उत्तराखंड में तारकोल संकट से ठप पड़े सड़क प्रोजेक्ट, ठेकेदारों ने उठाई राहत पैकेज की मांग ईंधन और बिटुमेन के बेतहाशा बढ़ते दामों के कारण उत्तराखंड में ग्रामीण सड़क निर्माण कार्य बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जिसके चलते ठेकेदारों ने पड़ोसी राज्यों की तरह राहत देने की मांग उठाई है। ईरान और अमेरिका के बीच छिड़े युद्ध के साथ ही वैश्विक बाजार में आई अस्थिरता ने उत्तराखंड के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में चल रही सड़क परियोजनाओं की रफ्तार थाम दी है। डीजल, बिटुमेन यानी तारकोल और आवश्यक निर्माण सामग्रियों की कीमतों में आए जबरदस्त उछाल ने पहाड़ी इलाकों में आधारभूत ढांचा तैयार कर रहे ठेकेदारों के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। पुराने करारों और पूर्व निर्धारित सरकारी दरों पर काम कर रहे निर्माणकर्ता अब भारी वित्तीय नुकसान की चपेट में हैं और उनके लिए काम जारी रखना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर मूल्य संशोधन की मांग लगातार बढ़ रहे घाटे से जूझ रहे राज्य के निर्माणकर्ताओं ने शासन से गुहार लगाई है कि उन्हें पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की भांति मूल्य संशोधन यानी प्राइस वेरिएशन और एक विशेष आर्थिक पैकेज उपलब्ध कराया जाए। निर्माणकर्ताओं का तर्क है कि जब कच्चा माल और ईंधन लगातार महंगे हो रहे हैं, तो पुरानी दरों पर अपनी जेब से नुकसान उठाकर परियोजनाओं को पूरा कराना उनके बूते से बाहर हो चुका है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से जुड़े ठेकेदार अमित जैन ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि बिटुमेन के दामों में भारी बढ़ोतरी होने से कई कार्य रुक गए हैं। उन्होंने मांग की कि हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मॉडल को अपनाते हुए उत्तराखंड के ठेकेदारों को भी अविलंब वित्तीय राहत दी जानी चाहिए, साथ ही सरकारी स्तर पर भुगतान की मौजूदा व्यवस्था को सरल और पारदर्शी बनाया जाना आवश्यक है। सरकारी मियाद और बढ़ती निर्माण लागत गढ़वाल कांट्रेक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष भीम दत्त भट्ट के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने अप्रैल महीने में एक विशेष आदेश जारी किया था, जिसमें 30 अप्रैल तक सड़कों के निर्माण कार्य पूरे करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि उस दौरान ठेकेदारों को नियमों में कुछ हद तक रियायतें प्रदान की गई थीं, किंतु उसके तुरंत बाद से निर्माण सामग्रियों की कीमतों में लगातार इजाफा दर्ज किया गया। उन्होंने याद दिलाया कि उत्तराखंड कभी उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था, इसलिए जो राहतकारी नियम और व्यवस्थाएं उत्तर प्रदेश में लागू हैं, उन्हें यहां भी समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। स्थानीय खदानों की कमी और पेनाल्टी का विवाद पीएमजीएसवाई कांट्रेक्टर एसोसिएशन ठेकेदार संघों के संयुक्त संगठन अध्यक्ष रमेश चंद्र गहतोड़ी ने पर्वतीय क्षेत्रों की जमीनी हकीकत उजागर करते हुए कहा कि राज्य के हर विकासखंड में चट्टानी पत्थरों की खदानें उपलब्ध नहीं हैं। इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग की एसओआर 2023-24 और 2024-25 में ब्लॉक स्तर की दरें तय की गई हैं, जिनमें परिवहन खर्च या खदान स्थल से ढुलाई की लागत का कोई प्रावधान शामिल नहीं किया गया है। ठेकेदार आमतौर पर स्वीकृत सड़क के पहाड़ी हिस्से, फॉर्मेशन या नींव की कटाई से निकलने वाले स्थानीय मलबे और सामग्री का ही उपयोग करते हैं, जिस पर पूर्व व्यवस्था के तहत केवल तय रॉयल्टी काटी जाती थी और किसी प्रकार का जुर्माना नहीं लगता था। वर्तमान में स्थिति यह है कि रेत, ग्रिट और डस्ट अधिकृत खदानों से वैध प्रपत्रों के साथ खरीदकर संबंधित कार्यालयों में प्रस्तुत किए जाने के बावजूद ठेकेदारों पर भारी जुर्माना थोपा जा रहा है। आरक्षित वन क्षेत्रों, भूमि स्वामियों की आपत्तियों और संवेदनशील भूस्खलन क्षेत्रों के चलते हर ब्लॉक में खदानें संभव नहीं हैं। एसओआर में अतिरिक्त परिवहन खर्च का प्रावधान किए बिना बाहर से सामग्री लाना ठेकेदारों के लिए असंभव है, जिसे उन्होंने खुला उत्पीड़न करार दिया। जुर्माना वापसी और जिला खनिज न्यास पर सवाल संगठन ने मांग उठाई है कि वर्तमान समय में ठेकेदारों से वसूली गई दोगुनी पेनाल्टी और हालिया परिपत्र के जरिए बढ़ाई गई भारी जुर्माना दरों को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए। इसके अलावा जिला खनिज न्यास यानी डीएमएफ की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यह कटौती क्षतिपूर्ति के रूप में नदी तल के खनन पट्टा धारकों पर लागू की जाती है, ताकि उस राशि से भू-कटाव और पेयजल योजनाओं को पहुंचे नुकसान की जिला स्तर पर भरपाई की जा सके। राज्य निर्माण के बाद से आज तक किसी भी सड़क की क्षतिपूर्ति के लिए डीएमएफ से एक रुपया भी जारी नहीं किया गया है। इसके बावजूद सड़क बनाने वाले ठेकेदारों के देयकों से यह कटौती नियमित रूप से की जा रही है। संगठन ने मांग की है कि सड़कों से संबंधित बिलों से डीएमएफ की यह गैर-जरूरी कटौती तुरंत बंद की जाए। युद्ध के कारण बिटुमेन आपूर्ति में रुकावट रमेश चंद्र गहतोड़ी के मुताबिक, ठेकेदारों की तीसरी और सबसे प्रमुख समस्या बिटुमेन की आसमान छूती कीमतों और आपूर्ति से जुड़ी है। मार्च 2026 के उपरांत अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष भड़कने तथा होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण गहरा पेट्रोलियम संकट पैदा हो गया, जिससे बिटुमेन की आपूर्ति लगभग ठप हो गई और इसकी बाजार दरें अनियंत्रित हो गईं। इस संकट से निपटने के लिए हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित उत्तर भारत के अन्य राज्यों ने 3.75 मीटर चौड़ी सड़क पर 5 लाख रुपये प्रति किलोमीटर के आधार पर बढ़ी हुई दरों का भुगतान पहले ही कर दिया है। हिमाचल प्रदेश में इसके लिए 22 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी जारी की जा चुकी है। स्टैंडर्ड बिडिंग डॉक्यूमेंट यानी एसबीडी की धारा 54.3 में स्पष्ट प्रावधान है कि युद्ध जैसी अप्रत्याशित आपात स्थितियों में लागत के अंतर की भरपाई की जाएगी। इन स्पष्ट नियमों के बावजूद उत्तराखंड सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकाला गया है। इसका आप पर असर पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण कार्य रुकने से आम जनता के आवागमन और आपातकालीन सेवाओं पर सीधा असर पड़ सकता है। • भारत में: कच्चे तेल और बिटुमेन के दामों में उछाल से अन्य राज्यों में भी लंबी अवधि की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है। इसके चलते राष्ट्रीय राजमार्गों और ग्रामीण संपर्क मार्गों के समय पर पूरा होने में देरी हो सकती है। • उत्तराखंड में: पर्वतीय क्षेत्रों में अधूरी सड़कों के कारण स्थानीय ग्रामीणों, स्कूली बच्चों और मरीजों को आवाजाही में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। यदि सरकार ने दरों में संशोधन नहीं किया, तो आगामी मॉनसून से पहले कई दूरस्थ गांवों की सड़क कनेक्टिविटी अधर में लटक सकती है। • करदाताओं पर: निर्माण लागत में संभावित संशोधन के चलते सार्वजनिक सड़क परियोजनाओं के बजटीय आवंटन में बढ़ोतरी हो सकती है। प्रशासन को रुकी हुई परियोजनाओं को दोबारा शुरू कराने के लिए अतिरिक्त राजकोषीय प्रावधान करने पड़ सकते हैं। • स्थानीय रोजगार पर: निर्माण कार्य ठप होने से पहाड़ी जिलों में काम कर रहे स्थानीय मजदूरों और भारी वाहन चालकों की दैनिक कमाई प्रभावित हो सकती है। काम बंद रहने की स्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण क्षेत्र से जुड़ी आजीविका पर सीधा दबाव बनेगा। ऐसा क्यों हुआ वैश्विक युद्ध के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति बाधित होने और स्थानीय स्तर पर विसंगतिपूर्ण खनन नियमों के चलते ठेकेदारों के सामने यह संकट पैदा हुआ है। • अंतरराष्ट्रीय तेल संकट: मार्च 2026 के बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ने और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से पेट्रोलियम उत्पादों व बिटुमेन की आपूर्ति ठप हो गई। कच्चे माल की भारी कमी के कारण खुले बाजार में तारकोल की कीमतें अप्रत्याशित रूप से बढ़ गईं। • अनुबंध में संशोधन का अभाव: पुराने सरकारी समझौतों में अचानक हुई इस भारी मूल्य वृद्धि की भरपाई के लिए स्वतः संशोधन का प्रावधान लागू नहीं किया गया। पड़ोसी राज्यों द्वारा राहत दिए जाने के बावजूद स्थानीय स्तर पर दरों में बदलाव न होने से ठेकेदारों पर सारा वित्तीय बोझ आ गया। • स्थानीय खदानों की कमी: पर्यावरण संवेदनशीलता, आरक्षित वन क्षेत्रों और भूस्खलन क्षेत्रों के कारण राज्य के हर ब्लॉक में अधिकृत खदानें मौजूद नहीं हैं। पीडब्ल्यूडी की एसओआर में बिना परिवहन खर्च जोड़े दरें तय करने और स्थानीय कटिंग सामग्री पर पेनाल्टी लगाने से विवाद और बढ़ गया। सवाल-जवाब 1. उत्तराखंड में सड़क निर्माण कार्य क्यों धीमे पड़ गए हैं? ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण डीजल और बिटुमेन के दामों में भारी उछाल आया है, जिससे पुरानी दरों पर काम कर रहे ठेकेदारों को भारी घाटा हो रहा है। 2. उत्तराखंड के ठेकेदारों की मुख्य मांग क्या है? ठेकेदार उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश की तरह 'प्राइस वेरिएशन' और विशेष वित्तीय राहत पैकेज दिए जाने की मांग कर रहे हैं। 3. पड़ोसी राज्यों ने बढ़ी दरों पर क्या राहत दी है? हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने 3.75 मीटर चौड़ी सड़क पर 5 लाख रुपये प्रति किलोमीटर के हिसाब से भुगतान किया है, जिसमें हिमाचल ने 22 करोड़ रुपये की पहली किस्त भी जारी की है। 4. एसबीडी के क्लॉज 54.3 में क्या प्रावधान है? एसबीडी के क्लॉज 54.3 के अनुसार, युद्ध जैसी आपातकालीन स्थितियों में निर्माण सामग्री की लागत में आए अंतर की भरपाई करने का नियम है। 5. जिला खनिज न्यास यानी डीएमएफ को लेकर ठेकेदारों का क्या ऐतराज है? ठेकेदारों का कहना है कि सड़क क्षतिपूर्ति के लिए डीएमएफ से कभी कोई फंड नहीं मिला, फिर भी उनके बिलों से यह कटौती लगातार की जा रही है। 6. स्थानीय पत्थरों के इस्तेमाल पर क्या विवाद है? सड़क कटिंग से निकले स्थानीय पत्थरों पर पहले केवल रॉयल्टी लगती थी, लेकिन अब वैध खरीद के बावजूद ठेकेदारों पर भारी जुर्माना थोपा जा रहा है। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-tarakola-snkata-se-thapa-pare-saraka-projekta-thekedaron-ne-uthai-rahata-paikeja-ki-manga-55723 TrendKia — Har trend, sabse pehle.