अंटार्कटिका के थ्वाइट्स ग्लेशियर के तेजी से पिघलने पर वैज्ञानिकों ने जताई गहरी चिंता, दुनिया भर के तटीय इलाकों में संकट की आहट अंटार्कटिका का विशाल थ्वाइट्स ग्लेशियर अनुमान से कहीं अधिक तेजी से पिघल रहा है, जिसके ढहने से समुद्र का जलस्तर कई फीट बढ़कर तटीय महानगरों को डुबो सकता है. अंटार्कटिका के पश्चिमी छोर पर स्थित विशाल थ्वाइट्स ग्लेशियर को लेकर सामने आए ताजा वैज्ञानिक विश्लेषण ने पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है. बर्फ की यह भीमकाय संरचना उम्मीद से कहीं अधिक रफ्तार से पिघल रही है. वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र के जलस्तर में होने वाली संभावित बढ़ोतरी को लेकर अब तक लगाए गए तमाम अनुमान जरूरत से ज्यादा कम आंके गए थे. भारत के तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्यों के क्षेत्रफल के बराबर फैला यह ग्लेशियर वैश्विक पर्यावरण संतुलन के लिहाज से बेहद नाजुक स्थिति में पहुंच चुका है, जिसकी वजह से वैज्ञानिक हलकों में इसे कयामत का ग्लेशियर यानी डूम्सडे ग्लेशियर के नाम से भी पुकारा जाता है. ग्लेशियर की जमीनी पकड़ और नए शोध के निष्कर्ष कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी और नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी के शोधकर्ताओं ने बर्फ की चादरों के व्यवहार को सटीकता से समझने के लिए एक आधुनिक वैज्ञानिक मॉडल विकसित किया है. इस नए मॉडल के जरिए किए गए अध्ययन में पाया गया कि ग्लेशियर के सबसे निचले हिस्से, जहां समुद्री जल और जमीन का संपर्क होता है, वहां तेजी से संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं. समुद्र के भीतर बर्फ की पकड़ को थामे रखने वाली एक प्रमुख चट्टानी उभार पर ग्लेशियर की पकड़ लगातार कमजोर पड़ती जा रही है. जब गर्म पानी ग्लेशियर के भीतरी आधार तक पैठ बनाता है, तो पिघलन की गति सतह के मुकाबले कई गुना बढ़ जाती है, जिससे ग्लेशियर की पूरी स्थिरता को भारी खतरा पैदा हो रहा है. समुद्र स्तर में अप्रत्याशित उछाल का खतरा थ्वाइट्स ग्लेशियर में बर्फ का इतना विशाल भंडार मौजूद है कि यदि यह पूरी तरह पिघलकर बह जाए, तो दुनिया भर के महासागरों का जलस्तर सीधे तौर पर दो फीट से अधिक बढ़ सकता है. यह आंकड़ा अकेला ही तटीय भूगोल को बदलने के लिए काफी है, लेकिन वास्तविक खतरा इससे भी कहीं अधिक व्यापक है. थ्वाइट्स ग्लेशियर दरअसल पश्चिमी अंटार्कटिका की संपूर्ण बर्फ की चादर के लिए एक प्राकृतिक दीवार या अवरोधक का काम करता है. यह विशालकाय बर्फ को तेजी से खिसक कर खुले समुद्र में गिरने से रोकता है. यदि यह सुरक्षात्मक अवरोध टूट जाता है, तो आसपास मौजूद बर्फ का एक विशाल हिस्सा धीरे-धीरे समुद्र में समा जाएगा. वैज्ञानिकों के दीर्घकालिक आकलनों के अनुसार, ऐसी श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू होने पर वैश्विक समुद्री जलस्तर में लगभग 10 फीट तक की विनाशकारी वृद्धि देखने को मिल सकती है, जो भविष्य के लिए एक भयानक परिदृश्य तैयार करती है. तटीय महानगरों के अस्तित्व पर गहराता संकट समुद्र के स्तर में होने वाली छोटी सी वृद्धि भी महासागरों के तट पर बसे घनी आबादी वाले शहरों के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है. जब जलस्तर ऊंचा उठेगा, तो समुद्री तूफानों के दौरान उठने वाली तूफानी लहरें तटबंधों को तोड़कर अंदरूनी बस्तियों तक पहुंच जाएंगी, जिससे भारी बाढ़ और तटीय भूमि का लगातार कटाव होगा. संयुक्त राज्य अमेरिका के मियामी से लेकर फिलीपींस की राजधानी मनीला जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय शहरों के बड़े इलाके इस जल प्रलय की सीधी जद में आ सकते हैं. भारत समेत एशियाई देशों के किनारे बसे महानगरों को भी लगातार आती विनाशकारी बाढ़ और पीने के पानी में समुद्री खारेपन के घुलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. आगामी कदम और उत्सर्जन कटौती की अनिवार्यता शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि बर्फ की चादर के नीचे मौजूद जटिल और दुर्गम परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने के लिए अभी और अधिक वैज्ञानिक परीक्षणों की जरूरत है. हालांकि, उपलब्ध साक्ष्य इस बात की ओर कड़ा इशारा कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के खतरों को सीमित करने के लिए अब कोई भी ढिलाई भारी पड़ सकती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तत्काल और कठोर कटौती किए बिना इन हिमनदों को बचाना असंभव होगा. आज उठाए जाने वाले ठोस नीतिगत कदम ही आने वाले दशकों में मानवता को किसी अभूतपूर्व पर्यावरणीय आपदा से बचा सकते हैं. इसका आप पर असर थ्वाइट्स ग्लेशियर के तेजी से पिघलने का सीधा असर दुनिया भर के तटीय शहरों और मौसम तंत्र पर पड़ सकता है. • तटीय शहरों के लिए खतरा: समुद्र का जलस्तर दो फीट से लेकर 10 फीट तक बढ़ सकता है. इससे निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों को विस्थापन और भीषण बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है. • तूफानी लहरों का बढ़ता विनाश: समुद्र के स्तर में मामूली बढ़ोतरी भी समुद्री चक्रवातों को कहीं ज्यादा घातक बना देगी. तटीय बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और घरों को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचेगा. • पीने के पानी का संकट: बढ़ता समुद्री पानी नदियों और जमीन के भीतर मौजूद मीठे जल स्रोतों में प्रवेश कर जाएगा. इससे तटीय बस्तियों में पीने के पानी और खेती योग्य जमीन की उर्वरता पर गंभीर असर पड़ेगा. • भारत में तटीय राज्यों पर असर: मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे विशाल तटीय महानगरों के लिए जलभराव का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा. समुद्र के किनारे बसे मछुआरों और स्थानीय उद्योगों को सुरक्षात्मक तटबंधों की भारी दरकार होगी. ऐसा क्यों हुआ थ्वाइट्स ग्लेशियर के तेजी से अस्थिर होने के पीछे समुद्री तापमान में वृद्धि और इसके भीतरी आधार की कमजोर होती पकड़ प्रमुख कारण हैं. • गर्म समुद्री जल का प्रभाव: समुद्र की गर्म धाराएं ग्लेशियर के निचले हिस्से तक पहुंच रही हैं. यह पानी उस सतह को तेजी से गला रहा है जहां बर्फ जमीन से सटी होती है. • चट्टानी सहारे का कमजोर पड़ना: बर्फ को रोके रखने वाले प्राकृतिक भूमिगत चट्टानी उभार पर पकड़ ढीली हो रही है. इसके हटने से ग्लेशियर तेजी से समुद्र की ओर फिसलने लगता है. • पुराने मॉडलों की सीमित समझ: पूर्व के वैज्ञानिक मॉडल बर्फ के नीचे होने वाली जटिल भौतिक प्रक्रियाओं का पूरा आकलन नहीं कर पाए थे. नए अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि पिघलने की गति पूर्व अनुमानों से काफी तेज है. • ग्रीनहाउस गैसों का संचय: मानवीय गतिविधियों के कारण वातावरण में लगातार बढ़ रही ग्रीनहाउस गैसें महासागरों को गर्म कर रही हैं. यही वैश्विक तापमान वृद्धि ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के पिघलने की मुख्य वजह बनी हुई है. सवाल-जवाब 1. थ्वाइट्स ग्लेशियर को 'कयामत का ग्लेशियर' क्यों कहा जाता है? इसके पूरी तरह ढहने से समुद्र का स्तर दो फीट से अधिक बढ़ सकता है और अन्य बर्फ पिघलने पर यह 10 फीट तक पहुंच सकता है, जिससे भारी तबाही मच सकती है. 2. थ्वाइट्स ग्लेशियर का आकार कितना बड़ा है? इस ग्लेशियर का आकार भारत के तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के क्षेत्रफल जितना विशाल है. 3. यह नया शोध किन संस्थानों के वैज्ञानिकों ने किया है? यह नया अध्ययन कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी और नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित नए मॉडल पर आधारित है. 4. ग्लेशियर के नीचे कौन सी मुख्य समस्या देखी गई है? ग्लेशियर के नीचे समुद्र और जमीन के संपर्क वाले हिस्से में बदलाव हो रहे हैं और चट्टानी उभार पर बर्फ की पकड़ लगातार कमजोर हो रही है. 5. किन अंतरराष्ट्रीय शहरों पर डूबने का खतरा बताया गया है? समुद्र का स्तर बढ़ने से अमेरिका के मियामी से लेकर फिलीपींस के मनीला तक कई प्रमुख तटीय शहर जलमग्न होने के खतरे में आ सकते हैं. 6. इस तबाही को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने क्या सुझाव दिया है? विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तत्काल और भारी कटौती जरूरी है. https://trendkia.com/world/antarctica-ke-thwaites-glacier-ke-teji-se-pighalane-para-vaijnanikon-ne-jatai-gahari-chinta-duniya-bhara-ke-tatiya-ilakon-men-snka-48441 TrendKia — Har trend, sabse pehle.