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  "title": "उत्तराखंड में उपेक्षा के भंवर में कुमाऊं का प्रसिद्ध छोलिया नृत्य, आय घटने से लोक कलाकारों पर मंडराया आजीविका का संकट",
  "summary": "कुमाऊं के पारंपरिक छोलिया नृत्य से जुड़े कलाकार शादी समारोहों में घटे अवसरों और सरकारी योजनाओं के अटके लाभ के चलते गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं.",
  "content": "उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और कुमाऊं मंडल की ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाने वाला छोलिया नृत्य वर्तमान दौर में अपने अस्तित्व की कठिन लड़ाई लड़ रहा है. किसी समय पर्वतीय अंचल के पारंपरिक विवाह समारोहों, धार्मिक आयोजनों और भव्य सांस्कृतिक मेलों में छोलिया नर्तकों और वादकों की उपस्थिति सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी. पारंपरिक ढोल और दमाऊं की गूंज, हाथों में चमकती तलवार और ढाल तथा विशेष रंगीन वेशभूषा के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले इस लोक नृत्य की पहचान अब धीरे-धीरे धूमिल होती दिख रही है. सामाजिक प्राथमिकताओं में बदलाव और आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव ने इन पारंपरिक कलाकारों के सामने आजीविका का गहरा संकट खड़ा कर दिया है. कलाकारों का स्पष्ट कहना है कि आयोजनों में उनकी मांग तेजी से घटी है, जिससे नियमित आमदनी पर सीधा असर पड़ा है, जबकि सरकारी स्तर पर होने वाली संरक्षण और वित्तीय सहायता की घोषणाएं भी धरातल पर उन तक नहीं पहुंच सकी हैं.\n\nपीढ़ियों से विरासत के रूप में इस विधा को जीवित रखने वाले लोक कलाकार अब परिवार के भरण-पोषण के लिए दूसरे मजदूरी और दैनिक कार्यों की ओर रुख करने को विवश हो रहे हैं. कलाकारों के सामने केवल तात्कालिक दैनिक खर्च जुटाने की समस्या नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी चिंता इस ऐतिहासिक विधा के विलुप्त होने की है. यदि नई पीढ़ी को इसमें भविष्य नहीं दिखाई दिया और वे इस परंपरा से विमुख हो गए, तो आने वाले दशकों में छोलिया दलों का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है.\n\nतीन पीढ़ियों से नयना देवी मंदिर में सेवा दे रहा परिवार\n\nपिथौरागढ़ जिले के सीमांत पांखूं गांव से अपने छोलिया दल के साथ नैनीताल पहुंचे लोक कलाकार भगत राम बताते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ियों से निरंतर इस पारंपरिक विधा को आगे बढ़ा रहा है. उनके दादाजी नैनीताल स्थित मां नयना देवी मंदिर में आकर ढोल वादन और नृत्य करते थे, जिसके बाद उनके पिता ने इस धरोहर को संभाला और अब वह स्वयं इस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. भगत राम पिछले लगभग 30 वर्षों से हर वर्ष अपना ढोल लेकर नैनीताल आते हैं और मां नयना देवी मंदिर में नियमित आरती के दौरान अपने दल के साथ प्रस्तुति देते हैं.\n\nभगत राम का कहना है कि इसी लोक कला से मिलने वाले मानदेय और नेग से उनके परिवार की गृहस्थी चलती रही है. हालांकि, हाल के वर्षों में सामाजिक रुझान बदलने से शादियों और शुभ कार्यों में छोलिया दलों को आमंत्रित करने का चलन काफी कम हो गया है. आमंत्रणों में भारी गिरावट आने से उनकी आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है. इसके साथ ही युवा पीढ़ी भी इसमें अनिश्चित भविष्य देखकर रुचि लेने से कतरा रही है.\n\nपेंशन के लिए दफ्तरों के चक्कर और अटके भुगतान\n\nकलाकारों की एक बड़ी व्यथा यह भी है कि जीवन भर सांस्कृतिक पहचान को संजोने के बावजूद वृद्धावस्था में उन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पा रही है. भगत राम बताते हैं कि लोक कलाकारों को पेंशन और सरकारी मदद मिलने की उम्मीद लंबे समय से बंधी हुई है. उन्होंने स्वयं देहरादून जाकर पेंशन की औपचारिकताओं के लिए कई बार प्रयास किए, लेकिन आज तक उन्हें किसी भी प्रकार की पेंशन का लाभ नहीं मिल सका. इसके अतिरिक्त, सरकारी स्तर पर आयोजित होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मेलों में प्रस्तुति देने के बाद मिलने वाली मानदेय राशि भी समय पर नहीं मिलती. कई पुराने कार्यक्रमों का भुगतान आज तक लंबित पड़ा हुआ है.\n\nवेशभूषा का खर्च भी खुद उठाने को मजबूर कलाकार\n\nछोलिया नृत्य की सबसे प्रमुख विशेषताओं में उसकी विशिष्ट और आकर्षक पारंपरिक पोशाक शामिल होती है, जिसमें घेरदार जामा, पगड़ी और कमरबंद प्रमुख हैं. भगत राम के अनुसार, इस पूरी पोशाक को तैयार कराने का सारा खर्च कलाकारों को अपनी जेब से ही वहन करना पड़ता है. आर्थिक तंगी के दौर में इन महंगी पोशाकों को तैयार कराना और उनका रखरखाव करना उनके लिए भारी बोझ साबित होता है.\n\nकलाकारों का कहना है कि यदि शासन स्तर पर छोलिया दलों के संरक्षण के लिए एक स्पष्ट नीति तैयार की जाए, नियमित आर्थिक सहायता की व्यवस्था बने और राज्य के आधिकारिक आयोजनों में अवसर सुनिश्चित किए जाएं, तो कलाकार अपने परिवारों का सम्मानजनक पालन-पोषण कर सकते हैं. छोलिया केवल साधारण मनोरंजन का जरिया नहीं है, बल्कि यह कुमाऊं की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान है, जिसे जिंदा रखने के लिए कलाकारों को वित्तीय सुरक्षा और सामाजिक सम्मान दोनों की तत्काल आवश्यकता है.\n\nपीढ़ियों के समर्पण के बाद भी सरकारी लाभ से वंचित\n\nइसी परंपरा से जुड़े अन्य कलाकार किशन राम भी सरकारी मदद न मिलने से बेहद आहत हैं. उनका कहना है कि उनका परिवार पीढ़ियों से ढोल-दमाऊं और छोलिया कला की सेवा करता आ रहा है और इसी पर उनकी आजीविका निर्भर रही है. इसके बावजूद, आज तक उन्हें न तो कोई नियमित पेंशन मिली और न ही सरकार की किसी कल्याणकारी योजना का यथेष्ट लाभ उन तक पहुंचा है. किशन राम ने मांग उठाई है कि सरकार वरिष्ठ और पारंपरिक कलाकारों के लिए उचित पेंशन योजना, आपातकालीन आर्थिक सहायता तथा बुनियादी सुविधाओं की ठोस व्यवस्था करे, जिससे युवा कलाकार मजबूरी में अपनी पुश्तैनी कला को त्यागने के बजाय गौरव के साथ इसे आगे बढ़ा सकें.\n\nसत्यापन के बाद 49 कलाकारों की फाइलें ठंडे बस्ते में\n\nओखलकांडा क्षेत्र से नैनीताल पहुंचे छोलिया दल का नेतृत्व कर रहे नारायण राम ने विभागीय योजनाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने बताया कि शासन की ओर से ढोल-दमाऊं बजाने वाले लोक कलाकारों को आर्थिक संबल देने के उद्देश्य से एक योजना की रूपरेखा सामने आई थी. इस योजना के अंतर्गत जिले भर से 49 योग्य लोक कलाकारों का विधिवत चयन किया गया था. कलाकारों के कई स्तरों पर कागजी सत्यापन की प्रक्रिया भी पूरी कर ली गई थी.\n\nनारायण राम के अनुसार, सत्यापन पूरा होने के बाद पूरी प्रक्रिया अचानक ठंडे बस्ते में चली गई और आज तक किसी भी चयनित कलाकार को सहायता राशि जारी नहीं की गई. इस प्रशासनिक ढिलाई से कलाकारों में गहरी निराशा और आक्रोश व्याप्त है. उनका कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में छोलिया कला से जुड़े पारंगत कलाकारों की संख्या साल-दर-साल घट रही है. यदि वक्त रहते इस लोक विधा को बचाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इस समृद्ध विरासत को केवल किताबों और पुराने वीडियो में ही देख पाएंगी.\n\nआधुनिक डीजे संस्कृति और परंपरा को बचाने की चुनौतियां\n\nकलाकारों का स्पष्ट विश्लेषण है कि शादी-ब्याह और पारिवारिक समारोहों में मोबाइल फोन, लाउड डीजे और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संगीत के बेलगाम चलन ने पारंपरिक लोक वाद्यों की महत्ता को गहरा आघात पहुंचाया है. पूर्व में जिस छोलिया दल के बिना कोई भी शुभ कार्य अधूरा माना जाता था, अब लोग पश्चिमी धुनों और आधुनिक लाउडस्पीकरों को प्राथमिकता देने लगे हैं. इससे लोक कलाकारों के आय के पारंपरिक स्रोत लगभग समाप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं.\n\nअपनी लुप्तप्राय कला को पुनर्जीवित करने के लिए कलाकारों ने प्रमुख रूप से मांगें रखी हैं कि राज्य के सभी आधिकारिक सांस्कृतिक एवं पर्यटन उत्सवों में छोलिया दलों को अनिवार्य अवसर दिए जाएं, वयोवृद्ध कलाकारों के लिए नियमित पेंशन की व्यवस्था हो, पूर्व प्रस्तुतियों के बकाये भुगतान तुरंत जारी किए जाएं तथा नई पीढ़ी को पारंपरिक ढोल-दमाऊं और छोलिया नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण देने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएं. ढोल और दमाऊं की गूंजती थाप कुमाऊं की ऐतिहासिक आन-बान-शान है, जिसे बचाए रखना पूरे समाज और शासन की सामूहिक जिम्मेदारी है.\n\nइसका आप पर असर\nपारंपरिक छोलिया नृत्य संकट से उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और उससे जुड़े सैकड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है.\n\n• भारत में: यह संकट देश भर में पारंपरिक लोक कलाओं के तेजी से लुप्त होने और डीजे व आधुनिक संगीत के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करता है. इसके चलते राष्ट्रीय स्तर पर लोक कलाकारों के संरक्षण और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा नीतियों की मांग तेज हो रही है.\n• उत्तराखंड में: राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में विवाह और आयोजनों से छोलिया वादकों के बाहर होने से पारंपरिक वाद्ययंत्र और नृत्य विधा विलुप्ति की कगार पर पहुंच रहे हैं. कलाकारों के लिए घोषित आर्थिक सहायता और पेंशन योजनाओं के ठंडे बस्ते में जाने से सैकड़ों परिवारों को अपनी पुश्तैनी कला छोड़कर मजदूरी करने पर मजबूर होना पड़ रहा है.\n• सांस्कृतिक पहचान पर प्रभाव: नई पीढ़ी के इस कला से विमुख होने से कुमाऊं की सदियों पुरानी ऐतिहासिक आन-बान-शान प्रभावित हो रही है. यदि युवाओं को औपचारिक प्रशिक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिला, तो यह विधा केवल अभिलेखागारों तक सीमित रह जाएगी.\n• आम जनता और आयोजकों के लिए: सामाजिक उत्सवों में केवल आधुनिक डीजे पर निर्भरता पारंपरिक लोक संगीत के माहौल को समाप्त कर रही है. स्थानीय परिवारों और आयोजकों द्वारा छोलिया दलों को प्राथमिकता देने से ही इन कलाकारों का सम्मानजनक भरण-पोषण संभव हो सकेगा.\n\nऐसा क्यों हुआ\nकुमाऊं के ऐतिहासिक छोलिया नृत्य और उससे जुड़े कलाकारों के सामने यह संकट आधुनिक मनोरंजन के अंधाधुंध प्रसार, घटते सामाजिक अवसरों और प्रशासनिक उदासीनता के संयुक्त कारणों से उत्पन्न हुआ है.\n\n• आधुनिक मनोरंजन और डीजे संस्कृति: शादियों और मांगलिक अवसरों पर पारंपरिक ढोल-दमाऊं और छोलिया नर्तकों के स्थान पर लाउड डीजे तथा डिजिटल संगीत को प्राथमिकता दी जाने लगी है. इस बदलाव ने कलाकारों के आय के सबसे बड़े और नियमित घरेलू स्रोत को समाप्त कर दिया है.\n• प्रशासनिक लापरवाही और योजनाओं का रुकना: ढोल-दमाऊं बजाने वाले 49 चयनित कलाकारों का बहुस्तरीय सत्यापन पूरा होने के बाद भी सरकारी आर्थिक सहायता प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी. इसके अलावा सरकारी आयोजनों में प्रस्तुतियां देने के बावजूद कलाकारों के बकाये का समय पर भुगतान नहीं किया गया.\n• पेंशन और नीतिगत संरक्षण का अभाव: आजीवन लोक विधा को समर्पित वरिष्ठ कलाकारों के लिए कोई निश्चित वृद्धावस्था पेंशन या कल्याणकारी नीति लागू नहीं हो पाई है. देहरादून में बार-बार प्रयास करने के बाद भी कलाकारों को सरकारी सहायता योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका है.\n• महंगी वेशभूषा और आजीविका की अनिश्चितता: तलवार, ढाल और पारंपारिक वेशभूषा का भारी खर्च खुद वहन करने और कम आमदनी के कारण युवा पीढ़ी इस विधा में भविष्य देखने से बच रही है. इस आर्थिक असुरक्षा ने कई कलाकारों को आजीविका के लिए अन्य कार्यों की तलाश करने पर मजबूर किया है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. छोलिया नृत्य क्या है और यह किस क्षेत्र से संबंधित है?\nछोलिया उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल का एक पारंपरिक युद्ध नृत्य है, जिसे ढोल और दमाऊं की थाप पर तलवार और ढाल लेकर विशेष वेशभूषा में प्रस्तुत किया जाता है.\n\n2. वर्तमान में छोलिया कलाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?\nशादी समारोहों में आमंत्रण घटने, सरकारी सहायता व पेंशन न मिलने और आधुनिक डीजे संस्कृति के कारण कलाकारों के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है.\n\n3. भगत राम कितने वर्षों से नयना देवी मंदिर में प्रस्तुति दे रहे हैं?\nभगत राम पिछले करीब 30 वर्षों से हर वर्ष नैनीताल पहुंचकर मां नयना देवी मंदिर की आरती के दौरान अपने छोलिया दल के साथ प्रस्तुति दे रहे हैं.\n\n4. नैनीताल में कलाकारों के चयन से जुड़ी कौन सी योजना अटकी हुई है?\nढोल-दमाऊं बजाने वाले 49 कलाकारों का चयन और सत्यापन होने के बावजूद सरकारी आर्थिक सहायता की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है.\n\n5. छोलिया कलाकारों की सरकार से मुख्य मांगें क्या हैं?\nकलाकार नियमित पेंशन, समय पर बकाया भुगतान, पारदर्शी आर्थिक सहायता नीति और सरकारी आयोजनों में प्रस्तुति के नियमित अवसर देने की मांग कर रहे हैं.",
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  "category": "उत्तराखंड",
  "publishedAt": "2026-09-20",
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