{
  "type": "article",
  "title": "उत्तराखंड में सौहार्द और आजादी के तराने गाती नैनीताल की सवा सदी पुरानी रामलीला",
  "summary": "वर्ष 1897 में शुरू हुई नैनीताल की 129 साल पुरानी रामलीला पारसी रंगमंच, सामाजिक सुधार, आजादी के आंदोलन और सांप्रदायिक एकता का ऐतिहासिक प्रतीक रही है।",
  "content": "उत्तराखंड की प्रसिद्ध सरोवर नगरी नैनीताल केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता या पर्यटन के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि इसकी पहचान एक समृद्ध और जीवंत सांस्कृतिक परंपरा से भी जुड़ी है। इसी सांस्कृतिक धरोहर का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यहां की ऐतिहासिक रामलीला है, जिसका इतिहास करीब 129 वर्ष पुराना है। स्थानीय मंचों पर होने वाला यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं रहा, बल्कि इसने रंगमंच, सामाजिक जनचेतना, स्वतंत्रता संग्राम की अलख और हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की अद्भुत मिसाल पेश की है। पारसी थिएटर शैली, नौटंकी और क्षेत्रीय कुमाऊंनी संगीत के अनूठे संगम से सजी इस रामलीला ने मनोरंजन के साथ समाज को नई दिशा देने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।\n\nपहाड़ों में मंचन की शुरुआत और विस्तार का सफर\nनैनीताल में रामलीला की ऐतिहासिक यात्रा की नींव वर्ष 1897 में वीरभट्टी से पड़ी थी। इसके एक दशक बाद, वर्ष 1907 में तल्लीताल में भी रामलीला के मंचन का सिलसिला प्रारंभ हुआ। इस सांस्कृतिक परंपरा का दायरा आगे बढ़ते हुए वर्ष 1918 में मल्लीताल तक पहुंच गया, जहां नियमित रूप से मंचन शुरू हुआ। समय बीतने के साथ यह मंचन शहर के जनजीवन और सांस्कृतिक अस्मिता का अभिन्न अंग बन गया।\n\nइतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत इस दौर की भौगोलिक चुनौतियों को रेखांकित करते हुए बताते हैं कि उस जमाने में नैनीताल और उसके आसपास के पहाड़ी इलाकों में पहुंचना आज की तरह सुगम नहीं था। वर्ष 1915 में नैनीताल-हल्द्वानी मोटरमार्ग के निर्माण से पहले का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि उस दौर में श्रद्धालु और दर्शक बैलगाड़ियों के सहारे नैनीताल आते थे। कई लोग ज्योलीकोट से वीरभट्टी तक की दुर्गम चढ़ाई पैदल ही पूरी करते थे। ऐसे कठिन दौर में यह रामलीला धार्मिक आस्था प्रकट करने का माध्यम होने के साथ-साथ दूर-दराज के लोगों के लिए आपसी मेलजोल और सामाजिक जुड़ाव का सबसे बड़ा सालाना उत्सव बन जाती थी।\n\nपारसी रंगमंच का प्रभाव और सामाजिक बुराइयों पर प्रहार\nनैनीताल की पुरानी रामलीला की सबसे अनूठी विशेषता इसका विशिष्ट मंचीय स्वरूप था। यह पूरी प्रस्तुति उस दौर के लोकप्रिय पारसी थिएटर की शैली से गहराई से प्रभावित थी। इसमें प्रभावी संवाद अदायगी, भावपूर्ण अभिनय और भव्य मंचीय सजावट के सहारे भगवान राम की जीवन कथा को बेहद सजीव ढंग से पेश किया जाता था। मुख्य कथा के विभिन्न प्रसंगों के बीच में नौटंकी और छोटे नाटकों का मंचन करने की परिपाटी भी विकसित की गई थी।\n\nइन छोटे नाटकों के जरिए स्थानीय कलाकार तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों पर सीधे सवाल उठाते थे। नाटकों में जनहित और सुधारवादी विचारों को पिरोकर आम लोगों तक चेतना का प्रसार किया जाता था। इस तरह आस्था का यह धार्मिक मंच लोककला, रंगमंच और सामाजिक बदलाव का एक प्रभावी हथियार बनकर उभरा।\n\nसांप्रदायिक एकता की मिसाल बने मुस्लिम कलाकार\nनैनीताल की रामलीला ने हमेशा से हिंदू-मुस्लिम एकता की एक दुर्लभ और मजबूत नजीर पेश की है। प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि इस मंचन में कई मुस्लिम कलाकार पूरी निष्ठा से भाग लेते थे। इन कलाकारों में खुदाबक्श का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है। उनके जीवंत अभिनय को देखने के लिए नैनीताल शहर के अलावा आसपास के गांवों से भी भारी संख्या में दर्शक खिंचे चले आते थे।\n\nप्रोफेसर रावत के अनुसार, एक बार मंचन से महज दो सप्ताह पूर्व खुदाबक्श की बेटी और दामाद का अचानक देहांत हो गया। इस भारी पारिवारिक आघात और गम के बावजूद वह समय पर रामलीला के पूर्वाभ्यास और तालीम में शामिल होने पहुंचे। स्थानीय लोगों ने उनकी मानसिक स्थिति को देखते हुए उन्हें उस वर्ष अभिनय से विश्राम लेने की सलाह दी। इस पर खुदाबक्श भावुक हो गए और उन्होंने कहा कि दूर-दूर से आने वाले दर्शक उनसे मंच पर अभिनय की उम्मीद रखते हैं, और यदि वह अभिनय नहीं करेंगे तो दर्शकों को गहरी निराशा होगी। यह मार्मिक प्रसंग दर्शाता है कि रामलीला के साथ उनका रिश्ता सिर्फ एक कलाकार की औपचारिकता तक सीमित नहीं था, बल्कि यह साझा संस्कृति, मानवीय संवेदना और आपसी विश्वास की गहरी बुनियाद पर टिका था।\n\nस्वतंत्रता संग्राम की गूंज और उस्तादों की तालीम\nरामलीला का मंच समय-समय पर राष्ट्रीय आंदोलन का भी मजबूत संवाहक बना। प्रोफेसर अजय रावत के अनुसार, वर्ष 1929 के ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह आंदोलन के दौरान रामलीला के दृश्यों के बीच मिलने वाले मध्यांतर में कलाकार देशभक्ति से ओतप्रोत लघु नाटक प्रस्तुत करते थे। इन नाटकों के जरिए स्वतंत्रता संग्राम की भावना को आम जनता के दिलों में जगाया जाता था और विदेशी हुकूमत की नीतियों के साथ सामाजिक बुराइयों के खिलाफ खुला विरोध दर्ज कराया जाता था।\n\nइस मंचीय परंपरा को तराशने में विभिन्न उस्तादों का अहम योगदान रहा। रामपुर के नवाब के साथ नैनीताल आने वाले उस्ताद अमानत हुसैन ने यहां के स्थानीय कलाकारों को बाकायदा अभिनय और रंगमंचीय बारीकियों का प्रशिक्षण दिया था। इसके अलावा रामलीला में पारंपरिक चांचर धुन सिखाने और संगीत को समृद्ध करने में अकबर हुसैन जैसे मुस्लिम फनकारों का योगदान अविस्मरणीय रहा। लगभग 129 वर्षों के लंबे सफर में नैनीताल की इस रामलीला ने तकनीक और समय के साथ कई बदलाव देखे हैं, लेकिन इसका मूल सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व आज भी अक्षुण्ण है। यह धरोहर सिखाती है कि कला समाज को बांटती नहीं बल्कि जोड़ती है, और इस साझी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सहेजना बेहद आवश्यक है।\n\nइसका आप पर असर\nनैनीताल की ऐतिहासिक रामलीला यह दर्शाती है कि सदियों पुरानी लोक परंपराएं कैसे सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पर्यटन को संजीवनी दे सकती हैं।\n\n• उत्तराखंड में: यह ऐतिहासिक विवरण पर्यटकों और शोधकर्ताओं को नैनीताल के केवल प्राकृतिक स्थलों तक सीमित न रहकर उसकी 129 साल पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक रंगमंच विरासत को समझने का अवसर प्रदान करता है। स्थानीय लोगों के लिए यह अपनी पारंपरिक चांचर धुनों, लोकगीतों और साझा पहाड़ी पहचान को संरक्षित रखने की प्रेरणा देता है।\n• भारत में: यह परंपरा दर्शाती है कि धार्मिक और सांस्कृतिक मंच किस तरह विभिन्न समुदायों को आपस में जोड़कर राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ कर सकते हैं। वर्तमान पीढ़ी के लिए यह उदाहरण है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी रंगमंच ने सामाजिक सुधार और देशभक्ति का सशक्त माध्यम बनकर काम किया था।\n• रंगमंच और कला प्रेमियों के लिए: पारसी थिएटर, नौटंकी और आंचलिक संगीत का यह संगम दिखाता है कि शास्त्रीय और लोक विधाओं का तालमेल कितना प्रभावशाली हो सकता है। युवा रंगकर्मी इससे सीख सकते हैं कि कैसे कला को जनसरोकारों और कुरीतियों के उन्मूलन से जोड़ा जा सकता है।\n• सामाजिक सौहार्द के संदर्भ में: खुदाबक्श जैसे समर्पित कलाकारों का योगदान यह साबित करता है कि कला मजहबी सीमाओं से परे मानवीय रिश्तों और आपसी विश्वास को मजबूत करती है। यह समाज में आपसी भाईचारे और साझी विरासत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nनैनीताल की रामलीला का 129 वर्षों का सफर दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में सामाजिक जुड़ाव और जनजागरण की आवश्यकता के कारण विकसित हुआ।\n\n• शुरुआती परिस्थितियां: बीसवीं सदी की शुरुआत में सड़कों के अभाव और कठिन पहाड़ी रास्तों के चलते स्थानीय लोगों के पास मनोरंजन और मेलजोल के साधन अत्यंत सीमित थे। वर्ष 1897 में वीरभट्टी से शुरू हुए इस मंचन ने लोगों को एक साझा सांस्कृतिक मंच पर एकत्रित करने की तात्कालिक जरूरत पूरी की।\n• सामाजिक सुधार की प्रेरणा: उस दौर में समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए पारसी शैली के नाटकों और नौटंकी का सहारा लिया गया। कलाकारों ने रामलीला के दृश्यों के बीच छोटे प्रहसन प्रस्तुत कर जनचेतना फैलाने का सुनियोजित रास्ता अपनाया।\n• राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन: वर्ष 1929 के नमक सत्याग्रह के दौरान अंग्रेजी हुकूमत की पाबंदियों के बीच कलाकारों ने मध्यांतर के समय देशभक्ति नाटक पेश किए। मंच का यह उपयोग औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ लोगों को एकजुट करने की रणनीति के तहत किया गया था।\n• सांस्कृतिक सहयोग का प्रभाव: रामपुर के नवाब के साथ आए उस्ताद अमानत हुसैन और अकबर हुसैन जैसे उस्तादों के मार्गदर्शन ने इस आयोजन को मजहबी सीमाओं से मुक्त कर एक साझी परंपरा में बदल दिया। इस खुलापन और कलात्मक सहयोग ने ही इस परंपरा को सवा सदी से अधिक समय तक प्रासंगिक बनाए रखा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. नैनीताल में रामलीला के मंचन की शुरुआत कब और कहां से हुई थी?\nनैनीताल की रामलीला की शुरुआत वर्ष 1897 में वीरभट्टी से हुई थी, जिसके बाद वर्ष 1907 में तल्लीताल और वर्ष 1918 में मल्लीताल में इसका मंचन शुरू हुआ।\n\n2. सड़क मार्ग बनने से पहले लोग रामलीला देखने कैसे पहुंचते थे?\nवर्ष 1915 में नैनीताल-हल्द्वानी मोटरमार्ग बनने से पहले लोग बैलगाड़ियों से आते थे और ज्योलीकोट से वीरभट्टी तक की कठिन चढ़ाई पैदल तय करते थे।\n\n3. नैनीताल की पुरानी रामलीला किस नाट्य शैली से प्रभावित थी?\nयह रामलीला मुख्य रूप से पारसी थिएटर शैली, प्रभावशाली संवाद अदायगी, नौटंकी और क्षेत्रीय कुमाऊंनी संगीत से प्रेरित थी।\n\n4. कलाकार खुदाबक्श से जुड़ा कौन सा प्रसंग चर्चा में रहा?\nबेटी और दामाद के आकस्मिक निधन के भारी दुख के बावजूद खुदाबक्श दर्शकों की उम्मीदों का सम्मान करते हुए तालीम और मंचन में शामिल होने पहुंचे थे।\n\n5. आजादी की लड़ाई के दौरान इस मंच का क्या उपयोग हुआ था?\nवर्ष 1929 के नमक सत्याग्रह के समय कलाकारों ने रामलीला के अंतरालों में देशभक्ति के लघु नाटक खेलकर स्वतंत्रता संग्राम का संदेश फैलाया था।\n\n6. नैनीताल के कलाकारों को मंचन और संगीत की तालीम किन उस्तादों ने दी थी?\nरामपुर के नवाब के साथ आए उस्ताद अमानत हुसैन ने कलाकारों को अभिनय का प्रशिक्षण दिया, जबकि अकबर हुसैन ने पारंपरिक चांचर धुनें सिखाई थीं।",
  "url": "https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-sauharda-aura-ajadi-ke-tarane-gati-nainital-ki-sava-sadi-purani-ramlila-47895",
  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-10-15",
  "tags": [
    "नैनीताल रामलीला",
    "पारसी थिएटर",
    "अजय रावत",
    "खुदाबक्श",
    "सांप्रदायिक सौहार्द",
    "उत्तराखंड संस्कृति",
    "वीरभट्टी",
    "नमक आंदोलन"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}