अफ्रीका को छोटा दिखाने वाला 450 साल पुराना नक्शा अब संयुक्त राष्ट्र ने ठुकराया संयुक्त राष्ट्र की महासभा में 164 देशों ने उस सदियों पुराने नक्शे को छोड़ने के पक्ष में वोट डाला है जो अफ्रीका को असल से कहीं छोटा दिखाता रहा है, जबकि अमेरिका ने इसका विरोध किया। अगली बार जब आप दुनिया का नक्शा देखें तो ज़रा गौर से देखिएगा, क्योंकि बचपन से जो नक्शा हम सब देखते आए हैं वो अब बदलने वाला है। जमीन पर कुछ नहीं बदलेगा, न कोई सीमा खिसकेगी और न किसी देश की एक इंच ज़मीन कम होगी, लेकिन कागज़ पर महाद्वीपों का आकार-प्रकार अब ठीक होने वाला है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र ने मान लिया है कि क्लासरूम की दीवारों पर टंगा, किताबों में छपा और फोन के ऐप्स में बसा नक्शा करीब साढ़े चार सौ साल से दुनिया की सही तस्वीर नहीं दिखा रहा था। न्यूयॉर्क में हुई वोटिंग इस पुराने नक्शे को हटाने की मांग, जिसे तकनीकी भाषा में मर्केटर प्रोजेक्शन कहा जाता है, न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा तक पहुंच गई। पुराने नक्शे को छोड़ने का एक प्रस्ताव वोटिंग के लिए रखा गया, जिसके पक्ष में 164 देशों ने वोट डाला। सिर्फ अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया, जबकि 6 देशों ने कोई राय नहीं दी। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पास होने का मतलब यह नहीं कि किसी देश को तुरंत नक्शा बदलना पड़ेगा, क्योंकि ऐसा कोई नियम नहीं है कि स्कूल या सरकार किस नक्शे का इस्तेमाल करे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की मुहर का वजन होता है, इससे स्कूल-कॉलेजों, सरकारी दस्तावेज़ों, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और टेक कंपनियों के मैप ऐप्स तक में अब सुधरा हुआ नक्शा अपनाए जाने का रास्ता खुल गया है। विवाद शुरू कहां से हुआ यह मामला संयुक्त राष्ट्र में यूं ही नहीं पहुंचा, इसकी शुरुआत अफ्रीकी देशों की उस शिकायत से हुई जो बरसों से चली आ रही थी, कि आम इस्तेमाल होने वाला नक्शा अफ्रीका को असल से कहीं छोटा दिखाता है, उसे सिकोड़ कर और पिचका कर पेश करता है जबकि असल में यह महाद्वीप बहुत विशाल है। अफ्रीकी संघ ने इसे लेकर अभियान चलाया, टोगो ने औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र की महासभा में रखा, और फ्रांस ने इसका साथ दिया। उनकी दलील सिर्फ दिखावे भर की नहीं थी, उनका कहना था कि नक्शा केवल कागज़ का टुकड़ा नहीं होता, यह लोगों के दिमाग में दुनिया की जो तस्वीर बैठाता है वह लंबे समय तक बनी रहती है। एक बिगड़ा हुआ नक्शा चुपचाप यह धारणा बना देता है कि कौन सा इलाका बड़ा और अहम है और कौन सा छोटा और कमतर। इसी सोच से ऑनलाइन #correctthemap नाम का अभियान भी चला, जिसमें लोगों ने बताया कि अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और यूरोप का बड़ा हिस्सा मिलाकर भी अफ्रीका की रूपरेखा के भीतर समा जाएं तो जगह बच जाएगी, जो पुराना नक्शा देखकर कभी समझ नहीं आता। गोल धरती को सपाट कागज़ पर उतारने की दिक्कत नक्शा इस हाल में क्यों पहुंचा, यह समझने के लिए पहले उस बुनियादी मुश्किल को समझना होगा जिससे नक्शा बनाने वाले हमेशा जूझते रहे हैं, धरती संतरे की तरह गोल है जबकि नक्शा बनाना है सपाट कागज़ पर। किसी संतरे का छिलका एक टुकड़े में उतारकर टेबल पर सपाट बिछाने की कोशिश करें, तो वह ऊपर और नीचे से फट जाएगा, जबकि बीच का हिस्सा, जहां उभार सबसे ज़्यादा था, कमोबेश अपनी शक्ल बनाए रखेगा। धरती के नक्शे को सपाट करने में भी यही हुआ। भूमध्य रेखा के आसपास, जहां धरती सबसे ज़्यादा उभरी हुई है और जहां अफ्रीका मौजूद है, आकार लगभग सही बना रहा। लेकिन भूमध्य रेखा से दूर, उत्तरी ध्रुव की तरफ बढ़ते देशों को सपाट कागज़ पर भरने के लिए खींचना और फैलाना पड़ा, और यही खिंचाव है जिसकी वजह से रूस, ग्रीनलैंड और कनाडा नक्शे पर बहुत बड़े दिखते हैं। इस नक्शे को बनाने वाला फ्लेमिश नक्शानवीस जो सपाट नक्शा पूरी दुनिया में फैला, वह एक शख्स की देन है, गेरार्डस मर्केटर नाम के फ्लेमिश नक्शानवीस ने इसे 1569 में बनाया था, यही वजह है कि आज भी इसे मर्केटर प्रोजेक्शन कहा जाता है। मर्केटर का मकसद हर देश का सही आकार दिखाना नहीं था, वे एक अलग समस्या सुलझा रहे थे, समुद्री यात्रा की। उस दौर में समुद्र में निकलने वाले जहाज़ों को अपनी मंज़िल तक पहुंचने का सबसे छोटा और सीधा रास्ता चाहिए होता था, और मर्केटर के नक़्शे पर एक सीधी लाइन खींचकर और कंपस की सुई उसी दिशा में रखकर नाविक अपनी मंज़िल तक पहुंच सकते थे। समुद्री यात्रियों और जहाज़ चलाने वालों के लिए यह बेहद काम का औज़ार साबित हुआ, और यही वजह है कि यह नक्शा दुनिया भर में फैल गया, स्कूलों की दीवारों पर टंगा, किताबों में छपा और आगे चलकर आज के गूगल मैप्स जैसे टूल्स में भी शामिल हो गया। आकार में कितना बड़ा फर्क है दिक्कत यह है कि जिस प्रोजेक्शन ने कंपस से दिशा तय करना आसान बनाया, उसी ने देशों के आकार को बुरी तरह बिगाड़ भी दिया, और भूमध्य रेखा से जितना दूर जाएं, यह गड़बड़ी उतनी बढ़ती जाती है। मिसाल के तौर पर, आम नक्शे पर ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखता है, जबकि असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब चौदह गुना बड़ा है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका दोनों फूले हुए दिखते हैं, रूस और कनाडा अपने असली आकार से कहीं ज़्यादा फैले हुए नज़र आते हैं, जबकि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और भूमध्य रेखा के पास बसे देश असल से छोटे और सिकुड़े हुए दिखाए जाते रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इस नक्शे ने साढ़े चार सौ साल तक यह धारणा बनाए रखी कि उत्तरी गोलार्ध में असल से ज़्यादा ज़मीन है, जबकि भूमध्य रेखा के पास के महाद्वीप कागज़ पर भले ही सिकुड़ गए हों, हकीकत में उनकी एक इंच ज़मीन भी कम नहीं हुई। आगे क्या बदलेगा यह नक्शा शुरुआत में सिर्फ एक काम के लिए बनाया गया था, समुद्र में जहाज़ों को दिशा दिखाने के लिए, लेकिन वक़्त के साथ यही दुनिया की डिफ़ॉल्ट तस्वीर बन गया और भूगोल की किताबों से लेकर खबरों तक हर जगह छा गया। अब संयुक्त राष्ट्र की महासभा में प्रस्ताव पास होने के बाद किसी भी देश पर तुरंत नक्शा बदलने की बाध्यता नहीं है, और अमेरिका पहले ही साफ कर चुका है कि वह इस बदलाव के पक्ष में नहीं है। इसके बावजूद, इस वोटिंग ने वह ज़मीन तैयार कर दी है जिस पर स्कूल-कॉलेज, सरकारी विभाग, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं और डिजिटल मैप बनाने वाली टेक कंपनियां धीरे-धीरे उस नक्शे की तरफ बढ़ सकती हैं जो अफ्रीका जैसे महाद्वीपों का असली आकार दिखाए, न कि साढ़े चार सौ साल पहले नाविकों के लिए बनाए गए उस प्रोजेक्शन का, जिसे दुनिया अब तक देखती आई है। जिसने भी कभी दीवार पर टंगा नक्शा देखा है, स्कूल में भूगोल पढ़ा है या किसी किताब में दुनिया का नक़्शा पलटा है, उसके लिए यह बदलाव आखिरकार तस्वीर को असली धरती के करीब ले आएगा। इसका आप पर असर यह बदलाव किसी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को रातों-रात नहीं बदलेगा, लेकिन दुनिया को पढ़ाने, छापने और दिखाने के तरीके पर असर ज़रूर डालेगा, भारत में भी। • छात्र और किताबें: जैसे ही स्कूल, कॉलेज और प्रकाशक सुधरा हुआ नक्शा अपनाना शुरू करेंगे, भूगोल की किताबों और एटलस में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और भूमध्य रेखा के पास के देश असली आकार के करीब दिखने लगेंगे। नई किताब से भूगोल पढ़ने वाले बच्चों को अफ्रीका पहले से काफी अलग और बड़ा दिखेगा। • मैप ऐप्स और डिजिटल टूल: मैप बनाने वाली टेक कंपनियां, जिनमें गूगल मैप्स जैसे टूल भी शामिल हैं जो मिलते-जुलते प्रोजेक्शन इस्तेमाल करते हैं, आगे चलकर सुधरा नक्शा अपना सकती हैं। इस्तेमाल करने वालों को देशों का आकार पहले से अलग दिख सकता है। • अभी बदलाव जबरन नहीं: चूंकि अमेरिका ने इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया है और किसी देश पर कोई नक्शा अपनाने की बाध्यता नहीं है, इसलिए मर्केटर जैसा पुराना नक्शा फिलहाल कई जगह दिखता रहेगा। पुरानी किताब या एटलस तुरंत बदलने की ज़रूरत नहीं है। • सरकारी दस्तावेज़ और संस्थाएं: रिपोर्ट या प्रेजेंटेशन में दुनिया का नक्शा इस्तेमाल करने वाले सरकारी विभागों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के पास अब सुधरा नक्शा अपनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी का आधार है। इससे भारत सहित कई देशों में आधिकारिक दस्तावेज़ों में नक्शा दिखाने का तरीका धीरे-धीरे बदल सकता है। • आम जागरूकता: अगली बार जब कहीं दुनिया का नक्शा शेयर या छपा हुआ दिखे, तो यह परखने की वजह बन गई है कि क्या उसमें अफ्रीका, ग्रीनलैंड, रूस और कनाडा जैसे देश अपने असली अनुपात में दिखाए गए हैं। ऐसा क्यों हुआ यह गड़बड़ी कोई गलती या हादसा नहीं है, बल्कि सीधे उस तरीके का नतीजा है जो गेरार्डस मर्केटर ने 1569 में समुद्री यात्रा की एक दिक्कत सुलझाने के लिए अपनाया था, और इसे अब ठीक करने की मांग किसी अचानक फैसले से नहीं बल्कि एक तय अभियान से निकली है। • सीधा कारण गणितीय है, राजनीतिक नहीं: गोल धरती को सपाट कागज़ पर उतारते समय हर जगह का आकार और साइज़ एक साथ सही नहीं रखा जा सकता। मर्केटर के प्रोजेक्शन ने नाविकों के लिए सीधी दिशा वाली लाइनें तो सही रखीं, लेकिन इसकी कीमत यह चुकानी पड़ी कि भूमध्य रेखा से दूर की ज़मीन को सपाट कागज़ पर भरने के लिए खींचना पड़ा। • इस वोटिंग तक पहुंचने की कड़ी: अफ्रीकी देश लंबे समय से शिकायत करते रहे कि आम नक्शा अफ्रीका को असल से छोटा दिखाता है। अफ्रीकी संघ ने इस शिकायत पर अभियान चलाया, टोगो ने औपचारिक प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र की महासभा में रखा, और फ्रांस ने इसका साथ दिया, जिससे बरसों पुरानी नाराज़गी आखिरकार एक औपचारिक वोटिंग में बदल गई। • ऑनलाइन दबाव ने रफ्तार दी: #correctthemap अभियान ने इस दलील को आम लोगों तक पहुंचाया, अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मेक्सिको और यूरोप के बड़े हिस्से को अफ्रीका की रूपरेखा के भीतर फिट करके दिखाकर, ताकि सिर्फ नक्शा बनाने वालों को नहीं बल्कि आम लोगों को भी गड़बड़ी का अंदाज़ा हो सके। • ऐसे प्रस्ताव के बाद आमतौर पर क्या होता है: चूंकि यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है, इसलिए बदलाव आमतौर पर धीरे-धीरे होता है, जैसे-जैसे स्कूल, सरकारें और कंपनियां अपनी सामग्री खुद अपडेट करने का फैसला लेती हैं, न कि किसी तय समयसीमा के दबाव में। सवाल-जवाब 1. दुनिया का नक्शा क्यों बदला जा रहा है? क्योंकि ज़्यादातर इस्तेमाल होने वाला मर्केटर प्रोजेक्शन वाला नक्शा कुछ देशों को असल से कहीं बड़ा और कुछ को, खासकर अफ्रीका को, असल से बहुत छोटा दिखाता है। 2. इसे बदलने के लिए वोटिंग कहां और किसने की? न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा में इस प्रस्ताव पर वोटिंग हुई, जिसके पक्ष में 164 देशों ने वोट डाला। 3. क्या सभी देशों ने इस बदलाव का समर्थन किया? नहीं, अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया और 6 देशों ने कोई राय नहीं दी। 4. यह मूल नक्शा किसने और कब बनाया था? फ्लेमिश नक्शानवीस गेरार्डस मर्केटर ने इसे 1569 में बनाया था, इसीलिए इसे मर्केटर प्रोजेक्शन कहा जाता है। 5. यह नक्शा शुरू में ऐसा क्यों बनाया गया था? यह समुद्री जहाज़ों के लिए बनाया गया था ताकि नाविक नक़्शे पर सीधी लाइन खींचकर एक ही दिशा में चलते हुए अपनी मंज़िल तक पहुंच सकें। 6. ग्रीनलैंड के मुकाबले अफ्रीका असल में कितना बड़ा है? नक्शे पर दोनों लगभग बराबर दिखते हैं, लेकिन असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब चौदह गुना बड़ा है। 7. क्या हर जगह नक्शा तुरंत बदल जाएगा? नहीं, यह अपनाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन इस प्रस्ताव से स्कूलों, सरकारों, संस्थाओं और टेक कंपनियों के लिए धीरे-धीरे सुधरा हुआ नक्शा अपनाने का रास्ता खुल गया है। https://trendkia.com/world/aphrika-ko-chhota-dikhane-vala-450-sala-purana-naksha-aba-united-nations-ne-thukaraya-29419 TrendKia — Har trend, sabse pehle.