एकतरफा पश्चिमी टैरिफ और कार्बन टैक्स के खिलाफ एकजुट हुए ब्रिक्स देश, संरक्षणवाद पर उठाया सवाल ब्रिक्स देशों ने एक साझा घोषणापत्र जारी कर विकसित देशों द्वारा लगाए जा रहे एकतरफा टैरिफ और कार्बन बॉर्डर टैक्स का कड़ा विरोध किया है और इसे विकासशील देशों के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताया है। एक बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम में ब्रिक्स देशों ने विकसित अर्थव्यवस्थाओं द्वारा लगाए जा रहे एकतरफा व्यापारिक टैरिफ और कार्बन बॉर्डर टैक्स का कड़ा विरोध करते हुए एक साझा घोषणापत्र जारी किया है। सदस्य देशों ने इन एकतरफा व्यापार उपायों को अत्यधिक भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी करार दिया है। ब्रिक्स का मानना है कि पर्यावरण सुरक्षा की आड़ में लागू किए जा रहे ये नियम विकासशील देशों को नुकसान पहुंचाते हैं और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। संरक्षणवादी नीतियों के खिलाफ एकजुट हुआ ब्रिक्स भारत की अगुवाई में आयोजित हुए इस सम्मेलन में सदस्य देशों ने भेदभावपूर्ण व्यापार प्रथाओं से निपटने के लिए सहमति व्यक्त की। साझा घोषणापत्र में विशेष रूप से कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) और अन्य एकतरफा शुल्कों का विरोध किया गया है। सदस्य देशों का तर्क है कि इस तरह की नीतियां विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को अनुचित रूप से निशाना बनाती हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करती हैं। इस साझा कदम के जरिए यह समूह पश्चिमी देशों की उन आर्थिक नीतियों को चुनौती देना चाहता है जो मुक्त व्यापार को बाधित करती हैं। भू-राजनीतिक तनाव और टैरिफ की धमकियां यह सामूहिक विरोध ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक व्यापार में टैरिफ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारी आयात शुल्क लगाने की वकालत करते रहे हैं, जिसमें बाइपार्टिसन रशिया सेंक्शंस बिल जैसे उपायों के माध्यम से 500% तक टैरिफ लगाने के प्रस्ताव भी शामिल हैं। इन आक्रामक व्यापारिक रणनीतियों ने वैश्विक तनाव बढ़ा दिया है, जिससे निपटने के लिए ब्रिक्स देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर, रूस भी G7 के विकल्प के रूप में इस समूह को मजबूत करने पर जोर दे रहा है, जहां व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी आर्थिक वर्चस्व की आलोचना करते हुए ब्रिक्स की बढ़ती ताकत का उल्लेख किया है। आंतरिक मतभेद और रणनीतिक तालमेल हालांकि यह समूह पश्चिमी व्यापारिक बाधाओं के खिलाफ एकजुट नजर आ रहा है, लेकिन इसके भीतर भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। चीन के इशारे पर ब्रिक्स के हालिया विस्तार ने सदस्य देशों के बीच कुछ मुद्दों पर आंतरिक मतभेदों को भी जन्म दिया है। इसके बावजूद, जब बात पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देने की आती है, तो भारत, चीन और रूस जैसे प्रमुख देश एक साथ खड़े नजर आते हैं। रूसी तेल के आयात को लेकर भारत पर बने दबाव और अमेरिकी प्रतिबंधों की धमकियों ने भी विकासशील देशों को एक ऐसे मजबूत मंच के निर्माण के लिए प्रेरित किया है जो एकतरफा प्रतिबंधों और भारी टैरिफ का मुकाबला कर सके। इसका आप पर असर वैश्विक शुल्कों और कार्बन टैक्स के विरोध के कारण आयातित वस्तुओं की कीमतों और औद्योगिक रणनीतियों में बदलाव आ सकता है। • वैश्विक व्यापार पर असर: व्यापार प्रतिबंधों के कारण प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच जवाबी टैरिफ लग सकते हैं। इसके चलते आयातित इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उपभोक्ता सामान महंगे हो सकते हैं। • घरेलू उद्योगों को सहारा: अंतरराष्ट्रीय टैरिफ का मुकाबला करने के लिए सरकारें स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा दे सकती हैं। इससे लंबे समय में देश के औद्योगिक क्षेत्रों में नए रोजगार पैदा होने की संभावना है। • पर्यावरणीय नियमों का प्रभाव: CBAM जैसे सख्त नियमों के कारण निर्यातकों को हरित उत्पादन विधियों को अपनाना होगा। इस बदलाव से शुरुआती उत्पादन लागत बढ़ सकती है लेकिन टिकाऊ व्यापार पद्धतियों को बढ़ावा मिलेगा। • निवेशकों के लिए अनिश्चितता: ब्रिक्स और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ता व्यापारिक टकराव शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव ला सकता है। निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों पर बारीकी से नजर रखनी होगी। ऐसा क्यों हुआ विकसित देशों द्वारा लागू की जा रही संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों और पर्यावरण नियमों के विरोध में ब्रिक्स देशों ने यह कदम उठाया है। • नीतियों का कड़ा विरोध: पश्चिमी देश अपनी स्थानीय कंपनियों को बचाने के लिए कार्बन टैक्स जैसे नियम लागू कर रहे हैं। उभरती अर्थव्यवस्थाओं का मानना है कि ये नियम मुक्त व्यापार की मूल भावना को आघात पहुंचाते हैं। • आक्रामक अमेरिकी रुख: अमेरिका में बाइपार्टिसन रशिया सेंक्शंस बिल जैसे प्रस्तावों के तहत भारी आयात शुल्क लगाने की लगातार धमकियां दी जा रही हैं। इस वजह से ब्रिक्स देशों ने अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए मोर्चाबंदी शुरू कर दी है। • वैश्विक ध्रुवीकरण: G7 देशों के आर्थिक प्रभुत्व के खिलाफ रूस और चीन लगातार ब्रिक्स का दायरा बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी भू-राजनीतिक होड़ के कारण यह साझा मंच पश्चिमी नीतियों के खिलाफ खुलकर सामने आया है। सवाल-जवाब 1. ब्रिक्स देशों ने अपने साझा घोषणापत्र में किस बात का विरोध किया है? ब्रिक्स देशों ने विकसित देशों द्वारा लगाए जा रहे एकतरफा टैरिफ और कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) का कड़ा विरोध किया है। 2. ब्रिक्स इन टैक्स नीतियों को विकासशील देशों के खिलाफ क्यों मानता है? समूह का तर्क है कि ये एकतरफा नीतियां विकासशील देशों के साथ भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी व्यवहार करती हैं और मुक्त व्यापार को रोकती हैं। 3. क्या ये शुल्क अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुकूल हैं? साझा घोषणापत्र के अनुसार, विकसित देशों द्वारा लगाए जा रहे ये एकतरफा टैरिफ विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के पूरी तरह खिलाफ हैं। 4. ब्रिक्स देशों को यह कड़ा रुख अपनाने के लिए किन बाहरी परिस्थितियों ने प्रेरित किया है? डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से दिए जा रहे भारी टैरिफ के प्रस्तावों और अमेरिकी प्रतिबंधों की लगातार धमकियों के चलते ब्रिक्स देश अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए एकजुट हुए हैं। https://trendkia.com/world/ekatarapha-pashchimi-tariff-aura-carbon-tax-ke-khilapha-ekajuta-hue-brics-desha-snrakshanavada-para-uthaya-savala-31559 TrendKia — Har trend, sabse pehle.