उत्तराखंड में वीरान होते गांवों और बुजुर्गों के सूनेपन को जीवंत करती फिल्म 'पायर' के असली चेहरों की अनसुनी दास्तान उत्तराखंड के पहाड़ों से युवाओं के पलायन और सूने घरों में अपनों का इंतजार करते बुजुर्गों के दर्द को दर्शाने वाली फिल्म पायर में अभिनय करने वाले पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी की असल पृष्ठभूमि सामने आई है। पहाड़ों की ढलानों पर बसे गांवों में जब घर के जवान बेटे आजीविका की तलाश में दूरदराज के शहरों का रुख कर लेते हैं, तब पीछे छूट जाने वाली बूढ़ी आंखों में सिर्फ एक अंतहीन इंतजार बचता है। उत्तराखंड के इसी गहरे जख्म, उजड़ते देहात और उम्र के आखिरी पहर में तन्हाई से जूझते माता-पिता की पीड़ा को रूपहले पर्दे पर उकेरती फिल्म 'पायर' इन दिनों सिनेप्रेमियों को भीतर तक झकझोर रही है। इस सिनेमाई प्रयास में लगभग 80 साल और 75 साल की उम्र वाले दो स्थानीय बुजुर्ग कलाकारों ने बिना किसी पूर्व नाटकीय प्रशिक्षण के जिस सादगी से अभिनय किया है, उसने आम जनमानस के दिलों को छू लिया है। रोजगार की तलाश, सूना आंगन और एक अंतहीन प्रतीक्षा पटकथा के केंद्र में एक ऐसा असहाय दंपती मौजूद है, जिसका जवान लड़का काम-धंधे के सिलसिले में पैतृक वास छोड़कर परदेस चला जाता है। कैलेंडर के पन्ने पलटते रहते हैं, मौसम बदलते हैं, मगर वह कमाने गया बेटा अपने घर नहीं लौटता। गांव की पथरीली पगडंडियों पर टकटकी लगाए बैठे माता-पिता हर गुजरते दिन के साथ बस उसके कदमों की आहट सुनने को तरसते हैं। शारीरिक अशक्तता और ढलती उम्र की परेशानियों के बीच उन्हें सिर्फ पारिवारिक बिछोह ही नहीं सालता, बल्कि समूचे पर्वतीय अंचल को खोखला कर रहे पलायन की कठोर सच्चाई का सामना भी अकेले दम पर करना पड़ता है। फौज के पूर्व हवलदार और लोकगीत गाने वाली गृहिणी ने निभाया मुख्य किरदार पर्दे पर दादा यानी 'बूबू' की भूमिका पदम सिंह कापड़ी ने निभाई है, जबकि दादी यानी 'आमा' के रूप में हीरा देवी नजर आई हैं। ये दोनों कोई मंझे हुए पेशेवर अभिनेता नहीं हैं, बल्कि उनका ताल्लुक पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील से है। पदम सिंह कापड़ी पूर्व में भारतीय सेना में हवलदार के पद पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं और सेवानिवृत्त होकर अपने गांव में किसानी करते रहे हैं। वहीं हीरा देवी एक साधारण गृहिणी हैं, जो अपने दैनिक जीवन में खेती और पशुपालन संभालती हैं। हीरा देवी को पारंपरिक लोकगीत गाने का भी गहरा शौक रहा है। नियति का संजोग देखिए कि निजी जीवन में ये दोनों ही वरिष्ठ नागरिक कुछ वर्ष पूर्व अपने-अपने वास्तविक जीवनसाथी को हमेशा के लिए खो चुके हैं। असल जीवन में पति-पत्नी नहीं, संकोच के बाद बनी बात सिनेमा के पर्दे पर एक-दूसरे का सहारा बने दिखने वाले पदम सिंह और हीरा देवी के बीच असल जीवन में पति-पत्नी का कोई नाता नहीं है। हीरा देवी अपने पति के निधन के बाद विधवा का जीवन बिता रही हैं और पदम सिंह की धर्मपत्नी भी अब इस दुनिया में नहीं हैं। जब इस परियोजना की शुरुआत हुई, तब हीरा देवी किसी गैर मर्द के साथ पत्नी का अभिनय करने को लेकर काफी असहज और संकोचित थीं। ग्रामीण परिवेश और सामाजिक मान्यताओं के कारण उनके मन में हिचक थी। इसके बाद परिजनों और निर्माण दल ने उन्हें काफी समझाया-बुझाया, जिसके बाद वह इस किरदार को निभाने के लिए राजी हुईं। अभिनय के किसी तय व्याकरण को सीखे बिना दोनों ने अपने जीवन के संचित अनुभवों और स्वाभाविक चेहरों से इन भूमिकाओं को जीवंत बना दिया। मुनस्यारी के ट्रैक से निकली कहानी, बेरीनाग के गांव में फिल्मांकन इस पूरे प्रोजेक्ट की शूटिंग पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील के पुराना थल नामक गांव में की गई। इस कथा का बीजारोपण वर्ष 2017 में हुआ था, जब निर्देशक विनोद कापड़ी मुनस्यारी के समीप ट्रेकिंग पर निकले थे। उस यात्रा के दौरान उनकी भेंट एक ऐसे वास्तविक बुजुर्ग जोड़े से हुई थी, जो अपने वीरान गांव में लगभग तन्हा रह रहे थे। उनके बच्चे भी रोजी-रोटी कमाने के लिए शहरों की ओर जा चुके थे। उस वास्तविक दंपती का नाम तुलसी देवी और पदम सिंह था। उनके बीच का आपसी अनुराग, बेबसी और एकाकीपन निर्देशक के जेहन में गहराई से समा गया, जिसने अंततः इस कहानी का रूप लिया। पहाड़ की मिट्टी से जुड़े चेहरों को मंच देकर उठाई सामाजिक समस्या फिल्मकार विनोद कापड़ी ने बड़े शहरों के मंझे हुए कलाकारों को अनुबंधित करने के बजाय सीधे पहाड़ की आबोहवा में रचे-बसे आम लोगों को कैमरे के सामने खड़ा करने का फैसला किया। इसी निर्णय का नतीजा है कि दृश्य-दर-दृश्य पहाड़ी बोली, दैनिक दिनचर्या, वेशभूषा और बुजुर्गों की संवेदनाएं बिना किसी बनावट के बिल्कुल स्वाभाविक नजर आती हैं। यह कृति महज दो इंसानों का अफसाना नहीं कहती, बल्कि समूचे उत्तराखंड में खाली हो रहे गांवों और वहां बेसहारा छूट रहे बुजुर्गों के संरक्षण को लेकर एक बहुत बड़ा सामाजिक प्रश्न भी खड़ा करती है। इसका आप पर असर यह विषय पर्वतीय क्षेत्रों में बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा और रोजगार के अभाव में खाली होते गांवों की जमीनी हकीकत को उजागर करता है। • उत्तराखंड में: पहाड़ी जिलों के गांवों में रहने वाले बुजुर्गों के अकेलेपन और स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों पर प्रशासनिक व सामाजिक ध्यान आकर्षित होता है। युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार न मिलने से वृद्ध माता-पिता के संरक्षण का संकट गहरा रहा है। • भारत में: देश के विभिन्न ग्रामीण इलाकों से महानगरों की ओर पलायन करने वाले कामकाजी युवाओं को अपने पैतृक घरों में छूट गए माता-पिता की देखरेख के प्रति संवेदनशील बनाता है। सामाजिक स्तर पर वृद्धजनों के कल्याण और पुनर्वास के लिए मजबूत सामुदायिक तंत्र की जरूरत को रेखांकित करता है। • संस्कृतिक धरोहर: पर्वतीय जनजीवन, स्थानीय बोलियों और पारंपरिक जीवनशैली के दस्तावेजीकरण को बढ़ावा मिलता है। स्थानीय गैर-पेशेवर कलाकारों को पहचान मिलने से जमीनी प्रतिभाओं के लिए नए रास्ते खुलते हैं। • प्रवासी समुदाय: दूरदराज शहरों में बसे प्रवासी परिवारों के बीच अपने पैतृक गांवों और बुजुर्गों से जुड़े रहने की भावनात्मक प्रेरणा जगती है। लोग अपने गांवों की सुध लेने और पारिवारिक जड़ों को संभालने के लिए प्रेरित होते हैं। ऐसा क्यों हुआ फिल्म पायर की पटकथा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के अभाव और उसके चलते उपजी भीषण पलायन की समस्या की सीधी उपज है। • पहाड़ों से युवाओं का बहिर्गमन: पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षा और नियमित आजीविका के साधन सीमित होने के कारण युवा पीढ़ी बड़े शहरों की ओर रुख करने को विवश है। इसके परिणामस्वरूप सैकड़ों गांव केवल वृद्ध आबादी के सहारे छूट गए हैं। • मुनस्यारी में वास्तविक मुलाकात: वर्ष 2017 में ट्रेकिंग के दौरान निर्देशक विनोद कापड़ी की मुलाकात तुलसी देवी और पदम सिंह नामक एक वास्तविक बुजुर्ग दंपती से हुई थी, जो वीरान गांव में तन्हा जीवन गुजार रहे थे। उस दंपती की बेबसी और गहरे आपसी जुड़ाव ने फिल्मकार को यह कहानी रचने के लिए प्रेरित किया। • यथार्थवादी सिनेमाई दृष्टिकोण: निर्देशक ने व्यावसायिक चमक-दमक के बजाय वास्तविक पहाड़ी परिवेश और स्थानीय लोगों के स्वाभाविक जीवन को बिना किसी बनावट के पर्दे पर उतारने का संकल्प लिया। इसी सोच के तहत गैर-पेशेवर स्थानीय बुजुर्गों को मुख्य भूमिकाओं में चुना गया। सवाल-जवाब 1. फिल्म पायर में मुख्य आमा और बूबू के किरदार किन कलाकारों ने निभाए हैं? फिल्म में बूबू की भूमिका पूर्व सैन्यकर्मी पदम सिंह कापड़ी ने और आमा का किरदार गृहिणी हीरा देवी ने निभाया है। 2. क्या पर्दे पर बुजुर्ग दंपती का किरदार निभाने वाले कलाकार असल जिंदगी में भी विवाहित हैं? नहीं, वे दोनों असल जीवन में पति-पत्नी नहीं हैं; हीरा देवी एक विधवा हैं और पदम सिंह की पत्नी का पूर्व में देहांत हो चुका है। 3. फिल्म पायर की कहानी का मूल विचार निर्देशक को कब और कैसे मिला था? निर्देशक विनोद कापड़ी को वर्ष 2017 में मुनस्यारी के पास ट्रेकिंग करते समय एक अकेले रह रहे बुजुर्ग दंपती से मिलने के बाद यह विचार मिला था। 4. फिल्म की शूटिंग किस स्थान पर की गई है? इस फिल्म का फिल्मांकन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की बेरीनाग तहसील के पुराना थल गांव में किया गया है। 5. हीरा देवी ने शुरुआत में इस भूमिका को स्वीकार करने में संकोच क्यों किया था? हीरा देवी किसी अन्य पुरुष के साथ पत्नी का अभिनय करने को लेकर सामाजिक एवं व्यक्तिगत रूप से सहज महसूस नहीं कर रही थीं। https://trendkia.com/uttarakhand/uttarakhand-men-virana-hote-ganvon-aura-bujurgon-ke-sunepana-ko-jivnta-karati-philma-pyre-ke-asali-cheharon-ki-anasuni-dastana-54976 TrendKia — Har trend, sabse pehle.