नादिया सर्किट हाउस से सांसद को बाहर निकालने के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा को नादिया के सर्किट हाउस से कथित तौर पर निकाले जाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य पक्षों से एक हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा को नादिया स्थित सर्किट हाउस से कथित तौर पर बाहर निकाले जाने के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। 1 अक्टूबर को हुई अदालती कार्यवाही के दौरान शीर्ष अदालत ने राज्य प्रशासन से जुड़े अधिकारियों द्वारा सांसद का कमरा खाली कराए जाने के आरोपों पर संज्ञान लिया। कृष्णानगर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाली सांसद का कहना है कि राज्य सरकार के स्वामित्व वाले इस परिसर में उनके नाम पर विधिवत एक कमरा आवंटित था, इसके बावजूद जिला प्रशासन के अधिकारियों ने उन्हें वहां से हटने पर मजबूर किया। शीर्ष अदालत ने एक सप्ताह में मांगा लिखित जवाब इस मामले की सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष संपन्न हुई। अदालती कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार तथा केंद्र की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि वे सांसद द्वारा दायर याचिका पर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करेंगे। पीठ ने निर्देश दिया कि सभी संबंधित पक्ष एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब अदालत में प्रस्तुत करें। इसके साथ ही पीठ ने यह व्यवस्था भी दी कि प्रतिवादियों का जवाब आने के बाद याचिकाकर्ता महुआ मोइत्रा को अगले एक सप्ताह के अंदर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने की छूट होगी, जिसके बाद इस पूरे प्रकरण को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। 14 अगस्त की रात परिसर में जमा हुई थी भारी भीड़ इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें 14 अगस्त की रात के वाकये से जुड़ी हैं, जिसका ब्योरा सांसद ने उस समय सोशल मीडिया पर साझा किया था। उन्होंने अपनी पोस्ट में दावा किया था कि नादिया के सर्किट हाउस के बाहर बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हो गए थे। जब सांसद ने परिसर छोड़ने से साफ मना कर दिया, तो उस भीड़ द्वारा वहां पर ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए जाने लगे। मोइत्रा के अनुसार, कमरे का वैध आवंटन होने के बावजूद उन पर जगह खाली करने का भारी दबाव बनाया जा रहा था। लोकसभा अध्यक्ष से भी की गई थी सीधे हस्तक्षेप की मांग प्रशासनिक अधिकारियों के रवैये को लेकर सांसद ने संसद स्तर पर भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक औपचारिक पत्र भेजकर नादिया जिला प्रशासन की कार्यशैली की शिकायत की थी। पत्र में आरोप लगाया गया था कि प्रशासनिक तंत्र उन्हें सरकारी परिसर से बेदखल करने की लगातार कोशिशें कर रहा है, इसलिए आसन को इस मसले में दखल देना चाहिए। अब यह विवाद देश की शीर्ष अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है, जहां राज्य प्रशासन को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा। इसका आप पर असर यह अदालती कार्रवाई जनप्रतिधियों के प्रोटोकॉल और सरकारी अतिथि गृहों के आवंटन नियमों की प्रशासनिक जवाबदेही को रेखांकित करती है। • भारत में: निर्वाचित जनप्रतिधियों के प्रशासनिक अधिकारों और सरकारी संपत्तियों के उपयोग से जुड़े नियमों को लेकर न्यायिक स्पष्टता बढ़ेगी। इससे यह तय होगा कि जिला प्रशासन किस सीमा तक स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं में हस्तक्षेप कर सकता है। • पश्चिम बंगाल में: नादिया और राज्य के अन्य जिलों में प्रशासनिक अधिकारियों के कामकाज और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों की न्यायिक समीक्षा होगी। राज्य सरकार को एक हफ्ते के भीतर अदालत में अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट करना होगा। • सांसदों के प्रोटोकॉल पर: सरकारी विश्राम गृहों में सांसदों के ठहरने और वैध आवंटन के बावजूद जबरन खाली कराने की शिकायतों पर सख्त नजीर बन सकती है। लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित विशेषाधिकार शिकायतों को भी इससे कानूनी आधार मिल सकता है। • आम जनता और प्रशासन: सरकारी गेस्ट हाउस आवंटन में पारदर्शिता और विवाद की स्थिति में नागरिकों व अधिकारियों के कानूनी दायित्व स्पष्ट होंगे। प्रशासन द्वारा किसी भी परिसर को खाली कराने के लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य रहेगा। ऐसा क्यों हुआ यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने नादिया जिला प्रशासन पर उन्हें वैध आवंटन के बावजूद सर्किट हाउस से जबरन बेदखल करने का गंभीर आरोप लगाया। प्रशासन और सांसद के बीच उपजे इस टकराव के बाद मामला अदालत तक पहुंच गया। • आवंटित कमरे से बेदखली का आरोप: सांसद का कहना है कि कृष्णानगर में उनके प्रवास के लिए राज्य सरकार के सर्किट हाउस में विधिवत कमरा दिया गया था। इसके बावजूद स्थानीय जिला प्रशासन के अधिकारियों ने उन पर परिसर खाली करने का अनुचित दबाव बनाया। • 14 अगस्त की रात का टकराव: मोइत्रा के अनुसार, जब उन्होंने कमरा छोड़ने से इनकार कर दिया तो सर्किट हाउस के बाहर भीड़ जमा हो गई। भीड़ द्वारा नारेबाजी किए जाने और बढ़ते तनाव के चलते स्थिति गंभीर हो गई, जिसके बाद उन्होंने सार्वजनिक तौर पर विरोध दर्ज कराया। • प्रशासनिक समाधान न मिलना: मामले की शिकायत लोकसभा अध्यक्ष से करने के बावजूद जब प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर न्यायिक हस्तक्षेप की गुहार लगाई। सवाल-जवाब 1. सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को क्या निर्देश दिया है? अदालत ने तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा की याचिका पर पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य पक्षों को एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है. 2. महुआ मोइत्रा ने अपनी याचिका में क्या मुख्य आरोप लगाया है? उन्होंने आरोप लगाया है कि कमरा विधिवत आवंटित होने के बावजूद नादिया जिला प्रशासन ने उन्हें सर्किट हाउस से बाहर निकाल दिया. 3. इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की किस पीठ ने की? इस याचिका पर सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की. 4. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में क्या कहा? तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि वे केंद्र और राज्य सरकार की ओर से इस याचिका पर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करेंगे. 5. 14 अगस्त की रात को सर्किट हाउस में क्या हुआ था? मोइत्रा के अनुसार, परिसर के बाहर भारी भीड़ जुट गई थी और उनके कमरा खाली करने से मना करने पर 'जय श्री राम' के नारे लगाए जा रहे थे. 6. मोइत्रा ने इस विवाद को लेकर लोकसभा अध्यक्ष से क्या अनुरोध किया था? उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर जिला प्रशासन द्वारा जबरन कमरा खाली कराने के प्रयास में दखल देने की मांग की थी. https://trendkia.com/west-bengal/nadia-circuit-house-se-sansada-ko-bahara-nikalane-ke-mamale-men-west-bengal-sarakara-ko-supreme-court-ka-notisa-41200 TrendKia — Har trend, sabse pehle.