उत्तराखंड में शुरू हुई मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा, जानिए साल 2027 में होने वाली राजजात और इसमें क्या है अंतर चमोली के कुरुड़ से शुरू हुई मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा आगे बढ़ रही है, जबकि भव्य राजजात का आयोजन 2027 में होगा। जानिए इन दोनों पवित्र यात्राओं के बीच का अंतर और अनोखी परंपराएं। चमोली के कुरुड़ स्थित नंदा धाम से शुरू हुई पावन नंदा देवी की 'बड़ी जात' यात्रा वर्तमान में अपनी दुर्गम डगर पर आगे बढ़ रही है। इस यात्रा के शुरू होते ही श्रद्धालुओं के बीच एक बार फिर उस ऐतिहासिक महापर्व की चर्चा तेज हो गई है जिसे 'नंदा देवी राजजात' के नाम से जाना जाता है, जिसका आयोजन अब वर्ष 2027 में होना तय हुआ है। आम लोगों और श्रद्धालुओं के मन में अक्सर यह संशय रहता है कि एक ही आराध्य देवी से जुड़ी इन दोनों यात्राओं में आखिर क्या भिन्नता है। मां नंदा के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट करने वाले इन दोनों आयोजनों के स्वरूप, भौगोलिक दायरे और धार्मिक महत्व में गहरे अंतर हैं, जिन्हें समझना बेहद दिलचस्प है। क्षेत्रीय परंपरा और ऐतिहासिक महाआयोजन का बुनियादी अंतर उत्तराखंड के पर्वतीय समाज में मां नंदा देवी को केवल एक देवी नहीं, बल्कि अपने ही परिवार की बेटी माना जाता है। इस भावना के तहत आयोजित होने वाली बड़ी जात और राजजात के स्वरूप में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां एक ओर बड़ी जात का आयोजन स्थानीय स्तर पर क्षेत्रीय धार्मिक रीति-रिवाजों और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार किया जाता है, वहीं दूसरी ओर राजजात एक अत्यंत भव्य और ऐतिहासिक यात्रा है। राजजात का दायरा व्यापक होता है, जिसमें उत्तराखंड के कोने-कोने से विभिन्न गांवों की डोलियां और रंग-बिरंगी छंतोलियां शामिल होती हैं। बड़ी जात एक नियमित अंतराल पर क्षेत्रीय लोगों की श्रद्धा को प्रदर्शित करती है, जबकि राजजात एक विशाल सामाजिक-सांस्कृतिक संगम है जो पूरे हिमालयी क्षेत्र को एकता के सूत्र में पिरोता है। यात्रा की यह भव्यता इसे बेहद कठिन और अलौकिक बनाती है। द्वादश वर्ष का चक्र और अत्यंत दुर्गम डगर का सफर नंदा देवी राजजात को सामान्य तीर्थयात्राओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इसका आयोजन एक निश्चित और लंबे अंतराल पर होता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इस महायात्रा का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष के अंतराल पर किए जाने का नियम है। इतिहासकार डॉ. अजय रावत के अनुसार, वर्ष 2000 में संपन्न हुई ऐतिहासिक राजजात के बाद अगली यात्रा का आयोजन वास्तव में वर्ष 2012 में होना प्रस्तावित था। परंतु, उस दौरान उत्तराखंड क्षेत्र में आई विनाशकारी प्राकृतिक आपदा के कारण इस आयोजन को आगे बढ़ाना पड़ा और आखिरकार इसे वर्ष 2014 में आयोजित किया गया। अब इसी गणना के आधार पर अगली भव्य राजजात का आयोजन वर्ष 2027 में किया जाना तय हुआ है। यह यात्रा भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की सबसे कठिन और थका देने वाली धार्मिक यात्राओं में शुमार की जाती है। इसकी कुल दूरी लगभग 290 किलोमीटर आंकी गई है। इस यात्रा का कुछ शुरुआती हिस्सा तो परिवहन के आधुनिक साधनों द्वारा तय किया जा सकता है, लेकिन इसका एक बहुत बड़ा भाग श्रद्धालुओं को अत्यंत दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में पैदल चलकर ही पूरा करना पड़ता है। इस दौरान यात्रियों को नुकीले पथरीले रास्तों, बेहद घने जंगलों, खड़ी चढ़ाई वाली ऊंची पहाड़ियों और हाड़ कंपाने वाले ग्लेशियरों से होकर गुजरना पड़ता है। श्रद्धालुओं की सुविधा और धार्मिक नियमों के पालन के लिए इस पूरी यात्रा के मार्ग में कुल 18 रात्रि विश्राम पड़ाव निर्धारित किए गए हैं, जहां यात्री प्रकृति की गोद में रात बिताते हैं। चार सींग वाला अनोखा खाडू और बेटी की भावुक विदाई इस महान यात्रा की सबसे चमत्कारी और अनोखी परंपराओं में से एक है 'चौसिंगिया खाडू' यानी चार सींगों वाला नर भेड़। लोक मान्यताओं के अनुसार, राजजात के आयोजन से ठीक पहले इस विशेष भेड़ का जन्म चांदपुर क्षेत्र में होता है, जो प्रकृति का एक अनोखा चमत्कार माना जाता है। पूरी यात्रा के दौरान इस खाडू की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय होती है। इसकी पीठ पर दोनों तरफ विशेष थैले बांधे जाते हैं, जिनमें मां नंदा के लिए उनके मायके वालों की ओर से दिए जाने वाले पारंपरिक आभूषण, श्रृंगार सामग्री, वस्त्र और अन्य भेंट सामग्रियां सुरक्षित रखी जाती हैं। जब यात्रा अपने अंतिम पड़ाव यानी होमकुंड पहुंचती है, तो वहां विधि-विधान से विशेष पूजा-अर्चन संपन्न की जाती है। इसके बाद, यह चौसिंगिया खाडू बिना किसी मानवीय मार्गदर्शन के, बिल्कुल अकेला ही हिमालय की बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों की ओर प्रस्थान कर जाता है। नंदा देवी राजजात केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समूह नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की एक बेटी को उसके ससुराल विदा करने की बेहद भावुक गाथा है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में मां नंदा को अलग-अलग क्षेत्रों में बेटी, बहन या फिर बहू के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि इस यात्रा के माध्यम से मां नंदा को उनके मायके से विदा कर उनके ससुराल यानी भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत की ओर भेजा जाता है। यही कारण है कि जैसे-जैसे यात्रा अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ती है, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं के चेहरों पर विदाई की उदासी और आंखों में आंसू साफ देखे जा सकते हैं। यह पूरा दृश्य पहाड़ के पारंपरिक और पारिवारिक रिश्तों की गहराई को जीवंत कर देता है। आयोजन समितियों का मतभेद और कुरुड़ व नौटी का महत्व इस वर्ष आयोजित हो रही बड़ी जात और आगामी 2027 की राजजात को लेकर उठ रहे सवालों के पीछे प्रशासनिक और पारंपरिक मतभेद भी एक मुख्य कारण हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इस बार यात्रा के आयोजन को लेकर नौटी आयोजन समिति और कुरुड़ पक्ष के बीच कुछ वैचारिक मतभेद उभरकर सामने आए। नौटी समिति पूर्व में इस वर्ष ही राजजात आयोजित करने की तैयारियों में जुटी हुई थी, लेकिन बाद में मलमास के ज्योतिषीय प्रभाव का हवाला देते हुए इस वर्ष की यात्रा को स्थगित करने का निर्णय लिया गया। इसके विपरीत, कुरुड़ पक्ष ने सदियों पुरानी परंपराओं में अपनी अहम और अनिवार्य भूमिका का हवाला देते हुए इस वर्ष अपनी पारंपरिक बड़ी जात को निकालने का दृढ़ संकल्प लिया। इसी आपसी असहमति के चलते वर्तमान में बड़ी जात का आयोजन किया जा रहा है और 2027 में होने वाली राजजात की चर्चाएं भी चारों ओर गर्म हैं। इस पूरी यात्रा व्यवस्था में कुरुड़, नौटी और कांसुवा जैसे पौराणिक स्थानों की अपनी-अपनी विशिष्ट और ऐतिहासिक भूमिकाएं तय हैं। प्राचीन परंपराओं के अनुसार, नंदा राजजात का मुख्य संचालन कांसुवा के कुंवर राजपूतों की देखरेख और अगुवाई में किया जाता रहा है। वहीं, कुरुड़ स्थित नंदा देवी मंदिर से प्रस्थान करने वाली पवित्र डोलियां इस यात्रा की धार्मिक रीढ़ मानी जाती हैं। जैसे-जैसे यह कारवां आगे बढ़ता है, मार्ग में विभिन्न क्षेत्रों की डोलियां और देवताओं के प्रतीक छंतोलियां इस मुख्य यात्रा में विलीन होती जाती हैं। यह समागम इस आयोजन को किसी एक संप्रदाय का न रखकर पूरे गढ़वाल मंडल की सामूहिक आस्था और एकता का एक अद्वितीय प्रतीक बना देता है। सामाजिक भाईचारा और बर्फ से ढकी दुर्गम चोटियों की चुनौती नंदा राजजात की सबसे बड़ी विशेषता इसका जन-आंदोलन जैसा स्वरूप है, जिसमें किसी एक स्थान विशेष के लोग नहीं बल्कि समूचे पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण स्वतःस्फूर्त होकर हिस्सा लेते हैं। जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, हर गांव से लोग अपनी डोलियों के साथ इसमें शामिल होते जाते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का अतिथि सत्कार इस यात्रा को अनोखा बनाता है; वे बिना किसी स्वार्थ के यात्रियों के लिए भोजन और रात गुजारने की व्यवस्था करते हैं। कई दुर्गम गांवों में तो स्थिति यह होती है कि स्थानीय लोग अपने पक्के मकान यात्रियों के विश्राम के लिए पूरी तरह खाली छोड़ देते हैं और स्वयं कड़ाके की ठंड में पशुओं के रहने वाले स्थान यानी 'गोठ' में रात गुजारते हैं। यह अटूट सेवा भावना इस धार्मिक आयोजन को सामाजिक एकजुटता और आपसी प्रेम के एक महान उत्सव में तब्दील कर देती है। इस यात्रा का सबसे रोमांचक और चुनौतीपूर्ण चरण तब शुरू होता है जब श्रद्धालु समुद्र तल से अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित बर्फीले हिमालयी क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं। यात्रा मार्ग बेदनी बुग्याल, पातर नचौणियां, रहस्यमयी रूपकुंड, शिला समुद्र और अंततः अत्यंत दुर्गम होमकुंड जैसे पड़ावों से होकर गुजरता है। लगभग 4010 मीटर की ऊंचाई पर स्थित होमकुंड में नंदा अष्टमी के पावन अवसर पर मुख्य धार्मिक अनुष्ठान और तांत्रिक पूजा आयोजित की जाती है। इस पूजा के समापन के बाद ही चौसिंगिया खाडू को देवी नंदा के साथ कैलाश की ओर विदा किया जाता है। विदाई की यह बेला पूरी यात्रा का सबसे संवेदनशील और भावुक क्षण होती है, जो हर श्रद्धालु की आंखों को नम कर जाती है। इसका आप पर असर इस ऐतिहासिक और कठिन यात्रा का सीधा प्रभाव स्थानीय पर्यटन, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर पड़ता है। • स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए: यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले दर्जनों सुदूरवर्ती गांवों में होमस्टे, स्थानीय गाइड और छोटे व्यापारियों के व्यवसाय में अभूतपूर्व बढ़ोतरी होगी। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। • यात्रियों और साहसिक उत्साही लोगों के लिए: दुर्गम रास्तों के सुदृढ़ीकरण से ट्रैकिंग के शौकीनों को सुरक्षित और सुगम अनुभव मिलेगा। उत्तराखंड प्रशासन द्वारा इन कठिन रास्तों पर सुरक्षात्मक और बुनियादी ढांचा मजबूत किया जा रहा है। • सांस्कृतिक संवर्धन: यह आयोजन प्रवासी पर्वतीय लोगों और स्थानीय समुदायों के बीच के पारिवारिक बंधनों को पुनर्जीवित करता है। यह दुनिया के सामने गढ़वाल की लोक कला और सांस्कृतिक परंपराओं को बड़े मंच पर प्रस्तुत करता है। • उत्तराखंड में: चमोली और सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्रों के दूरदराज के गांवों में सड़क संपर्क और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का तेजी से विकास होगा। यात्रियों के रात्रि विश्राम स्थलों पर आधुनिक सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। ऐसा क्यों हुआ नंदा देवी की इन यात्राओं के आयोजन और हालिया मतभेदों के पीछे पौराणिक मान्यताएं, खगोलीय गणनाएं और संगठनात्मक निर्णय मुख्य कारण हैं। • आराध्य के प्रति पारिवारिक भाव: पहाड़ की संस्कृति में मां नंदा को बेटी मानकर ससुराल विदा करने की प्राचीन परंपरा है। इसी भावुक रिश्ते को जीवंत रखने के लिए इस कठिन पैदल यात्रा का आयोजन किया जाता है। • खगोलीय और ऐतिहासिक चक्र: राजजात का आयोजन ग्रहों के विशेष गोचर और 12 वर्षों के पारंपरिक चक्र के आधार पर ही संभव होता है। प्राकृतिक आपदाओं या विशिष्ट खगोलीय स्थितियों के कारण कभी-कभी इस अवधि में फेरबदल हो जाता है। • आयोजन समितियों का मतभेद: इस वर्ष राजजात की जगह बड़ी जात निकालने का कारण नौटी समिति और कुरुड़ पक्ष के बीच मतभेद रहा, जहां नौटी समिति ने मलमास के चलते यात्रा स्थगित की, वहीं कुरुड़ पक्ष ने अपनी परंपरा जारी रखने के लिए बड़ी जात का रास्ता चुना। सवाल-जवाब 1. नंदा देवी बड़ी जात और राजजात में क्या मुख्य अंतर है? बड़ी जात कुरुड़ मंदिर से शुरू होने वाली एक वार्षिक/क्षेत्रीय धार्मिक यात्रा है, जबकि राजजात हर 12 वर्ष के अंतराल पर होने वाली एक विशाल और व्यापक ऐतिहासिक महायात्रा है। 2. अगली नंदा देवी राजजात यात्रा कब आयोजित की जाएगी? अगली भव्य नंदा देवी राजजात यात्रा का आयोजन वर्ष 2027 में किया जाना प्रस्तावित है। 3. राजजात यात्रा की कुल दूरी कितनी है और इसमें कितने विश्राम पड़ाव हैं? यह कठिन यात्रा लगभग 290 किलोमीटर लंबी है, जिसमें अधिकांश दूरी पैदल तय करनी होती है और मार्ग में 18 रात्रि विश्राम पड़ाव होते हैं। 4. चौसिंगिया खाडू क्या है और इसका यात्रा में क्या महत्व है? यह चार सींगों वाला अनोखा नर भेड़ है जो चांदपुर क्षेत्र में जन्म लेता है। यह मां नंदा के मायके के श्रृंगार और आभूषणों को होमकुंड तक ले जाता है और वहां से अकेला कैलाश की ओर प्रस्थान करता है। 5. होमकुंड की ऊंचाई कितनी है और वहां कौन से प्रसिद्ध पड़ाव आते हैं? होमकुंड समुद्र तल से लगभग 4010 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस मार्ग में बेदनी, पातर नचौणियां, रूपकुंड और शिला समुद्र जैसे अत्यंत दुर्गम पड़ाव आते हैं। 6. इस वर्ष राजजात क्यों नहीं हो सकी? नौटी आयोजन समिति ने मलमास का हवाला देते हुए इस वर्ष की राजजात को स्थगित कर दिया था, जिसके बाद कुरुड़ पक्ष ने अपनी परंपरा के अनुसार बड़ी जात निकालने का निर्णय लिया। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-shuru-hui-man-nanda-devi-ki-bari-jata-yatra-janie-sala-2027-men-hone-vali-rajjat-aura-isamen-kya-hai-antara-31563 TrendKia — Har trend, sabse pehle.