# बीजिंग के समुद्री दबदबे को चुनौती देते हुए नई दिल्ली ने कसा इंडो-पैसिफिक सुरक्षा का शिकंजा

> दशकों तक समुद्री विवादों से दूरी बनाए रखने के बाद, भारत ने साउथ चाइना सी में एक कड़ा रुख अपनाते हुए चीन की आक्रामकता को सीधे चुनौती दी है। फिलीपींस को घातक ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के कड़े समर्थन के जरिए नई दिल्ली इस क्षेत्र का रणनीतिक संतुलन पूरी तरह से बदल रही है।

**Type:** article · **Category:** दुनिया · **Published:** 2026-07-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/world/beijing-ke-samudri-dabadabe-ko-chunauti-dete-hue-new-delhi-ne-kasa-indo-pacific-suraksha-ka-shiknja-9520 · **Language:** Hindi
**Tags:** साउथ चाइना सी विवाद, भारत चीन तनाव, ब्रह्मोस मिसाइल डील, शी जिनपिंग, इंडो पैसिफिक सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून

एशियाई भू-राजनीति में एक बहुत बड़ा और निर्णायक बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों तक अंतरराष्ट्रीय समुद्री विवादों से एक सुरक्षित कूटनीतिक दूरी बनाए रखने के बाद नई दिल्ली ने अब एक बेहद आक्रामक, मजबूत और स्पष्ट रुख अख्तियार कर लिया है। विवादों से घिरे विशाल समुद्री क्षेत्र पर बीजिंग के लगातार बढ़ते अनुचित दावों और मनमानी पर लगाम लगाने का सही समय अब आ गया है। शी जिनपिंग के नेतृत्व वाले प्रशासन के लिए भारत का यह अचानक लिया गया कड़ा फैसला किसी गहरे और अप्रत्याशित झटके से कम नहीं है। इस नए रणनीतिक घटनाक्रम ने उन तमाम छोटे एशियाई मुल्कों के भीतर एक नई उम्मीद जगा दी है जो लंबे समय से लगातार चीनी आक्रामकता का दंश झेल रहे हैं। कूटनीतिक हलकों में इसे ड्रैगन के फन को कुचलने वाली उन पांच चाणक्य रणनीतियों के रूप में देखा जा रहा है जो पूरे इलाके का शक्ति संतुलन पूरी तरह से पलट कर रख देंगी और चीन से त्रस्त देशों को एक नई ताकत प्रदान करेंगी।

## भारतीय कूटनीति के आर्थिक हित और वैश्विक नियम

नई दिल्ली ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि वह इस क्षेत्र में किसी भी तरह की दादागिरी अब बर्दाश्त नहीं करेगा। भारतीय कूटनीति का मूल मंत्र यही है कि जितने भी समुद्री विवाद हैं उन्हें हर हाल में बातचीत के जरिए शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया जाना चाहिए। पूरे इंडो-पैसिफिक इलाके को स्वतंत्र, खुला और सभी के लिए सुरक्षित बनाए रखने के वास्ते यह नितांत आवश्यक है कि सभी देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पूरी तरह से सम्मान करें और उनका पालन करें। अतीत के सालों में भारत अक्सर इन झमेलों से खुद को दूर रखना ही बेहतर समझता था। लेकिन आज के समय में जब भारतीय अर्थव्यवस्था एक तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है तो उसके रणनीतिक और व्यापारिक हित भी उसी अनुपात में बहुत विशाल होते जा रहे हैं। भारत का लगभग आधा समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर होने वाली कोई भी उथल-पुथल सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचा सकती है। यह महज किसी दूसरे देश के विवाद में दखलंदाजी का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत के अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों की सुरक्षा का मसला बन चुका है। जिस तेजी से भारतीय कारखाने और बाजार विदेशी व्यापार पर निर्भर हो रहे हैं, उसे देखते हुए समुद्री रास्तों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। यही कारण है कि भारत को इस इलाके की हर हलचल पर पैनी नजर रखने और जरूरत पड़ने पर अपनी जोरदार आवाज बुलंद करने का पूरा कानूनी और नैतिक अधिकार है। बीजिंग के पास ऐसी कोई हैसियत नहीं है कि वह नई दिल्ली को इस मुद्दे पर किसी भी तरह की कोई नसीहत दे सके।

## अंतरराष्ट्रीय अदालत के ऐतिहासिक फैसले का अपमान

बीजिंग के चरम अहंकार का सबसे बड़ा उदाहरण साल 2016 में पूरी दुनिया के सामने देखने को मिला था। उस समय इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल ने एक बहुत ही अहम फैसला सुनाते हुए चीन की कुख्यात नाइन-डैश-लाइन को पूरी तरह से खारिज कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि इस विशाल समंदर के पानी पर चीन का जो भी दावा है वह पूरी तरह से गैरकानूनी और आधारहीन है। लेकिन इसके जवाब में बीजिंग ने सारी कूटनीतिक मर्यादाएं पार करते हुए उस ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय फैसले को महज एक रद्दी का टुकड़ा करार दे दिया। संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून के तहत गठित उस अदालत ने साफ शब्दों में कहा था कि इस इलाके के विशाल जलक्षेत्र पर चीन का किसी भी तरह का कोई ऐतिहासिक अथवा कानूनी अधिकार साबित नहीं होता है। फिर भी चीनी प्रशासन बेशर्मी के साथ इस फैसले को अमान्य और शून्य बताता रहा। जब कोई महाशक्ति इस तरह खुलेआम वैश्विक नियमों को पैरों तले रौंदती है, तो वह पूरी दुनिया के सामने एक बेहद खतरनाक मिसाल कायम करती है। चीन का यह रवैया उसकी साम्राज्यवादी सोच का सीधा प्रमाण था, जहां वह किसी भी नियम या अदालत को अपने से ऊपर मानने को तैयार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय आज भी यह गंभीर सवाल पूछ रहा है कि आखिर चीन को यह विशेषाधिकार किसने दे दिया कि वह संयुक्त राष्ट्र के नियमों के तहत काम करने वाली एक अदालत के फैसले को अपनी मर्जी से अवैध घोषित कर दे।

## कानून का मजाक और कार्यवाही से पीछे हटने की साजिश

इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें साल 2013 तक जाती हैं जब फिलीपींस ने लगातार बढ़ते दबाव से तंग आकर स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। यह ऐतिहासिक मुकदमा संयुक्त राष्ट्र के उसी समुद्री कानून के नियमों के आधार पर दायर किया गया था जिसे खुद चीन ने मान्यता दी थी। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि चीन 1982 में इस कानून पर हस्ताक्षर करने वाले चुनिंदा शुरुआती देशों में से एक था और 1996 में उसने इसे बाकायदा अपने यहां लागू भी किया था। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में जाकर बड़े-बड़े वादे करना और दूसरी तरफ जब वही नियम उस पर लागू हों तो उनसे साफ मुकर जाना, चीन की इस दोहरी नीति ने उसकी कूटनीतिक विश्वसनीयता को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। अगर बीजिंग वास्तव में अपनी जगह सही होता तो वह अदालत की कार्यवाही में भाग लेता और अपने बचाव में उतरता। वह अपने कुशल वकीलों की फौज वहां खड़ी कर सकता था और पांच जजों की पीठ के सामने अपने तथाकथित ऐतिहासिक दस्तावेज और पुख्ता तर्क पेश कर सकता था। यदि ऐसा होता तो शायद मामले का नतीजा कुछ और ही निकल कर आता। लेकिन चीन ने फिलीपींस की तरह सीधे कानूनी लड़ाई लड़ने के बजाय मैदान छोड़कर भागने का कायरतापूर्ण रास्ता चुना। उसने कार्यवाही का पूरी तरह से बहिष्कार किया। और जब अंततः नतीजा उसके खिलाफ आया तो उसने उसे अमान्य करार देते हुए अपनी नौसेना की ताकत, पैसे की गर्मी और मनगढ़ंत इतिहास के दम पर वहां मौजूद छोटे द्वीपों पर जबरन कब्जा जमाना शुरू कर दिया।

## वैश्विक चुप्पी, ग्रे-जोन रणनीति और सलामी-स्लाइसिंग

जब 2016 में फिलीपींस को अदालत में यह बड़ी कानूनी जीत हासिल हुई तो ऐसा लगा था कि दुनिया चीन पर भारी दबाव बनाएगी। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट रही। विश्व के ज्यादातर ताकतवर मुल्कों ने बीजिंग के साथ अपने गहरे आर्थिक और व्यापारिक रिश्तों को खतरे में न डालते हुए इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी। व्यापारिक लाभ और आर्थिक मुनाफे की लालच में दुनिया के बड़े देशों ने जो आंखें मूंदीं, उसकी भारी कीमत आज इन छोटे मुल्कों को चुकानी पड़ रही है। इसी स्वार्थी खामोशी ने चीन के हौसले और ज्यादा बुलंद कर दिए। उसने एक बेहद खतरनाक ग्रे-जोन रणनीति अपनाते हुए सलामी-स्लाइसिंग की गंदी चाल चलनी शुरू कर दी। इसका सीधा मतलब यह था कि बिना कोई घोषित युद्ध छेड़े धीरे-धीरे, एक-एक टुकड़ा करके दूसरे देशों की समुद्री सीमाओं और इलाकों पर अतिक्रमण किया जाए। इस रणनीति के तहत चीन ने ताइवान, ब्रुनेई, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे अपने तमाम छोटे पड़ोसियों को डराने, धमकाने और उनकी संप्रभुता का उल्लंघन करने का एक अंतहीन सिलसिला शुरू कर दिया।

## आसियान देशों की अंदरूनी कलह और पश्चिमी ताकतों की विफलता

इस संकट को और ज्यादा गहरा करने में आसियान मुल्कों की आपसी फूट ने भी एक बहुत ही नकारात्मक भूमिका निभाई है। आसियान संगठन से जुड़े देश खुद लंबे समय से इस पूरे क्षेत्र के लिए एक साझा कोड ऑफ कंडक्ट लागू करवाना चाहते हैं। लेकिन जब भी बात संप्रभुता और सीमाओं के निर्धारण के गंभीर मुद्दे पर आती है तो वे आपस में ही उलझ जाते हैं और उनकी कभी एक राय नहीं बन पाती। जिन देशों को एकजुट होकर एक अभेद्य दीवार बननी चाहिए थी, वे खुद अपने छोटे-मोटे मतभेदों में उलझकर चीन के लिए रास्ता आसान बनाते चले गए। यह बेहद हैरानी की बात है कि जिन छह देशों का चीन के साथ सीधा सीमा विवाद चल रहा है उनमें से पांच तो खुद आसियान के ही सक्रिय सदस्य हैं। इसके बावजूद वे कभी भी एकजुट होकर एक कड़ा और साझा रुख नहीं अपना सके। बीजिंग ने उनकी इसी अंदरूनी गुटबाजी और फूट का भरपूर फायदा उठाया और समंदर में अपनी मनमानी जारी रखी। दूसरी ओर अगर हम पश्चिमी ताकतों की बात करें तो इंडो-पैसिफिक इलाके में अमेरिका के पास यकीनन सबसे ताकतवर नौसेना मौजूद है। उसके साथ जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे मजबूत रणनीतिक साझेदार भी पूरी तरह से खड़े हैं। लेकिन यह पूरा विशाल गठबंधन मिलकर भी चीन को उन विवादित द्वीपों पर सैन्य ठिकाने बनाने और उनका सैन्यीकरण करने से पूरी तरह नहीं रोक पाया है। भले ही अमेरिकी और फिलीपींस की सेनाएं अक्सर मिलकर बड़े-बड़े नौसैनिक अभ्यास करती रहती हैं लेकिन वे सब भी मिलकर चीन की इस चालाक ग्रे-जोन वारफेयर को रोकने में नाकाम ही साबित हुई हैं।

## ब्रह्मोस मिसाइल का अजेय घेरा और चीन की घबराहट

इस पूरे विवादित और बेहद संवेदनशील इलाके में भारत की कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर हुई मजबूत एंट्री ने चीन के सत्ता के गलियारों में भारी खलबली मचा दी है। अब तक चीनी नौसेना इस पूरे विशाल समुद्री क्षेत्र को अपना निजी इलाका समझकर वहां के फिलीपींस, वियतनाम और मलेशिया जैसे छोटे पड़ोसी देशों पर अपना हुक्म चलाती और मनमानी थोपती आ रही थी। लेकिन नई दिल्ली ने अपनी उन पांच रणनीतिक चालों में से सबसे अहम कदम उठाते हुए इंडो-पैसिफिक रीजन पर एकतरफा कब्जा जमाने के बीजिंग के उस सपने को करारा झटका दिया है। इसका सबसे बड़ा और सीधा प्रहार चीन की सैन्य ताकत पर होने वाला है। भारत ने फिलीपींस को अपनी सबसे घातक सुपरसोनिक एंटी-शिप ब्रह्मोस मिसाइल सफलतापूर्वक बेची है। इसके अलावा वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे अहम मुल्कों के साथ भी इस अत्याधुनिक प्रणाली को लेकर बहुत ही गंभीरता से बातचीत जारी है। चीनी नौसेना का अनुभव मुख्य रूप से सबसोनिक मिसाइलों को रोकने का रहा है। लेकिन ब्रह्मोस जैसी तेज रफ्तार वाली सुपरसोनिक मिसाइल का सामना करना उनके लिए बेहद मुश्किल चुनौती है। जैसे ही फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम में इन मिसाइलों की पूरी तरह से तैनाती हो जाएगी वैसे ही पूरे साउथ चाइना सी में घुसने और बाहर निकलने वाले मुख्य समुद्री रास्तों पर हथियारों का एक अभेद्य घेरा तैयार हो जाएगा। इस कदम से चीन का वह पुराना झूठा बहाना भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा जिसमें वह हर बात के लिए अमेरिका की चाल बताकर दुनिया की आंखों में धूल झोंकता रहा है।

## चीन की घबराहट और भविष्य का कूटनीतिक परिदृश्य

भारत के इस नए और साहसिक कदम ने बीजिंग के नीति निर्माताओं को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। जहां एक तरफ चीन दुनिया की अन्य शक्तियों के साथ उलझा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही पिछवाड़े में भारत का यह दखल उसके लिए सबसे बड़ा कूटनीतिक सिरदर्द बन गया है। अब तक चीन को यह गलतफहमी थी कि वह अपनी भारी-भरकम आर्थिक और सैन्य ताकत के बल पर पूरे एशिया को डरा कर रख सकता है। लेकिन नई दिल्ली ने वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों को न सिर्फ हथियारों से लैस किया है, बल्कि उन्हें एक मजबूत कूटनीतिक ढांचा भी प्रदान किया है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का भविष्य अब किसी एक महाशक्ति की मनमानी से तय नहीं होगा। आने वाले समय में भारत की ये चाणक्य नीतियां न केवल साउथ चाइना सी में शक्ति संतुलन स्थापित करेंगी, बल्कि पूरी दुनिया को यह संदेश भी देंगी कि नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का सम्मान करना सभी के लिए अनिवार्य है। चीन के लिए अब अपनी पुरानी धौंस जमाने वाली रणनीति को पहले की तरह बेखौफ होकर जारी रखना लगभग नामुमकिन हो गया है।

## इसका आप पर असर
- **राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था:** भारत के इस कड़े कूटनीतिक कदम से महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार के रास्ते सुरक्षित होंगे, जिससे देश में जरूरी सामानों की सप्लाई चेन बिना किसी चीनी रुकावट के चलती रहेगी।
- **वैश्विक मंच पर भारत:** एक आम भारतीय के लिए यह गर्व का क्षण है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत अब एक ऐसी मजबूत ताकत बनकर उभर रहा है जो चीन जैसी बड़ी महाशक्ति को सीधे तौर पर चुनौती दे सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. भारत ने साउथ चाइना सी विवाद में क्या कदम उठाया है?
भारत ने अपनी पुरानी कूटनीतिक दूरी खत्म करते हुए चीन के खिलाफ एक कड़ा रुख अपनाया है और क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन पर जोर दिया है।

### 2. चीन ने 2016 के अंतरराष्ट्रीय फैसले पर क्या प्रतिक्रिया दी थी?
चीन ने उस ऐतिहासिक फैसले को रद्दी का टुकड़ा बताते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया था और इलाके पर अपना गैरकानूनी दावा बनाए रखा।

### 3. फिलीपींस को भारत से कौन सी मिसाइल मिल रही है?
भारत ने फिलीपींस को अपनी घातक सुपरसोनिक एंटी-शिप ब्रह्मोस मिसाइल बेची है और अन्य देशों से भी बातचीत कर रहा है।

### 4. ब्रह्मोस मिसाइल से चीन को क्या नुकसान होगा?
ब्रह्मोस की तेज सुपरसोनिक गति का सामना करना चीनी नौसेना के लिए बहुत मुश्किल है, और इसके तैनात होने से समुद्री रास्तों पर हथियारों का एक मजबूत घेरा बन जाएगा।

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