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  "title": "संयुक्त राष्ट्र में भारत की दो टूक, वीटो पावर कोई सियासी हथियार नहीं बल्कि बहुत बड़ी जिम्मेदारी",
  "summary": "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग रखते हुए भारत ने कहा है कि वीटो पावर का इस्तेमाल संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। भारत ने इसके दुरुपयोग और स्थायी सदस्यों के रवैये पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।",
  "content": "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव को लेकर भारत ने अपनी सख्त और दो टूक स्थिति एक बार फिर दुनिया के सामने रखी है। भारतीय पक्ष की तरफ से यह बात जोर देकर कही गई है कि वीटो पावर किसी भी देश के लिए अपने छोटे राजनीतिक फायदों को हासिल करने का साधन नहीं बनना चाहिए। इस विशेषाधिकार को एक भारी जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए और इसका प्रयोग भी उसी गंभीरता के साथ होना अनिवार्य है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने सुरक्षा परिषद के भीतर वीटो के इस्तेमाल के तरीकों और लंबे समय से रुकी पड़ी सुधार प्रक्रिया पर गहरी नाराजगी ظاہر की। भारत का मानना है कि इस वैश्विक संस्था में केवल सतही या छोटे बदलाव करने से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ने वाला है। इस पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए सभी अहम बिंदुओं पर समग्र रूप से और एक साथ विचार करने की सख्त जरूरत है।\n\nवीटो के इस्तेमाल और धमकियों पर उठे सवाल\nभारतीय प्रतिनिधिमंडल ने वीटो के बार-बार होने वाले प्रयोग के साथ-साथ इसके इस्तेमाल की मिलने वाली धमकियों पर भी तीखे सवाल उठाए। आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों जिन्हें पी5 के नाम से जाना जाता है, उनमें से दो देशों ने पिछले साढ़े तीन दशकों से भी अधिक वक्त से इस अधिकार का उपयोग नहीं किया है। इसके विपरीत, वीटो के इस्तेमाल या फिर इसके नाम पर डराने की कोशिशें मुख्य रूप से तीन देशों की तरफ से ही देखने को मिली हैं। भारत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि साल 2022 में शुरू की गई वीटो पहल से वैश्विक समुदाय को एक नई उम्मीद बंधी थी। हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 76/262 के आने के बाद भी जिस बड़े पैमाने पर वीटो का दुरुपयोग जारी है, वह उन उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत नतीजे दिखाता है।\n\nटुकड़ों में सुधार से नहीं सुधरेगी व्यवस्था\nभारत की तरफ से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि सुरक्षा परिषद के सुधार कार्यों को किसी एक या दो मुद्दों तक सीमित करके नहीं रखा जा सकता है। बदलाव के दायरे में आने वाले सभी पांच प्रमुख बिंदुओं पर एक साथ और विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। भारत का यह मानना है कि यदि इस प्रक्रिया में टुकड़ों में बदलाव किए गए, तो इससे परिषद की मौजूदा बुनियादी कमियों को दूर करना असंभव हो जाएगा। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के इस अहम अंग को ज्यादा ताकतवर और दुनिया भर के प्रतिनिधित्व के लिहाज से बेहतर बनाना होना चाहिए। इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए तमाम सदस्य देशों के बीच एक गंभीर संवाद और व्यापक सहमति का होना बेहद जरूरी है।\n\nजवाबदेही और वीटो पहल की सीमाएं\nसाल 2022 में लाई गई वीटो पहल का जिक्र करते हुए भारत ने यह स्वीकार किया कि इसे वैश्विक मंच पर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 76/262 के तहत यह प्रावधान किया गया था कि जब भी वीटो का इस्तेमाल होगा, तो महासभा में उस पर खुली चर्चा की जाएगी। इसके बावजूद, भारत के नजरिए से देखें तो इस व्यवस्था के लागू होने के बाद भी वीटो का बेरोकटोक इस्तेमाल होना चिंता का विषय बना हुआ है। इससे यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या वर्तमान में मौजूद यह व्यवस्था वीटो के गलत इस्तेमाल पर किसी प्रकार का प्रभावी नियंत्रण या जवाबदेही तय करने में वास्तव में कामयाब हो पा रही है या नहीं।\n\nआम सहमति की आड़ में छिपा हुआ वीटो\nभारत ने सुरक्षा परिषद के साथ-साथ प्रतिबंध समितियों के कामकाज के उन तौर-तरीकों पर भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है, जहां अलिखित आम सहमति के नियमों के जरिए वीटो जैसी स्थिति पैदा कर दी जाती है। भारतीय पक्ष ने यह बात उठाई कि अंतर-सरकारी वार्ताओं यानी आईजीएन के दौरान आम सहमति की शर्त को किसी भी सूरत में एक छिपे हुए वीटो के रूप में काम करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर किसी औपचारिक वीटो के बिना भी फैसलों को बीच में ही अटकाने की स्थिति बन रही है, तो उस पर बहुत गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है।\n\nअफ्रीकी देशों के अधिकारों का पुरजोर समर्थन\nअपने संबोधन के दौरान भारत ने कॉमन अफ्रीकन पोजीशन की मांग का पूरी ताकत से समर्थन किया है। भारत का यह स्पष्ट मत है कि जब तक यह वीटो अधिकार इस व्यवस्था में मौजूद है, तब तक परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को एक समान अधिकार मिलने चाहिए। यह रुख सीधे तौर पर सुरक्षा परिषद के भीतर समानता और सही प्रतिनिधित्व के बुनियादी सवाल को सबके सामने लाता है। भारत की यह मांग है कि सुधारों की इस पूरी प्रक्रिया के दौरान इन अहम मुद्दों को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज न किया जाए। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हुई हैं कि अंतर-सरकारी चर्चाओं के दौरान विभिन्न देश वीटो अधिकार और सुरक्षा परिषद के व्यापक सुधार के मामले में किस हद तक एक आम सहमति बना पाते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nसंयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग और वीटो पावर पर भारत के इस कड़े रुख का असर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक समझौतों पर पड़ सकता है।\n\n• भारत पर असर: वैश्विक मंच पर भारत की यह कूटनीतिक स्थिति देश के स्थायी सदस्यता के दावे को मजबूत करती है। इससे कूटनीतिक दबाव बढ़ाने और बहुपक्षीय मंचों पर भारत की आवाज को अधिक वजन मिलने की संभावना है।\n• वैश्विक कूटनीति: दुनिया भर के देशों के बीच संयुक्त राष्ट्र सुधारों पर बहस तेज हो सकती है। इससे भविष्य में वीटो के इस्तेमाल और उसकी पारदर्शिता को लेकर नए वैश्विक नियम बन सकते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसंयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और वीटो पावर के नियम दशकों से वैश्विक कूटनीति का एक विवादित मुद्दा रहे हैं। यह स्थिति पुरानी व्यवस्था और वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच असंतुलन के कारण पैदा हुई है।\n\n• पुराना ढांचा: सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तय की गई थी, जो आज की दुनिया की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती।\n• वीटो का दुरुपयोग: कुछ स्थायी सदस्यों द्वारा अपने कूटनीतिक हितों की रक्षा के लिए वीटो का लगातार इस्तेमाल किया जाना वैश्विक मंच पर गतिरोध पैदा करता है।\n• सुधारों में देरी: सदस्य देशों के बीच आम सहमति न बन पाने और संकीर्ण हितों के कारण लंबे समय से अटकी सुधार प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि कौन हैं?\nसंयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश हैं।\n\n2. भारत ने वीटो अधिकार के बारे में क्या कहा है?\nभारत ने कहा है कि वीटो अधिकार संकीर्ण राजनीतिक हितों को साधने का औजार नहीं होना चाहिए, बल्कि यह एक बड़ी जिम्मेदारी है।\n\n3. किन देशों ने साढ़े तीन दशकों से वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है?\nसुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से दो देशों ने पिछले साढ़े तीन दशकों से अधिक समय से वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है।\n\n4. वीटो पहल किस वर्ष शुरू की गई थी?\nवीटो पहल की शुरुआत वर्ष 2022 में की गई थी।\n\n5. भारत ने किस अफ्रीकी मांग का समर्थन किया है?\nभारत ने कॉमन अफ्रीकन पोजीशन का समर्थन किया है और कहा है कि सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार मिलने चाहिए।",
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  "category": "दुनिया",
  "publishedAt": "2026-10-27",
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