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  "type": "article",
  "title": "इजरायली संसद चुनाव में नेतन्याहू सबसे आगे रहने के बावजूद बहुमत से चूके, सरकार गठन को लेकर आइसेनकोट गुट की तेज हुई हलचल",
  "summary": "इजरायल में संसदीय चुनाव के नतीजे आने के बाद त्रिशंकु संसद की स्थिति बन गई है, जहां नेतन्याहू और आइसेनकोट के सामने गठबंधन के पेचीदा समीकरण खड़े हैं।",
  "content": "इजरायल में संसदीय चुनावों के लिए मतदान के बाद सभी मतों की गिनती पूरी हो चुकी है, जिसके बाद देश में नई हुकूमत के गठन को लेकर सियासी सरगर्मियां चरम पर पहुंच गई हैं। इन चुनावों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी नेसेट यानी इजरायली संसद में सबसे बड़े सियासी दल के तौर पर तो जरूर उभरी है, लेकिन वे अपने बूते सरकार बनाने या सत्ता में एक और कार्यकाल सुरक्षित करने के लिए जरूरी जादुई आंकड़े से दूर रह गए हैं। चुनाव परिणाम सामने आने के तुरंत बाद अब देश में एक मजबूत और व्यावहारिक गठबंधन खड़ा करने के लिए गहन राजनीतिक विचार-विमर्श का सिलसिला शुरू हो चुका है, जिसमें अरब राजनीतिक पार्टियां बेहद निर्णायक किंगमेकर की भूमिका में नजर आ रही हैं। दूसरी तरफ विपक्षी खेमे की कमान संभाल रहे नेता गादी आइसेनकोट के सामने भी सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के लिए कई कड़े और अप्रत्याशित समझौते करने की जटिल चुनौती पैदा हो गई है।\n\n संसद की इस खंडित तस्वीर के बीच जिस फार्मूले की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है अरब राजनीतिक गुटों के बाहरी या प्रत्यक्ष समर्थन से गादी आइसेनकोट के नेतृत्व में एक वैकल्पिक सरकार का गठन करना। जब देश में वोट डाले जा रहे थे, उसी दौरान मंगलवार की शाम हिब्रू यूनिवर्सिटी के अकॉर्ड सेंटर द्वारा जारी किए गए एक विस्तृत सर्वेक्षण ने विपक्षी समर्थकों की नब्ज जाहिर की थी। इस सर्वे से यह साफ संकेत मिलते हैं कि नेतन्याहू विरोधी मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग सत्ता परिवर्तन के लिए अरब दलों के साथ जाने के फार्मूले को किस नजरिए से देखता है और किन विकल्पों को प्राथमिकता देता है।\n\n \n\nअकॉर्ड सेंटर के चुनावी सर्वे में उभरे आंकड़े\n\nसर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, विपक्षी धड़े की चार प्रमुख राजनीतिक ताकतों के समर्थकों की राय इस मामले में बेहद स्पष्ट दिखाई दी। इनमें गादी आइसेनकोट की पार्टी 'यशार', नफ्ताली बेनेट की 'ब्याचाद', यायर गोलान की 'डेमोक्रेट्स' और एविग्डोर लिबरमैन की 'यिसरायल बेतेनु' शामिल हैं। इन चारों विपक्षी दलों के करीब 61 प्रतिशत मतदाताओं ने इस बात का जोरदार समर्थन किया कि गादी आइसेनकोट की अगुवाई में बनने वाली किसी भी संभावित गठबंधन सरकार में मंसूर अब्बास की अगुवाई वाली 'राआम' पार्टी को सीधे तौर पर शामिल किया जाना चाहिए।\n\n सर्वे में शामिल वोटरों के सामने गठबंधन से जुड़े जो अलग-अलग विकल्प रखे गए थे, उनमें इस प्रस्ताव को मतदाताओं की सबसे बड़ी हिस्सेदारी का समर्थन मिला। इसके विपरीत, केवल 20 प्रतिशत लोगों ने यह राय जाहिर की कि यदि स्पष्ट गठबंधन न बन पाए तो देश को नए सिरे से नए चुनाव की ओर बढ़ना चाहिए। इसके अलावा, करीब 12 प्रतिशत मतदाताओं ने बेंजामिन नेतन्याहू के साथ रोटेशन यानी बारी-बारी से प्रधानमंत्री पद साझा करने वाली सरकार के विकल्प पर अपनी सहमति दी। वहीं केवल 7 प्रतिशत मतदाता ऐसे थे जो अति-रूढ़िवादी यानी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टियों के साथ गठबंधन करके सरकार चलाने के पक्ष में दिखे। यह पूरा चुनावी सर्वे साफ दर्शाता है कि विपक्षी मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग नेतन्याहू की सत्ता से विदाई सुनिश्चित करने के लिए अरब पार्टियों के साथ हाथ मिलाने को पूरी तरह तैयार है।\n\n \n\nनेसेट के भीतर संख्या बल और राजनीतिक गणित\n\nयदि इजरायली संसद के संख्या बल के आंकड़ों को तौला जाए, तो यह विपक्षी गठबंधन का समीकरण कागजों पर बेहद मजबूत और मुकम्मल दिखाई देता है। मुख्य विपक्षी खेमे के पास कुल 48 सीटें मौजूद हैं। यदि इसमें मंसूर अब्बास की 'राआम' पार्टी की 8 सीटों और 'जॉइंट लिस्ट' की 11 सीटों को जोड़ दिया जाए, तो गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले पूरे गुट का आंकड़ा सीधे 67 सीटों तक पहुंच जाता है। यह संख्या नेसेट में साधारण बहुमत के लिए तय सीमा से कहीं अधिक और आरामदायक स्थिति दर्शाती है। हालांकि, इजरायल के ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल में केवल इन कागजी आंकड़ों के सहारे एक स्थिर और लंबे समय तक चलने वाला गठबंधन अस्तित्व में आ ही जाएगा, ऐसा दावा करना व्यावहारिक राजनीति की कसौटी पर आसान नहीं माना जा सकता।\n\n \n\nइजरायल में नई हुकूमत बनाने के चार मुख्य रास्ते\n\nमौजूदा राजनीतिक गतिरोध को तोड़ने और नई हुकूमत की स्थापना के लिए प्रमुख रूप से चार सियासी रास्ते उभर कर सामने आए हैं, जिन पर अलग-अलग दल अपनी रणनीतियां तलाश रहे हैं\n\n पहला रास्ता: नेतन्याहू का दक्षिणपंथी जोड़तोड़प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपने नेतृत्व में एक दक्षिणपंथी गठबंधन खड़ा करने का प्रयास कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें अपने धुर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी गादी आइसेनकोट के खेमे में मौजूद दक्षिणपंथी झुकाव वाली पार्टियों को तोड़कर या मनाकर अपने पाले में लाना होगा। यदि वे इन दक्षिणपंथी गुटों को विपक्ष से अलग करने में सफल रहते हैं, तो वे एक बार फिर पूर्ण बहुमत वाली गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर सकते हैं। वहीं इसी समीकरण के दूसरे छोर पर गादी आइसेनकोट हैं, जिन्हें अपनी सरकार बनाने के लिए अरब दलों का प्रत्यक्ष समर्थन अपरिहार्य होगा। यदि 'जॉइंट लिस्ट' और 'राआम' औपचारिक रूप से आइसेनकोट के पाले में आती हैं, तो वे नेसेट में 67 सांसदों के भारी समर्थन से सरकार बना सकते हैं।\n\n दूसरा रास्ता: अरब सांसदों के सहारे अल्पमत सरकारएक अन्य विकल्प यह माना जा रहा है कि गादी आइसेनकोट अरब सांसदों को मंत्रिमंडल या सरकार में औपचारिक रूप से शामिल न करें, बल्कि सदन में एक अल्पमत सरकार चलाने के लिए उनसे बाहर से समर्थन हासिल कर लें। सरकार के गठन के समय शुरुआती विश्वास मत को सफलतापूर्वक पार करने के लिए पूर्व आईडीएफ प्रमुख गादी आइसेनकोट को अरब दलों के कम से कम छह सांसदों के समर्थन की सख्त दरकार होगी। हालांकि, यह अभी पूरी तरह अनिश्चित है कि अरब राजनीतिक नेतृत्व ऐसी किसी व्यवस्था के लिए राजी होगा या नहीं, जिसमें उन्हें प्रत्यक्ष सत्ता और सरकार से पूरी तरह बाहर रखा गया हो।\n\n तीसरा रास्ता: व्यापक राष्ट्रीय एकता सरकार का गठनएक तीसरा समीकरण बेंजामिन नेतन्याहू और गादी आइसेनकोट के संयुक्त नेतृत्व वाली एक राष्ट्रीय एकता सरकार का है। इस तरह के व्यापक राष्ट्रीय मोर्चे के पास नेसेट में 66 सांसदों की मजबूत संख्या हो सकती है, जो बहुमत के आंकड़े से पांच सीटें अधिक है। इस संभावित राष्ट्रीय एकता सरकार के दायरे में नेतन्याहू की लिकुड, आइसेनकोट की यशार, बेनेट और लैपिड की ब्याचाद और एविग्डोर लिबरमैन की यिसरायल बेतेनु जैसी प्रमुख पार्टियां एक साझा मंच पर आ सकती हैं। परंतु इस गठबंधन की सबसे बड़ी व्यावहारिक अड़चन यह है कि आइसेनकोट को इसके लिए अपने उस मूल राजनीतिक संकल्प से पीछे हटना होगा, जिसके तहत उन्होंने खुद को देश की राजनीति में नेतन्याहू के एकमात्र और स्पष्ट विकल्प के तौर पर पेश किया है।\n\n चौथा रास्ता: नए चुनाव की तरफ बढ़नाअंतिम विकल्प, जिस पर सभी दल तभी विचार करेंगे जब सरकार बनाने के बाकी तमाम रास्ते पूरी तरह बंद हो जाएं, वह है देश को एक बार फिर नए आम चुनावों की ओर धकेल देना। इस गतिरोध और नए चुनावों की स्थिति का सीधा राजनीतिक लाभ बेंजामिन नेतन्याहू को मिल सकता है। जब तक नए चुनाव संपन्न होकर नई सरकार नहीं बन जाती, तब तक नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के पद पर बने रहेंगे। इसके साथ ही वे अगले चुनाव को अपने लिए पूर्ण बहुमत हासिल करने के एक और सुनहरे अवसर के रूप में भुनाने की कोशिश कर सकते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nइजरायल में त्रिशंकु संसद बनने और नई सरकार के गठन में आ रही पेचीदगियों का सीधा असर मध्य पूर्व की कूटनीति और वैश्विक कूटनीतिक स्थिरता पर देखने को मिल सकता है।\n\n• वैश्विक कूटनीति पर: इजरायल में लंबे समय तक अस्थिरता या कार्यवाहक सरकार रहने से पश्चिम एशिया की शांति वार्ताओं और सुरक्षा समझौतों में ठहराव आ सकता है। नीतिगत अनिश्चितता के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक साझेदारी के फैसले लटक सकते हैं।\n• इजरायली जनता पर: राजनीतिक गतिरोध के कारण घरेलू बजट और प्रमुख आर्थिक सुधारों को संसद से पारित कराने में भारी देरी होगी। आम नागरिकों को नीतिगत फैसलों के अभाव में लंबे समय तक प्रशासनिक अनिश्चितता झेलनी पड़ सकती है।\n• अरब दलों की स्थिति पर: इजरायली सत्ता संतुलन में अरब सांसदों का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से बढ़ जाएगा। अगर वे गठबंधन में शामिल होते हैं, तो वे अपने मतदाताओं से जुड़े स्थानीय विकास और अधिकारों की मांगें मजबूती से मनवा सकते हैं।\n• संभावित नए चुनावों पर: यदि कोई भी दल सरकार बनाने में पूरी तरह नाकाम रहता है, तो देश को फिर से भारी चुनावी खर्च उठाना पड़ेगा। बार-बार चुनाव होने से इजरायल के करदाताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ना तय है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह राजनीतिक संकट इसलिए पैदा हुआ क्योंकि संसदीय चुनावों में मतदान के बाद किसी भी प्रमुख गठबंधन को नेसेट में सरकार बनाने के लिए आवश्यक स्पष्ट बहुमत नहीं मिल सका। मुख्य पार्टियों के बीच तीखे वैचारिक मतभेदों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने सत्ता के समीकरणों को बेहद पेचीदा बना दिया है।\n\n• वोटों का कड़ा विभाजन: नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ा दल तो बन गई, लेकिन उनके पारंपरिक सहयोगी दल पर्याप्त संख्या जुटाने में पूरी तरह नाकाम रहे। इसके चलते दक्षिणपंथी खेमा बहुमत के जादुई आंकड़े से पीछे छूट गया।\n• विपक्षी गुट का विखंडन: गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी मोर्चे के पास अपने दम पर केवल 48 सीटें हैं, जो सरकार बनाने के लिए काफी कम हैं। उन्हें सरकार के लिए हर हाल में अरब दलों की मदद की जरूरत है।\n• गठबंधन पर वैचारिक अड़चनें: दक्षिणपंथी और अरब दलों के बीच गहरे वैचारिक अंतर्विरोधों के कारण साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमति बनाना बेहद कठिन साबित हो रहा है। इसके साथ ही राष्ट्रीय एकता सरकार के लिए नेताओं को अपने वादों से पीछे हटना पड़ेगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इजरायल चुनाव में कौन सा दल सबसे बड़ा बनकर उभरा है?\nप्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी नेसेट में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन वह अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई।\n\n2. गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट के पास कितनी सीटें हैं?\nगादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गुट के पास नेसेट में 48 सीटें मौजूद हैं।\n\n3. अरब दलों के जुड़ने से विपक्षी गठबंधन की सीटें कितनी हो सकती हैं?\nराआम की 8 और जॉइंट लिस्ट की 11 सीटें मिलने से आइसेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन की कुल संख्या 67 सीटों तक पहुंच सकती है।\n\n4. अकॉर्ड सेंटर के सर्वे में कितने लोगों ने राआम को सरकार में शामिल करने का समर्थन किया?\nसर्वेक्षण के अनुसार मुख्य विपक्षी दलों के 61 प्रतिशत समर्थकों ने राआम पार्टी को संभावित गठबंधन में शामिल करने का समर्थन किया।\n\n5. अल्पमत सरकार के विश्वास मत के लिए आइसेनकोट को कितने अरब सांसदों की जरूरत होगी?\nशुरुआती विश्वास मत हासिल करने के लिए गादी आइसेनकोट को अरब दलों के कम से कम छह सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।\n\n6. यदि राजनीतिक गतिरोध नहीं सुलझा तो क्या होगा?\nयदि सरकार गठन के सभी विकल्प विफल हो जाते हैं, तो देश में नए सिरे से आम चुनाव कराए जा सकते हैं।",
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  "publishedAt": "2026-10-30",
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