# बिस्मार्क: वो जर्मन दैत्य युद्धपोत जिसे डुबाने के लिए ब्रिटेन को झोंकना पड़ा पूरा बेड़ा

> मई 1941 में जर्मनी के युद्धपोत बिस्मार्क ने डेनमार्क स्ट्रेट की लड़ाई में ब्रिटेन के HMS Hood को डुबो दिया और Prince of Wales को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, जिसके बाद यह दुनिया के सबसे खतरनाक युद्धपोतों में गिना जाने लगा।

**Category:** दुनिया · **Published:** 2026-06-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/world/bismarka-vo-jarmana-daitya-yuddhapota-jise-dubane-ke-lie-britena-ko-jhonkana-par-208

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान समुद्र पर जो जहाज सबसे ज्यादा डर का पर्याय बने, उनमें जर्मनी के बिस्मार्क का नाम सबसे ऊपर आता है। इस एक जहाज की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे रोकने और खत्म करने के लिए ब्रिटिश नौसेना को अपने कई जहाज एक साथ झोंकने पड़े। आखिर ऐसा क्या था इस युद्धपोत में, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया?

## जिस दिन बिस्मार्क ने इतिहास पलट दिया
तारीख थी 24 मई 1941। उत्तरी अटलांटिक का समुद्र युद्ध की आग में सुलग रहा था। जर्मनी का यह विशाल युद्धपोत ब्रिटिश नौसेना के आमने-सामने था और अगले कुछ ही घंटों में इसने वह कर दिखाया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। “डेनमार्क स्ट्रेट” के नाम से मशहूर इस लड़ाई में बिस्मार्क ने ब्रिटिश नौसेना की शान कहे जाने वाले युद्धपोत HMS Hood को समुद्र की गहराई में पहुंचा दिया। यहीं नहीं रुका — ब्रिटेन के बिल्कुल नए और आधुनिक युद्धपोत Prince of Wales को भी उसने मैदान छोड़कर पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इसी एक मुठभेड़ के बाद बिस्मार्क का नाम दुनिया के सबसे चर्चित और सबसे डरावने युद्धपोतों की सूची में दर्ज हो गया।

## आकार और रफ्तार — दोनों में आगे
उस दौर में दुनिया की बड़ी नौसैनिक ताकतें कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों के जरिए युद्धपोतों के आकार पर लगाम कसने की कोशिश कर रही थीं। मगर बिस्मार्क इन तय सीमाओं को पार कर चुका था। इसका मानक वजन करीब 41,700 टन था, जो उस समय के ज्यादातर आधुनिक युद्धपोतों से कहीं अधिक था। आकार के लिहाज से इससे बड़े जहाज बाद में ही बने — अमेरिका की “आयोवा श्रेणी” और जापान की विशालकाय “यामाटो श्रेणी” के युद्धपोत। यानी अपने समय में बिस्मार्क सबसे प्रभावशाली युद्धपोतों में गिना जाता था।

सिर्फ शरीर ही नहीं, इसकी चाल भी इसकी बड़ी ताकत थी। यह लगभग 56 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से लगातार दौड़ सकता था, जो उस दौर के अधिकतर युद्धपोतों के मुकाबले बेहद तेज माना जाता था। फ्रांस के रिचलियू और इटली के विट्टोरियो वेनेटो जैसे गिने-चुने जहाज ही इसकी गति की बराबरी कर पाते थे।

## आसानी से न डूबने वाला कवच
बिस्मार्क की असली ताकत सिर्फ उसका आकार या रफ्तार नहीं, बल्कि उसका मजबूत सुरक्षा कवच भी था। इसके ढांचे को कई अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया था, जिसकी वजह से भारी नुकसान झेलने के बाद भी इसे डुबोना आसान नहीं था। यही कारण रहा कि जब आगे चलकर ब्रिटिश नौसेना ने इसे चारों ओर से घेरा, तब भी इसे खत्म करने के लिए लगातार भारी गोलाबारी और टॉरपीडो हमलों की जरूरत पड़ी। इसी खूबी ने इसे अपने समय का सबसे सुरक्षित युद्धपोत बना दिया था।

## तोपों के आंकड़ों में मात, फिर भी दबदबा
बिस्मार्क भले ही बेहद ताकतवर माना जाता हो, लेकिन अगर सिर्फ तोपों की गिनती और एक साथ दागे जाने वाले गोले के वजन को देखें, तो कुछ देशों के युद्धपोत इससे आगे थे। बिस्मार्क के पास आठ 15-इंच की मुख्य तोपें थीं, जिनसे वह एक ही बार में करीब 6,400 किलोग्राम स्टील और विस्फोटक दुश्मन की ओर उगल सकता था।

लेकिन कुछ अमेरिकी, जापानी और ब्रिटिश युद्धपोत इससे भी ज्यादा वजन की गोलाबारी कर सकते थे। जापान के यामाटो और मुसाशी के पास तो 18-इंच की नौ विशाल तोपें थीं, और इनकी एक साथ की गई गोलाबारी का वजन बिस्मार्क से दोगुने से भी ज्यादा था। दूसरे विश्व युद्ध में ऐसे कई युद्धपोत मौजूद थे जो बिस्मार्क से भारी गोले बरसा सकते थे। इसके बावजूद युद्ध के मैदान में बिस्मार्क ने जो छाप छोड़ी, उसी ने उसे एक अलग पहचान दी।

अमेरिका के नॉर्थ कैरोलाइना और साउथ डकोटा श्रेणी के जहाज आकार में बिस्मार्क से छोटे जरूर थे, मगर उनकी मारक क्षमता ज्यादा मानी जाती थी। कागज पर देखें तो आमने-सामने की लड़ाई में ये बिस्मार्क को कड़ी टक्कर दे सकते थे। हालांकि एक बात यहां मायने रखती है — जर्मन नौसेना के फायर कंट्रोल सिस्टम और ऑप्टिकल उपकरणों की गुणवत्ता को दुनिया में सबसे बेहतरीन माना जाता था। इसलिए सिर्फ आंकड़ों के सहारे किसी एक युद्धपोत को पक्के तौर पर बेहतर बता देना आसान नहीं था।

## Prince of Wales पर बरसती गोलियों की आग
डेनमार्क स्ट्रेट की इसी लड़ाई में बिस्मार्क ने Prince of Wales पर एक के बाद एक सटीक वार किए। उसके 15-इंच के चार गोले इस ब्रिटिश युद्धपोत से जा टकराए। इनमें से एक गोला जहाज के नीचे पानी में लगा, जिससे कुछ जलभराव हो गया। दो अन्य गोलों ने जहाज के ऊपरी हिस्सों को निशाना बनाया — वहां लगे उपकरण तबाह हो गए और कई नौसैनिक हताहत हुए। चौथा गोला जहाज के एक हिस्से से टकराकर फटा और आसपास के इलाके में भारी नुकसान पहुंचा गया।

इतने हमलों के बावजूद Prince of Wales की मुख्य तोपें चलती रहीं और उसने लड़ाई जारी रखी। इसी बीच जर्मनी के भारी क्रूजर Prinz Eugen के गोले भी उस पर आ गिरे, जिससे जहाज को और चोट पहुंची। दोनों जर्मन जहाजों की लगातार गोलाबारी और गोलों की बौछार ने ब्रिटिश युद्धपोत की कार्रवाई को कमजोर कर दिया। आखिरकार हालात ऐसे बन गए कि Prince of Wales को युद्धक्षेत्र से हटना पड़ा।

## हटकर भी हार नहीं मानी
पीछे हटने के बावजूद Prince of Wales पूरी तरह से बेकार नहीं हुआ था। उसकी मुख्य तोपें और इंजन सुरक्षित बच गए थे। कुछ ही देर बाद उसने फिर दिशा बदली और जर्मन बेड़े का पीछा कर रहे ब्रिटिश जहाजों के साथ आ मिला। बिस्मार्क की गोलाबारी से हुए नुकसान की मरम्मत करने के बाद उसने खुद को दोबारा लड़ाई के लायक घोषित किया और जर्मन युद्धपोत के पीछे लग गया।

लेकिन तब तक बिस्मार्क अपनी ताकत पूरी दुनिया को दिखा चुका था। HMS Hood का विनाश और Prince of Wales को पीछे धकेलने की यह घटना ही वह वजह बनी, जिसने बिस्मार्क को दूसरे विश्व युद्ध के सबसे चर्चित और सबसे खौफनाक युद्धपोतों की कतार में हमेशा के लिए खड़ा कर दिया।

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