चीन और रूस के पाले में जाने से कैसे बेअसर हो सकते हैं डोनाल्ड ट्रंप के नए ईरानी प्रतिबंध अमेरिका द्वारा ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वैश्विक राजनीति गरमा गई है। यदि चीन और रूस एकजुट होकर मुकाबला करते हैं, तो डोनाल्ड ट्रंप की रणनीतिक चाल उल्टी पड़ सकती है और वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर पुराने और कड़े तौर-तरीकों पर लौट आए हैं। बीते लगभग छह महीनों से ईरान के साथ चल रही जंग में अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और इस संघर्ष से बाहर निकलने की उनकी तमाम कोशिशें अब तक नाकाम साबित हुई हैं। इसी बौखलाहट के बीच, उन्होंने ईरान के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का ऐलान कर दिया है। इन नए प्रावधानों के तहत, जो भी देश ईरान के साथ कारोबार जारी रखेगा, उसे सीधे तौर पर आर्थिक दंड का सामना करना पड़ेगा। इस पूरी रणनीति का मुख्य निशाना चीन है, जो ईरान से सबसे बड़ा खरीदार है और अकेले उसके करीब 80 फीसदी कच्चे तेल का आयात करता है। इसके अलावा, रूस भी इस समीकरण का अहम हिस्सा है जिसके ईरान के साथ गहरे रणनीतिक, सैन्य और आर्थिक संबंध पहले से ही जुड़े हुए हैं। हालांकि, रूस पर अमेरिका के कड़े प्रतिबंध पहले से ही लागू हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि यदि अमेरिकी धौंस के जवाब में चीन और रूस प्रत्यक्ष तौर पर एक होकर मजबूती से खड़े हो जाएं, तो क्या होगा और क्या डोनाल्ड ट्रंप तथा उनके सहयोगी देश इस संयुक्त आर्थिक व सैन्य ताकत का मुकाबला करने में सफल हो पाएंगे। चीन और अमेरिकी दबाव का यथार्थ चीन वर्तमान में ईरान का सबसे प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। साल 2025 के दौरान ईरान से निर्यात किए गए कुल तेल का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन ने खरीदा था। यदि ऐसी स्थिति में अमेरिका चीनी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर सीधी कार्रवाई करता है, तो यह विवाद केवल तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका दायरा सीधे तौर पर अमेरिका और चीन के बीच एक बड़े टकराव में बदल जाएगा। चीन पहले भी अपनी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर चुका है और उसका दृढ़ता से यह मानना है कि किसी भी समस्या का समाधान एकतरफा प्रतिबंधों के जरिए नहीं निकाला जा सकता है। मौजूदा हालात को देखते हुए चीन अमेरिकी दबाव के आगे झुककर ईरान के साथ अपने स्थापित व्यापारिक रिश्तों को इतनी आसानी से खत्म करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखाई देता है. स्वतंत्र रिफाइनरियां और अमेरिका की मुश्किलें मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती यह है कि चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिकी वित्तीय तंत्र पर उस हद तक निर्भर नहीं है जैसी कि उम्मीद की जाती है। ईरान से तेल का आयात करने वाली चीन की अधिकांश रिफाइनरियां पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, जिसके कारण उन पर सीधे तौर पर दबाव बनाना अमेरिका के लिए आसान नहीं रहने वाला है। अगर अमेरिका ड्रैगन के बड़े बैंकों के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाता है, तो चीन को आर्थिक चोट तो पहुंचेगी, लेकिन इसका पलटवार भी देखने को मिल सकता है। बीजिंग जवाबी कार्रवाई के रूप में अमेरिकी हितों के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठा सकता है। यही मुख्य कारण है कि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान के बहाने चीन पर भारी आर्थिक शिकंजा कसना डोनाल्ड ट्रंप के लिए आसान नहीं होगा। दोनों महाशक्तियां पहले से ही तकनीक और व्यापार के मैदान में एक प्रकार के अघोषित आर्थिक शीत युद्ध में उलझी हुई हैं, और ऐसे नाज़ुक वक्त में ईरान का यह नया मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव को खतरनाक स्तर तक बढ़ा सकता है. रूस की अलग और मजबूत स्थिति चीन की तुलना में रूस की भू-राजनीतिक और आर्थिक स्थिति काफी भिन्न है। रूस पर अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा पहले से ही व्यापक स्तर पर आर्थिक प्रतिबंध थोपे जा चुके हैं, जिसका सीधा अर्थ यह है कि रूसी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों से लगभग पूरी तरह कट चुका है। परिणामस्वरूप, ईरान के साथ व्यापार को आधार बनाकर रूस पर नए प्रतिबंध लगाने से अमेरिका को वह दबाव बनाने का लाभ नहीं मिलेगा जो वह किसी अन्य देश पर हासिल कर सकता था। पिछले कुछ वर्षों में रूस और ईरान के आपसी संबंध भी बेहद मजबूत हुए हैं। पश्चिमी पाबंदियों का सामना करते-करते दोनों देशों ने सहयोग के ऐसे वैकल्पिक रास्ते और वित्तीय व्यवस्थाएं तैयार कर ली हैं जिन पर अमेरिकी प्रभाव नगण्य है। जनवरी 2025 में रूस और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण 20 साल की रणनीतिक साझेदारी संधि पर औपचारिक हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद से दोनों के बीच व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आई है। यह सहयोग केवल ऊर्जा और कच्चे तेल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सैन्य और रक्षा उपकरणों का आदान-प्रदान भी शामिल है. संयुक्त मोर्चा और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर यह वही विकट परिस्थिति है जिससे अमेरिका सबसे ज्यादा बचना चाहता था। यदि चीन और रूस ईरान का समर्थन करते हुए आर्थिक मोर्चे पर खुलकर साथ आ जाते हैं, तो अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव कागजी साबित हो सकता है। चीन के पास विशाल बाजार और मांग है, जबकि रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच काम करने की पूरी महारत हासिल कर चुका है। दोनों देश अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने के लगातार प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में, ईरान को पश्चिमी बाजारों की परिधि से बाहर भी कारोबार चलाने के सुरक्षित रास्ते आसानी से मिल सकते हैं। यह पूरा मामला अब केवल अमेरिका और ईरान के द्विपक्षीय तनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अमेरिका बनाम चीन, रूस और ईरान जैसे शक्तिशाली आर्थिक गुट के टकराव का रूप ले लेगा। इसका सबसे गंभीर असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ना तय है। यदि ईरान की तेल आपूर्ति को लेकर अमेरिका और चीन आमने-सामने आ गए, तो दुनिया के ऊर्जा बाजारों में गहरी अस्थिरता फैल जाएगी, और कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा तेजी आने से भारत समेत दुनिया भर के कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भारी दबाव पड़ सकता है. इसका आप पर असर • भारत में: ईरान के तेल कारोबार पर अमेरिकी प्रतिबंधों और चीन-रूस के साथ संभावित तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे भारत में ईंधन और ऊर्जा के दाम प्रभावित हो सकते हैं। • वैश्विक स्तर पर: दुनिया के ऊर्जा बाजारों में गहरी अस्थिरता फैल सकती है और अमेरिका तथा चीन-रूस के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है। सवाल-जवाब 1. अमेरिका ने ईरान पर किस तरह के नए प्रतिबंध लगाए हैं? अमेरिका ने ईरान के खिलाफ अब तक के सबसे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है, जिसके तहत ईरान के साथ कारोबार करने वाले किसी भी देश को आर्थिक रूप से दंडित किया जाएगा। 2. ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार कौन सा देश है? चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और वह ईरान से भेजे जाने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है। 3. रूस और ईरान के बीच रणनीतिक साझेदारी संधि कब हुई थी? जनवरी 2025 में रूस और ईरान ने 20 साल की रणनीतिक साझेदारी संधि पर हस्ताक्षर किए थे। 4. क्या रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों का नया असर पड़ेगा? चूंकि रूस पर पहले से ही व्यापक अमेरिकी प्रतिबंध लगे हैं और उसकी अर्थव्यवस्था पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था से अलग हो चुकी है, इसलिए नए प्रतिबंधों से अमेरिका को उतना फायदा नहीं मिलेगा। 5. इस भू-राजनीतिक तनाव का वैश्विक बाजारों पर क्या असर हो सकता है? यदि अमेरिका और चीन ईरान के तेल कारोबार को लेकर आमने-सामने आते हैं, तो दुनिया के ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है और तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। https://trendkia.com/world/china-aur-russia-ke-pal-jane-se-kaise-besasar-ho-sakte-hain-donald-trump-ke-naye-irani-pratibandh-21274 TrendKia — Har trend, sabse pehle.