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  "type": "article",
  "title": "बेंजामिन नेतन्याहू के विदेशी दखल वाले आरोप खारिज, इजरायल में प्रत्यक्ष पीएम चुनाव पर विचार",
  "summary": "इजरायली चुनाव अधिकारियों ने वोट चोरी और विदेशी हस्तक्षेप के दावों को नकार दिया है, जबकि अनिर्णायक नतीजों के बाद विपक्षी दल प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव का नया कानून लाने की तैयारी कर रहे हैं।",
  "content": "इजरायल में हाल ही में संपन्न हुए संसदीय चुनावों के बाद गहराते राजनीतिक संकट के बीच चुनाव अधिकारियों ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के उन आरोपों को सिरे से नकार दिया है, जिनमें मतदान प्रक्रिया के दौरान विदेशी दखलअंदाजी का दावा किया गया था। चुनाव प्राधिकरण ने स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया है कि वर्तमान में चल रही किसी भी प्रशासनिक समीक्षा अथवा जांच का अंतिम नतीजों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही अधिकारियों ने यह भी साफ कर दिया है कि किसी भी खास वर्ग या समुदाय के मतदाताओं द्वारा डाले गए मतों को अमान्य या अवैध घोषित नहीं किया जाएगा। मंगलवार को हुए मतदान में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट जनादेश न मिलने से संसद में गतिरोध बना हुआ है, जिसे दूर करने के लिए नए संवैधानिक विकल्पों की तलाश तेज हो गई है।\n\nविपक्षी खेमे की नई रणनीति और सीधे चुनाव का विकल्प\nसंसद में बने कड़े गतिरोध को खत्म करने के लिए नेतन्याहू-विरोधी गठबंधन के घटक दल एक नए वैधानिक फॉर्मूले पर मंथन कर रहे हैं। इस योजना के केंद्र में देश के भीतर प्रधानमंत्री पद के लिए सीधे यानी प्रत्यक्ष चुनाव कराने से जुड़ा एक नया मसौदा कानून पेश करने की तैयारी है। इस व्यवस्था के अमल में आने से मतदाताओं को समूची सरकार से अलग सीधे प्रधानमंत्री चुनने का संवैधानिक अधिकार मिल सकेगा। विपक्षी खेमे का मानना है कि इस कदम से उन्हें संसद में अरब दलों के प्रत्यक्ष समर्थन पर निर्भर हुए बगैर ही एक कार्यकारी अल्पसंख्यक सरकार गठित करने और देश को शासन देने का मौका हासिल हो सकता है।\n\nसंसदीय अंकगणित और 61 सांसदों के समर्थन की अनिवार्यता\nमंगलवार को संपन्न हुए चुनावों के जो नतीजे सामने आए हैं, उनमें न तो प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ है और न ही उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का खेमा जादुई आंकड़े तक पहुंच सका है। देश के संवैधानिक ढांचे 'बेसिक लॉ: द गवर्नमेंट' के तहत किसी भी नए मंत्रिमंडल के अस्तित्व में आने के लिए 120 सदस्यों वाली संसद यानी नेसेट के पटल पर विश्वास मत हासिल करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। यदि सीधे प्रधानमंत्री चुनाव की नई प्रणाली को कानूनी रूप देना है, तो मौजूदा बुनियादी कानून में संशोधन करना होगा। इस तरह के संशोधन को पारित कराने के लिए नेसेट के कम से कम 61 सांसदों का संख्याबल जुटाना जरूरी होगा। उल्लेखनीय है कि इससे पहले मार्च 2021 के अनिर्णायक आम चुनावों के उपरांत भी नेतन्याहू ने राजनीतिक संकट टालने के लिए इसी तरह के सीधे चुनाव का सुझाव सामने रखा था।\n\nलिकुड पार्टी के दावों का खंडन और अंतिम घोषणा की प्रतीक्षा\nइजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति द्वारा बुधवार तक नेसेट के आधिकारिक और प्रमाणित चुनाव परिणामों की घोषणा किए जाने की संभावना है। औपचारिक प्रमाणीकरण से पूर्व शुरुआती आंकड़ों में कुछ मामूली फेरबदल हो सकते हैं, जबकि विभिन्न राजनीतिक दल संभावित गठबंधन की संभावनाओं को टटोलने के लिए बातचीत के दौर जारी रखे हुए हैं। इस बीच, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने अपनी बयानबाजी तेज करते हुए आरोप लगाया है कि अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने चुनावों को प्रभावित कर जनादेश चुरा लिया है और इस पूरे प्रकरण में संभावित रूप से विदेशी ताकतों का हाथ रहा है। हालांकि, इन दावों के समर्थन में कोई पुख्ता प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए हैं और चुनाव तंत्र ने इन्हें पूरी तरह बेबुनियाद मानते हुए खारिज कर दिया है।\n\nइसका आप पर असर\nइजरायल में चुनावी गतिरोध और नेतृत्व को लेकर चल रही खींचतान का सीधा असर कूटनीतिक स्थिरता और नीतिगत फैसलों पर पड़ता है।\n\n• वैश्विक कूटनीति पर: इजरायल में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने से सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। इसके चलते विदेश नीति और क्षेत्रीय वार्ताओं में तात्कालिक निर्णय लेने में देरी का सामना करना पड़ सकता है।\n• मतदाताओं के लिए: यदि प्रत्यक्ष प्रधानमंत्री चुनाव का प्रस्ताव 61 सांसदों का समर्थन हासिल कर लेता है, तो इजरायली नागरिकों को सीधे अपने नेता को चुनने का नया अधिकार मिलेगा। इससे बार-बार गठबंधन टूटने और बार-बार आम चुनाव होने के सिलसिले पर रोक लग सकती है।\n• संसदीय प्रक्रिया में: 120 सीटों वाली संसद में जब तक कोई गठबंधन 61 का आंकड़ा नहीं जुटाता, तब तक नई नीतियां पारित होना कठिन रहेगा। इससे रोजमर्रा के प्रशासनिक और बजटीय कार्यों पर असर पड़ना तय है।\n• अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए: मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा देख रहे देशों को इजरायल में नई स्थायी सरकार के गठन का इंतजार करना होगा। बुधवार को चुनाव समिति द्वारा अंतिम नतीजों के प्रमाणन के बाद ही राजनीतिक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह राजनीतिक गतिरोध मंगलवार को हुए चुनावों में किसी भी मुख्य गुट को स्पष्ट बहुमत न मिलने और लिकुड पार्टी द्वारा चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाने के कारण पैदा हुआ है।\n\n• अनिर्णायक चुनावी जनादेश: मंगलवार के मतदान में न तो नेतन्याहू के गठबंधन को और न ही विपक्षी खेमे को 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने लायक सीटें मिलीं। इस त्रिशंकु स्थिति के कारण दोनों ही पक्ष वैकल्पिक रणनीतियों पर विचार करने को मजबूर हुए हैं।\n• विदेशी दखल के बेबुनियाद आरोप: लिकुड पार्टी ने अरब नेतृत्व वाले दलों पर विदेशी सहायता से वोट चुराने के आरोप लगाए, जिसका मकसद नतीजों पर दबाव बनाना था। चुनाव अधिकारियों ने जांच के आधार पर इन दावों में कोई तथ्य न पाते हुए इन्हें तुरंत खारिज कर दिया।\n• अल्पसंख्यक सरकार बनाने का प्रयास: विपक्षी दल अरब पार्टियों के औपचारिक समर्थन पर निर्भर रहे बिना सरकार बनाना चाहते हैं, जिसके चलते उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री चुनाव का विचार आगे बढ़ाया। मार्च 2021 में भी इसी तरह का संवैधानिक विकल्प आजमाने की कोशिश की गई थी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. क्या चुनाव अधिकारियों ने बेंजामिन नेतन्याहू के आरोपों को स्वीकार किया है?\nनहीं, चुनाव अधिकारियों ने विदेशी दखल और वोट चोरी के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।\n\n2. क्या चल रही जांच से किसी खास समुदाय के वोटों पर असर पड़ेगा?\nअधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जांच से अंतिम परिणाम नहीं बदलेंगे और न ही किसी विशेष समुदाय के वोट अमान्य होंगे।\n\n3. विपक्षी गुट किस नए कानून पर विचार कर रहा है?\nविपक्ष प्रधानमंत्री पद के लिए प्रत्यक्ष यानी सीधे चुनाव कराने से जुड़ा कानून लाने पर विचार कर रहा है।\n\n4. प्रत्यक्ष चुनाव कानून पारित कराने के लिए कितने सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है?\nबेसिक लॉ में संशोधन करने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।\n\n5. संसद चुनाव के अंतिम परिणामों की आधिकारिक घोषणा कब तक होने की उम्मीद है?\nकेंद्रीय चुनाव समिति द्वारा बुधवार तक नेसेट चुनाव के अंतिम नतीजे प्रमाणित और घोषित किए जाने की संभावना है।",
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