाम पर इस नगरी को पहले मायापुरी कहा जाता था।

### 6. कुंजापुरी देवी मंदिर ऋषिकेश से कितनी दूरी पर स्थित है?
कुंजापुरी देवी मंदिर ऋषिकेश से लगभग 25 किमी की दूरी पर नरेंद्र नगर के समीप स्थित है।

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