# कांगो में इबोला राहत का 700 मिलियन डॉलर का हिसाब गायब, स्वास्थ्य एजेंसियों और एनजीओ की फंडिंग पर उठे गंभीर सवाल

> कांगो में इतिहास के सबसे घातक इबोला प्रकोप के बीच अंतरराष्ट्रीय सहायता से जुड़े करीब 700 मिलियन डॉलर का वित्तीय ब्योरा नहीं मिल पा रहा है, जिसके बाद सरकार ने राहत संगठनों की गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं।

**Type:** article · **Category:** दुनिया · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/world/congo-men-ibola-rahata-ka-700-miliyana-dolara-ka-hisaba-gayaba-svasthya-ejensiyon-aura-ngo-ki-phndinga-para-uthe-gnbhira-savala-49566 · **Language:** Hindi
**Tags:** इबोला वायरस, कांगो स्वास्थ्य संकट, अफ्रीका सीडीसी, मानवीय सहायता घोटाला, विश्व स्वास्थ्य संगठन, बुंदिबुग्यो स्ट्रेन

अफ्रीकी महाद्वीप में अब तक के सबसे घातक और तेजी से फैलते इबोला प्रकोप से जूझ रहे कांगो में एक बड़ा वित्तीय विवाद सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं की ओर से भेजे गए करीब 700 मिलियन डॉलर (लगभग 70 करोड़ डॉलर) के मानवीय राहत फंड का कोई पुख्ता लेखा-जोखा नहीं मिल पा रहा है। इस भारी अनियमितता को लेकर अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (अफ्रीका सीडीसी) और कांगो की सरकार ने सीधे तौर पर उन अंतरराष्ट्रीय तथा स्थानीय राहत संगठनों से जवाब मांगा है जो जमीन पर राहत कार्यों का संचालन कर रहे हैं। यह संकट ऐसे समय में गहराया है जब यह खतरनाक वायरस कांगो के आठ प्रांतों में अपने पैर पसार चुका है और पड़ोसी देशों युगांडा तथा केन्या की सीमाओं को भी पार कर चुका है।

## सहायता राशि का बड़ा हिस्सा कागजों में गायब
अफ्रीका सीडीसी के महानिदेशक डॉ. जीन कसेया ने हाल ही में सार्वजनिक किए गए वित्तीय आंकड़ों में बताया कि जब से इस महामारी की घोषणा हुई है, तब से अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं द्वारा कुल 962 मिलियन डॉलर की सहायता राशि जारी की जा चुकी है। हालांकि, जमीन पर काम करने वाले संगठनों के पास केवल 200 मिलियन डॉलर के करीब का ही हिसाब मौजूद है। बाकी बचे हुए लगभग 700 मिलियन डॉलर की राशि कहां खर्च हुई या उसका क्या हुआ, इसका कोई विस्तृत रिकॉर्ड सरकार या शीर्ष स्वास्थ्य निकाय को नहीं सौंपा गया है।

कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए राहत कार्यों में जुटी संस्थाओं की एक विशेष बैठक बुलाई थी। इस बैठक में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), यूनिसेफ और वर्ल्ड फूड प्रोग्राम जैसी संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख एजेंसियों के अलावा सेव द चिल्ड्रन और मेडिसिन्स डू मोंडे जैसे अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों को आमंत्रित किया गया था। डॉ. जीन कसेया के अनुसार, बैठक के लिए अधिकृत कुल संगठनों में से केवल एक-तिहाई प्रतिनिधि ही वित्तीय ब्योरे के साथ वहां पहुंचे।

बैठक में शामिल होने वाले संगठनों ने पुष्टि की कि उन्हें कुल 228 मिलियन डॉलर की राशि मिली थी। इनमें से उन्होंने 127 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं, जबकि लगभग 100 मिलियन डॉलर की धनराशि अभी भी उनके पास उपलब्ध है। शेष दो-तिहाई संस्थाओं द्वारा कोई विवरण न दिए जाने के कारण संपूर्ण वित्तीय परिदृश्य की स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आ सकी है। अफ्रीका सीडीसी ने इस पर सख्त आपत्ति जताते हुए कहा कि वित्तीय पारदर्शिता की यह भारी कमी सरकारी स्तर पर संसाधनों के आकलन और वास्तविक परिणामों की समीक्षा को पूरी तरह बाधित कर रही है।

## कांगो सरकार का कड़ा रुख और संस्थाओं पर कार्रवाई
वित्तीय अनियमितताओं का यह मामला सामने आने के बाद कांगो के प्रशासन ने यह साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि सीधे तौर पर देश के सरकारी खजाने में जमा नहीं की जाती। इसके बजाय, यह पैसा सीधे तौर पर स्वतंत्र एजेंसियों, गैर-सरकारी संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के निकायों को हस्तांतरित किया जाता है। कांगो के संचार मंत्री पैट्रिक मुयाया ने स्पष्ट किया कि जब तक हर एक भागीदार संगठन पाई-पाई का हिसाब और अपने खर्च की योजनाओं का विवरण साझा नहीं करता, तब तक पूरी पारदर्शिता हासिल नहीं की जा सकती।

कांगो के स्वास्थ्य मंत्री सैमुअल रोजर कंबा ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राहत एजेंसियों के संचालन पर कड़े प्रतिबंध लागू करने की घोषणा की है। उन्होंने बताया कि पूर्व में अधिकृत लगभग 100 संगठनों में से अब केवल 25 चुनिंदा एजेंसियों को ही मान्यता दी गई है। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि जमीन पर काम करने वाली हर संस्था को यह बताना होगा कि उसे किस दानदाता से कितना फंड मिला और वह उस धन का उपयोग किस प्रकार की योजनाओं में कर रही है। अफ्रीका सीडीसी और कांगो के अधिकारी अब लापता 700 मिलियन डॉलर की पड़ताल के लिए संयुक्त जांच में जुटे हैं।

## स्वास्थ्य कर्मियों की हड़ताल और स्थानीय आबादी में गुस्सा
इस बड़े वित्तीय घपले की खबरों ने पूर्वी कांगो के स्थानीय नागरिकों और स्वास्थ्य कर्मियों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है। पिछले कुछ हफ्तों से अग्रिम मोर्चे पर तैनात स्वास्थ्य कर्मी वेतन न मिलने, घोषित प्रोत्साहन राशि से वंचित रखे जाने और असुरक्षित कार्य स्थितियों के विरोध में हड़ताल कर रहे हैं। संक्रमण के खतरे के बीच दिन-रात काम करने वाले इन कर्मचारियों का कहना है कि अरबों डॉलर की घोषणाओं के बावजूद उन्हें बुनियादी सुविधाएं और उनका हक नहीं दिया जा रहा है।

प्रकोप के केंद्र बूनिया में सेवाएं दे रहे नर्स प्रिंस बहाती ने कहा कि ऐसे हालात कतई स्वीकार्य नहीं हैं और संसाधनों के प्रबंधन में सख्त निगरानी के साथ पूरी स्पष्टता लाई जानी चाहिए। वहीं बूनिया के स्थानीय निवासी अनिसेट काकुले ने राहत कार्यों की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने बताया कि समुचित देखभाल न मिलने के कारण उनके एक दोस्त ने इबोला उपचार केंद्र में दम तोड़ दिया। काकुले ने कहा कि राहत के नाम पर इतनी विशाल धनराशि की बात सुनकर लोगों को यह विश्वास होने लगता है कि कई गैर-सरकारी संगठनों के लिए यह बीमारी एक कारोबार बन चुकी है। उन्होंने मांग की कि राहत कोष का प्रबंधन सरकार और डब्ल्यूएचओ जैसे साझेदारों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

## घातक वायरस और चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी
कांगो में यह प्रकोप मई के मध्य में घोषित किया गया था, जो अब तक का सबसे घातक दौर साबित हुआ है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, संक्रमण के कम से कम 9,400 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 4,500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। हाल ही में यह बीमारी उत्तरी कांगो के आठवें प्रांत तक फैल गई। इसके अलावा वायरस की दस्तक पड़ोसी देशों में भी हुई, जहां युगांडा ने संक्रमण को नियंत्रित कर खुद को मुक्त घोषित किया, जबकि केन्या में पिछले सप्ताह सातवां मामला सामने आया।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट दुर्लभ बुंदिबुग्यो वायरस के कारण उत्पन्न हुआ है। इस विशिष्ट स्ट्रेन के लिए अभी तक कोई स्वीकृत टीका या सटीक इलाज उपलब्ध नहीं है, जिससे इसके फैलाव को रोकना चिकित्सा तंत्र के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। आबादी का निरंतर विस्थापन, विद्रोही गुटों द्वारा की जाने वाली हिंसा, स्वास्थ्य तंत्र पर जनसाधारण का अविश्वास और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं की दयनीय स्थिति इस महामारी को लगातार हवा दे रही है। फंड की कमी और वित्तीय गैर-जिम्मेदारी ने इस मानवीय संकट को और अधिक विकराल बना दिया है।

## इसका आप पर असर
कांगो में इबोला राहत राशि में भारी विसंगति के कारण अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहायता तंत्र और महामारी नियंत्रण पर गंभीर असर पड़ा है।

- **वैश्विक स्तर पर:** अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य दानदाताओं द्वारा गैर-सरकारी संगठनों को दिए जाने वाले फंड की ऑडिटिंग और जांच अब बहुत सख्त होगी। इसके चलते भविष्य में आने वाली अन्य वैश्विक महामारियों के दौरान राहत राशि जारी होने में देरी हो सकती है।
- **कांगो में:** कांगो में काम करने वाले राहत संगठनों की संख्या 100 से घटाकर केवल 25 कर दी गई है। इसके परिणामस्वरूप दूरदराज के क्षेत्रों में मरीजों को मिलने वाली प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं और राहत आपूर्ति तुरंत बाधित हो सकती है।
- **स्वास्थ्य कर्मियों पर:** अग्रिम मोर्चे पर जान जोखिम में डालकर काम करने वाले स्थानीय डॉक्टरों और नर्सों के रुके हुए वेतन व भत्तों का भुगतान अभी अधर में लटक गया है। जब तक वित्तीय जांच पूरी नहीं होती, तब तक कर्मचारियों के हड़ताल पर बने रहने की संभावना है।
- **पड़ोसी देशों में:** केन्या और युगांडा जैसे सीमावर्ती देशों में स्क्रीनिंग और निगरानी को तुरंत बढ़ाना होगा क्योंकि बिना दवा या टीके के वायरस का सीमा पार प्रसार बढ़ रहा है। आम नागरिकों को सीमा पार यात्रा करते समय कड़ी मेडिकल जांच से गुजरना पड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह वित्तीय विवाद और स्वास्थ्य संकट अंतरराष्ट्रीय फंडिंग तंत्र में पारदर्शिता की कमी, अशांत क्षेत्र में अनियंत्रित संचालन और एक अत्यंत घातक वायरस के फैलाव के चलते उत्पन्न हुआ है।

- **प्रत्यक्ष कारण:** दानदाताओं द्वारा जारी 962 मिलियन डॉलर में से अधिकांश पैसा सीधे स्वतंत्र एजेंसियों और एनजीओ को दिया गया था, न कि सरकार के खजाने में। केवल एक-तिहाई संस्थाओं द्वारा वित्तीय ब्योरा पेश किए जाने के कारण करीब 700 मिलियन डॉलर का रिकॉर्ड सामने नहीं आ सका।
- **जमीनी परिस्थितियां:** पूर्वी कांगो दशकों से विद्रोही हिंसा, बड़े पैमाने पर नागरिक विस्थापन और स्थानीय आबादी के अविश्वास से जूझ रहा है। अशांति के कारण कई अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियां बिना किसी एकीकृत सरकारी निगरानी के स्वतंत्र रूप से काम कर रही थीं।
- **चिकित्सीय जटिलता:** यह प्रकोप दुर्लभ बुंदिबुग्यो वायरस के कारण हुआ है, जिसका कोई स्वीकृत टीका या सटीक उपचार मौजूद नहीं है। दवा की अनुपलब्धता और फ्रंटलाइन कर्मियों के वेतन न मिलने से उपजी हड़ताल ने बीमारी को आठ प्रांतों तक फैलने का रास्ता दे दिया।

## सवाल-जवाब

### 1. कांगो में इबोला राहत फंड से जुड़ी मुख्य समस्या क्या है?
अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं द्वारा जारी किए गए 962 मिलियन डॉलर में से केवल करीब 200 मिलियन डॉलर का हिसाब मिल सका है, जबकि लगभग 700 मिलियन डॉलर का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

### 2. कांगो सरकार ने इस मामले में क्या कदम उठाया है?
सरकार ने राहत कार्यों में जुटी संस्थाओं पर सख्त नियंत्रण लगाते हुए अधिकृत एनजीओ की संख्या करीब 100 से घटाकर केवल 25 कर दी है और विस्तृत खर्च रिपोर्ट मांगी है।

### 3. वर्तमान इबोला प्रकोप कितना गंभीर है?
यह कांगो के इतिहास का सबसे घातक प्रकोप है, जिसमें अब तक 9,400 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और 4,500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।

### 4. यह बीमारी किन अन्य देशों तक पहुंच चुकी है?
कांगो के अलावा यह संक्रमण युगांडा और केन्या तक फैल चुका है, हालांकि युगांडा ने बाद में खुद को संक्रमण मुक्त घोषित कर दिया था।

### 5. इस इबोला वायरस की रोकथाम में क्या बड़ी वैज्ञानिक बाधा है?
यह बीमारी दुर्लभ बुंदिबुग्यो वायरस के कारण फैली है, जिसके इलाज के लिए वर्तमान में कोई भी स्वीकृत टीका या सटीक दवा मौजूद नहीं है।

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