होर्मुज को खुला रखने के लिए अमेरिका का ताजा हमला, ईरान पर मिसाइलें और कच्चे तेल में हलचल अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमलों का एक और दौर चलाया और होर्मुज जलसंधि में एक तेल टैंकर को निशाना बनाकर बेकार कर दिया। इसी बीच WTI कच्चा तेल 0.55% चढ़कर 79.60 डॉलर पर पहुंच गया। अमेरिका की सेना ने ईरान के खिलाफ हमलों का एक और सिलसिला शुरू कर दिया है। US सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने बुधवार को बताया कि यह ताजा कार्रवाई होर्मुज जलसंधि को जहाजों की आवाजाही के लिए खुला रखने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है। यही वह संकरा समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है, और इसी वजह से यहां का हर टकराव सीधे तेल बाजार पर असर डालता है। सेना ने यह भी बताया कि अमेरिकी विमानों ने इस अहम जलमार्ग में एक तेल टैंकर की चिमनी (स्मोकस्टैक) पर मिसाइलें दागीं, जिससे वह जहाज पूरी तरह बेकार हो गया। दूसरी तरफ, जब पत्रकारों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पूछा कि क्या ईरान को कोई समयसीमा दी गई है, जिसके बाद अमेरिका ईरानी पुलों पर हमला शुरू कर देगा, तो ट्रंप ने कहा कि उन्हें समयसीमा देना पसंद नहीं है। ईरान का जवाब ईरान के मुख्य वार्ताकार और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ ने इस तनाव के बीच अपने देश का रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि ईरान ने "न कभी युद्ध का स्वागत किया है, और न अब करता है।" इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि "हमें हमेशा लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा तथा हितों की रक्षा के लिए मजबूती से डटे रहना चाहिए।" उनके इस बयान से साफ है कि ईरान टकराव नहीं चाहता, लेकिन दबाव में झुकने के मूड में भी नहीं दिख रहा। तेल बाजार पर सीधा असर इस भू-राजनीतिक तनाव का असर तुरंत कच्चे तेल की कीमतों पर दिखा। खबर लिखे जाने तक वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) दिन में 0.55% चढ़कर 79.60 डॉलर पर कारोबार कर रहा था। होर्मुज जैसे रास्ते पर किसी भी खतरे की आशंका से आपूर्ति में रुकावट का डर बढ़ता है, और यही डर कीमतों को ऊपर धकेलता है। WTI क्रूड आखिर है क्या WTI तेल एक तरह का कच्चा तेल है जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खरीद-बिक्री होती है। WTI का मतलब है वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट, जो कच्चे तेल की तीन प्रमुख किस्मों में से एक है। बाकी दो किस्में ब्रेंट और दुबई क्रूड हैं। WTI को "लाइट" और "स्वीट" भी कहा जाता है, क्योंकि इसका घनत्व (ग्रैविटी) अपेक्षाकृत कम होता है और इसमें सल्फर की मात्रा भी कम रहती है। इसे बेहतरीन गुणवत्ता वाला तेल माना जाता है जिसे आसानी से रिफाइन किया जा सकता है। यह अमेरिका से निकाला जाता है और कुशिंग हब के जरिए इसकी सप्लाई होती है, जिसे "दुनिया का पाइपलाइन चौराहा" कहा जाता है। यह तेल बाजार का एक बेंचमार्क है और मीडिया में अक्सर WTI की कीमत का ही हवाला दिया जाता है। कीमत को कौन-कौन से कारक चलाते हैं बाकी सभी संपत्तियों की तरह WTI तेल की कीमत के पीछे भी सबसे बड़ी ताकत मांग और आपूर्ति ही होती है। जब दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है तो तेल की मांग बढ़ती है और कीमतें ऊपर जाती हैं, जबकि सुस्त वैश्विक विकास इसका उल्टा असर डालता है। राजनीतिक अस्थिरता, युद्ध और प्रतिबंध आपूर्ति में गड़बड़ी पैदा करके कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसा ईरान पर मौजूदा तनाव के दौरान देखने को मिल रहा है। बड़े तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक के फैसले भी कीमत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा अमेरिकी डॉलर की कीमत का भी सीधा असर पड़ता है, क्योंकि तेल का कारोबार ज्यादातर डॉलर में ही होता है। ऐसे में कमजोर डॉलर तेल को सस्ता बना देता है और मजबूत डॉलर उसे महंगा। इन्वेंट्री रिपोर्ट की भूमिका अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) और एनर्जी इंफॉर्मेशन एजेंसी (EIA) की ओर से हर हफ्ते आने वाली तेल भंडार (इन्वेंट्री) रिपोर्ट WTI की कीमत पर असर डालती हैं। भंडार में बदलाव मांग और आपूर्ति के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। अगर आंकड़े भंडार में गिरावट दिखाते हैं तो यह बढ़ती मांग का संकेत होता है, जिससे कीमतें ऊपर जाती हैं। वहीं भंडार बढ़ने का मतलब है ज्यादा आपूर्ति, जो कीमतों को नीचे खींचती है। API की रिपोर्ट हर मंगलवार को आती है और EIA की उसके अगले दिन। दोनों के नतीजे आमतौर पर मिलते-जुलते होते हैं और 75% मामलों में एक-दूसरे से महज 1% के दायरे में रहते हैं। EIA के आंकड़ों को ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है, क्योंकि यह एक सरकारी एजेंसी है। ओपेक और ओपेक+ का दबदबा ओपेक यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज 12 तेल उत्पादक देशों का समूह है, जो साल में दो बार होने वाली बैठकों में सदस्य देशों के लिए उत्पादन कोटा मिलकर तय करता है। इनके फैसले अक्सर WTI की कीमतों पर असर डालते हैं। जब ओपेक कोटा घटाने का फैसला करता है तो आपूर्ति कम हो जाती है और तेल की कीमतें चढ़ जाती हैं। इसके उलट, जब ओपेक उत्पादन बढ़ाता है तो कीमतों पर ठीक विपरीत असर पड़ता है। ओपेक+ इसी समूह का एक बड़ा रूप है, जिसमें दस अतिरिक्त गैर-ओपेक देश भी शामिल हैं, और इनमें सबसे प्रमुख नाम रूस का है। कुल मिलाकर, ईरान पर अमेरिका के ताजा हमले और होर्मुज जलसंधि को लेकर बढ़ता तनाव सिर्फ एक सैन्य कहानी नहीं है। यह सीधे तौर पर उस समीकरण से जुड़ा है जो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों से लेकर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की सेहत तक को प्रभावित करता है। इसका आप पर असर • भारत में: भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, इसलिए होर्मुज के तनाव से कच्चा तेल महंगा हुआ तो आगे चलकर पेट्रोल-डीजल और ढुलाई की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। • निवेशकों के लिए: कच्चे तेल और ऊर्जा से जुड़े शेयरों में उतार-चढ़ाव तेज हो सकता है, क्योंकि WTI पहले ही 0.55% चढ़कर 79.60 डॉलर पर है। सवाल-जवाब 1. अमेरिका ने ईरान पर हमले क्यों किए? US सेंट्रल कमांड के मुताबिक यह हमलों का एक और दौर होर्मुज जलसंधि को जहाजों के लिए खुला रखने की कोशिश का हिस्सा है। 2. होर्मुज जलसंधि में तेल टैंकर का क्या हुआ? अमेरिकी विमानों ने एक तेल टैंकर की चिमनी पर मिसाइलें दागीं, जिससे वह जहाज पूरी तरह बेकार हो गया। 3. डोनाल्ड ट्रंप ने समयसीमा को लेकर क्या कहा? पत्रकारों के पूछने पर ट्रंप ने कहा कि उन्हें समयसीमा देना पसंद नहीं है। 4. ईरान का इस पर क्या रुख है? संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर ग़ालिबाफ ने कहा कि ईरान ने न कभी युद्ध का स्वागत किया है और न अब करता है, लेकिन देश को अपनी सुरक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। 5. इस तनाव के बीच WTI कच्चे तेल की कीमत कितनी रही? खबर लिखे जाने तक WTI दिन में 0.55% चढ़कर 79.60 डॉलर पर कारोबार कर रहा था। 6. WTI तेल क्या होता है? यह अमेरिका में निकाला जाने वाला एक हल्का और कम सल्फर वाला कच्चा तेल है, जो ब्रेंट और दुबई क्रूड के साथ तीन प्रमुख किस्मों में से एक है और तेल बाजार का बेंचमार्क माना जाता है। https://trendkia.com/world/hormuja-ko-khula-rakhane-ke-lie-amerika-ka-taja-hamala-iran-para-misailen-aura-kachche-tela-men-halachala-8005 TrendKia — Har trend, sabse pehle.