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  "type": "article",
  "title": "चीन और रूस की पैरवी भी नहीं आई काम, भारतीय वीटो के सामने क्यों अटका है पाकिस्तान का ब्रिक्स सपना?",
  "summary": "चीन और रूस के भारी समर्थन के बावजूद, पाकिस्तान साल 2023 से ब्रिक्स में शामिल होने के लिए संघर्ष कर रहा है, जहां भारत की असहमति उसकी राह में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है.",
  "content": "वैश्विक भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां ब्रिक्स (BRICS) समूह पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले वित्तीय संस्थानों के सामने एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है. इस बढ़ते प्रभाव के बीच, पाकिस्तान भी इस वैश्विक मंच पर अपनी जगह बनाने के लिए लगातार छटपटाहट दिखा रहा है. हालांकि, चीन और रूस जैसे शक्तिशाली सदस्य देशों के खुले समर्थन के बावजूद, इस्लामाबाद की यह कोशिश एक मजबूत दीवार से टकराकर रुक गई है. इस रुकावट की सबसे बड़ी वजह भारत का सख्त रुख है, जिसने पिछले तीन वर्षों से पाकिस्तान के प्रवेश को रोक रखा है. साल 2023 में दिए गए आधिकारिक आवेदन के बाद से पाकिस्तान इस समूह की चौखट पर ही खड़ा है और उसकी एंट्री का मामला पूरी तरह से अटका हुआ है.\n\nसर्वसम्मति का नियम और भारतीय आपत्ति की दीवार\nपाकिस्तान के लिए इस आर्थिक समूह का हिस्सा बनना क्यों नामुमकिन हो रहा है, इसे समझने के लिए ब्रिक्स के कामकाज के नियमों को देखना जरूरी है. इस समूह में किसी भी नए देश को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्यों की सर्वसम्मति होना अनिवार्य है. इसका मतलब यह है कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका जैसे संस्थापक देशों में से किसी भी एक सदस्य के पास किसी नए आवेदन को रोकने की पूरी शक्ति होती है.\n\nहाल ही में हुए विस्तार के दौरान इस समूह ने मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को नए सदस्यों के रूप में शामिल किया था, लेकिन पाकिस्तान को इसमें जगह नहीं मिल सकी. भारत की रणनीतिक आपत्तियों ने एक अभेद्य दीवार की तरह काम किया है, जिससे इस्लामाबाद की तमाम राजनयिक कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं. भारत का स्पष्ट मानना है कि द्विपक्षीय मुद्दों और आतंकवाद जैसे गंभीर मामलों पर ठोस कार्रवाई किए बिना पाकिस्तान को ऐसे महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों पर जगह नहीं दी जानी चाहिए. जब तक इस नियम के तहत भारत अपनी सहमति नहीं देता, तब तक पाकिस्तान की एंट्री नामुमकिन है.\n\nआर्थिक तंगी से जूझते पाकिस्तान की मजबूरी\nब्रिक्स में शामिल होने के लिए पाकिस्तान की यह बेताबी असल में उसकी बदहाल आर्थिक स्थिति से जुड़ी हुई है. पाकिस्तान इकोनॉमिक सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, इस समय देश की जीडीपी (GDP) विकास दर महज 3.70 प्रतिशत दर्ज की गई है. भारी कर्ज, आसमान छूती महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार की कमी से जूझ रहा पाकिस्तान लगातार नए वित्तीय विकल्पों की तलाश में है. ब्रिक्स की सदस्यता मिलने से पाकिस्तान को वैश्विक बाजारों के साथ सीधे आर्थिक सहयोग और नए विकास प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग मिलने की उम्मीद थी.\n\nपाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से गंभीर संकट में है और देश को अपने वजूद को बचाए रखने के लिए बार-बार आईएमएफ (IMF) के बेलआउट पैकेजों का सहारा लेना पड़ा है. 3.70 प्रतिशत की नाममात्र जीडीपी (GDP) विकास दर देश की विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए नाकाफी है, जिसके कारण वहां बेरोजगारी और महंगाई चरम पर है. ब्रिक्स में शामिल होकर पाकिस्तान द्विपक्षीय मुद्रा विनिमय (करेंसी स्वैप) समझौतों का लाभ उठाना चाहता था, ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर उसकी निर्भरता कम हो सके.\n\nपश्चिमी देशों के नियंत्रण वाले वित्तीय तंत्र पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए पाकिस्तान ने एक बड़ा कदम भी उठाया है. उसने ब्रिक्स से जुड़े न्यू डेवलपमेंट बैंक में 580 मिलियन डॉलर की भारी-भरकम हिस्सेदारी खरीदी है. इस निवेश के जरिए इस्लामाबाद का मकसद फंडिंग के वैकल्पिक रास्ते तैयार करना है, ताकि उसे बार-बार वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ (IMF) जैसी संस्थाओं के कड़े नियमों और शर्तों के सामने न झुकना पड़े. पाकिस्तान अक्सर आईएमएफ (IMF) से मिलने वाले बेलआउट पैकेज की सख्त शर्तों से परेशान रहा है, जिससे उसके घरेलू स्तर पर भी काफी विरोध होता है. ऐसे में न्यू डेवलपमेंट बैंक उसके लिए एक सुरक्षित आर्थिक ठिकाने की तरह नजर आता है.\n\nब्रिक्स का बढ़ता वैश्विक दबदबा और व्यापारिक आंकड़े\nपाकिस्तान ने इस समूह में शामिल होने की कोशिशें ऐसे समय में तेज की हैं जब 'ग्लोबल साउथ' में इस संगठन का प्रभाव काफी बढ़ चुका है. नए सदस्यों के आने के बाद अब ब्रिक्स देशों में दुनिया की लगभग 49 फीसदी आबादी निवास करती है. वहीं, अगर परचेजिंग पावर पैरिटी यानी पीपीपी (PPP) के आधार पर देखा जाए, तो यह समूह पूरी दुनिया की कुल जीडीपी (GDP) का लगभग 40 फीसदी हिस्सा संभालता है.\n\nएक तरफ जहां पाकिस्तान बाहर रहकर संघर्ष कर रहा है, वहीं भारत ने इस समूह का हिस्सा होने का भरपूर फायदा उठाया है. पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स देशों के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों में जबरदस्त तेजी आई है. इन सदस्य देशों को होने वाले भारतीय निर्यात में 48.8 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो 64.3 अरब डॉलर से बढ़कर 95.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. यह शानदार व्यापारिक तरक्की ही इस समूह के महत्व को दर्शाती है, जिसके कारण दुनिया के कई विकासशील देश इसका हिस्सा बनना चाहते हैं. वर्तमान में पाकिस्तान सहित कुल 29 देशों ने इस मंच की सदस्यता के लिए आवेदन किया हुआ है.\n\nराजनयिक प्रयास और भारतीय रुख का असर\nइस्लामाबाद की राजनयिक मशीनरी ने ब्रिक्स में प्रवेश पाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है. नवंबर 2023 में पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था कि उनका देश इस महत्वपूर्ण वैश्विक समूह का हिस्सा बनने के लिए पूरी तरह तैयार है. प्रवक्ता ने दावा किया था कि पाकिस्तान के ब्रिक्स के अधिकांश सदस्य देशों के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं और यह मंच विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिए बेहद जरूरी है.\n\nअपने इस अभियान को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान ने अपने सबसे करीबी सहयोगियों से मदद मांगी थी. रूस में पाकिस्तान के राजदूत मुहम्मद खालिद जमाली ने भी एक बातचीत में इसकी पुष्टि की थी कि इस्लामाबाद सदस्य देशों से अपने पक्ष में समर्थन जुटा रहा है और उन्होंने विशेष रूप से मॉस्को से मदद की उम्मीद जताई थी. हालांकि, चीन और रूस के समर्थन का आश्वासन मिलने के बाद भी पाकिस्तान की राह आसान नहीं हो सकी है. जब तक भारत अपनी सुरक्षा और रणनीतिक चिंताओं के कारण अपनी असहमति पर कायम रहेगा, तब तक पाकिस्तान के लिए ब्रिक्स के दरवाजे बंद ही रहेंगे और चीन-रूस की पैरवी भी उसके काम नहीं आएगी.\n\nइसका आप पर असर\nइस कूटनीतिक घटनाक्रम का सीधा असर वैश्विक शक्ति संतुलन और भारतीय उपमहाद्वीप की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा पर पड़ेगा.\n\n• भारत के लिए: भारतीय कूटनीति की यह जीत दिखाती है कि वैश्विक मंचों पर नई दिल्ली का प्रभाव बेहद मजबूत है. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के व्यापारिक और सुरक्षा हितों को मजबूती मिलेगी.\n• पाकिस्तान में: ब्रिक्स में एंट्री न मिलने से पाकिस्तान की आर्थिक राह और कठिन हो जाएगी. वहां के नागरिकों को आने वाले समय में महंगाई और कर्ज के बोझ से राहत मिलना मुश्किल होगा क्योंकि देश को अभी भी पश्चिमी ऋणदाताओं के कड़े नियमों का सामना करना पड़ेगा.\n\nऐसा क्यों हुआ\nपाकिस्तान का ब्रिक्स प्रवेश मुख्य रूप से संगठनात्मक नियमों और द्विपक्षीय सुरक्षा तनाव के कारण अटका हुआ है.\n\n• कठोर सर्वसम्मति नियम: ब्रिक्स का सबसे बुनियादी नियम यह है कि किसी भी नए देश की सदस्यता के लिए सभी मौजूदा सदस्यों का सहमत होना आवश्यक है. एक भी असहमति नए सदस्य के प्रवेश को रोक देती है.\n• भारतीय रणनीतिक वीटो: भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जारी सुरक्षा और सीमा पार विवादों के कारण भारत लगातार पाकिस्तान की सदस्यता का विरोध कर रहा है. भारत का मानना है कि आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई किए बिना पाकिस्तान को ऐसे मंचों पर जगह नहीं मिलनी चाहिए.\n• आर्थिक बदहाली: केवल 3.70 प्रतिशत की जीडीपी विकास दर के कारण पाकिस्तान वित्तीय रूप से बेहद कमजोर है, इसलिए वह वैश्विक दक्षिण के आर्थिक समूहों से वैकल्पिक फंडिंग खोजने के लिए बेताब है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पाकिस्तान ने ब्रिक्स में शामिल होने के लिए कब आवेदन किया था?\nपाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर साल 2023 में इस वैश्विक समूह की सदस्यता के लिए आवेदन किया था.\n\n2. ब्रिक्स में नए सदस्यों को शामिल करने का नियम क्या है?\nब्रिक्स में किसी भी नए देश को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्य देशों की पूर्ण सहमति और सर्वसम्मति अनिवार्य होती है.\n\n3. पाकिस्तान ने न्यू डेवलपमेंट बैंक में कितना निवेश किया है?\nपाकिस्तान ने फंडिंग के नए स्रोत तलाशने के लिए न्यू डेवलपमेंट बैंक में 580 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी खरीदी है.\n\n4. हाल ही में किन नए देशों को ब्रिक्स का सदस्य बनाया गया है?\nपिछले विस्तार चक्र के दौरान मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को नए सदस्य देशों के रूप में शामिल किया गया था.\n\n5. पीपीपी के आधार पर ब्रिक्स वैश्विक जीडीपी का कितना प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है?\nपरचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर ब्रिक्स देश दुनिया की कुल जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा संभालते हैं.",
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  "category": "दुनिया",
  "publishedAt": "2026-09-12",
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    "भारत पाकिस्तान संबंध",
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    "विदेश नीति"
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  "site": "TrendKia"
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