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  "title": "संयुक्त राष्ट्र के जिनेवा मुख्यालय में भारत ने भेजे पांच नए मोर, जानिए चार दशकों पुरानी इस अनूठी कूटनीतिक परंपरा की पूरी कहानी",
  "summary": "भारत ने संयुक्त राष्ट्र के जिनेवा स्थित मुख्यालय को पांच मोर सौंपे हैं, जिसके तहत चार नीले और एक दुर्लभ सफेद मोर पैलेस ऑफ नेशंस परिसर में छोड़े गए हैं। इस कदम के साथ 1981 की ऐतिहासिक परंपरा फिर से जीवंत हो उठी है।",
  "content": "संयुक्त राष्ट्र के जिनेवा स्थित कार्यालय परिसर में एक बार फिर भारत के राष्ट्रीय पक्षी की रौनक लौटने जा रही है। भारत सरकार की ओर से जिनेवा में पांच नए मोर भेजे गए हैं, जिनमें चार सामान्य नीले रंग के और एक विशेष रूप से दुर्लभ सफेद मोर शामिल है। इन सभी पक्षियों को ऐतिहासिक पैलेस ऑफ नेशंस के विशाल परिसर में खुले में छोड़ा जाना है। इस अनूठी पहल के पीछे केवल वन्यजीवों का संरक्षण या परिसर की सुंदरता बढ़ाना ही मुख्य कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे लगभग दो सौ साल पुरानी एक ऐतिहासिक शर्त और करीब पैंतालीस साल पुरानी कूटनीतिक विरासत जुड़ी हुई है।\n\nसंयुक्त राष्ट्र कार्यालय में बची थी सिर्फ एक मोर की संख्या\nपैलेस ऑफ नेशंस के इस खूबसूरत परिसर में एक ऐसा दौर भी था जब बड़ी संख्या में मोर स्वतंत्र रूप से घूमा करते थे। हालांकि, समय बीतने के साथ इन पक्षियों की तादाद लगातार कम होती चली गई। स्थिति यहां तक आ गई कि इस बड़े इलाके में केवल एक ही मोर जीवित बचा था। मोरों की आबादी के इस तरह सिमट जाने से न केवल स्थानीय पक्षियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा था, बल्कि उस ऐतिहासिक समझौते पर भी खतरा पैदा हो गया था जिसके तहत इस परिसर में मोरों का खुले में रहना अनिवार्य शर्त माना गया है।\n\nक्या है मोरों की मौजूदगी से जुड़ी 19वीं सदी की शर्त\nइस पूरी कहानी की जड़ें उन्नीसवीं सदी में जाकर मिलती हैं। पैलेस ऑफ नेशंस का वह परिसर जहां आज संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख यूरोपीय कार्यालय संचालित होता है, उसका एक हिस्सा अरियाना पार्क के रूप में जाना जाता है। इस पार्क की जमीन मूल रूप से एक खास ऐतिहासिक समझौते के तहत सौंपी गई थी। इस शर्त के मुताबिक इस पूरे इलाके में मोरों का स्वतंत्र रूप से विचरण करना जरूरी है। यानी इन पक्षियों का होना किसी को सजाने या दिखाने भर के लिए नहीं है, बल्कि उस संपत्ति की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का एक अहम हिस्सा है। भले ही समय के साथ यह परिसर वैश्विक कूटनीति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बन गया, लेकिन मोरों से जुड़ी यह पुरानी परंपरा इसके साथ लगातार बनी रही।\n\nवर्ष 1981 में इंदिरा गांधी ने भेजा था मोरों का जोड़ा\nभारत और जिनेवा के बीच मोरों के आदान-प्रदान का यह सिलसिला आज से लगभग पैंतालीस साल पहले भी काफी चर्चा में रहा था। वर्ष 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिल्ली के चिड़ियाघर से मोरों के एक प्रजनन जोड़े को विशेष रूप से जिनेवा रवाना किया था। उस जोड़े ने पैलेस ऑफ नेशंस के प्रांगण को अपना नया ठिकाना बनाया और आने वाले वर्षों में उनकी संतानों ने वहां मोरों की आबादी को कायम रखा। यही वजह है कि उस समय के बाद भारत को लंबे समय तक दोबारा मोर भेजने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। अब वर्ष 2026 में जाकर भारत ने एक बार फिर इस पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया है।\n\nक्यों नहीं पड़ी चार दशकों तक नए पक्षी भेजने की जरूरत\nभारत और संयुक्त राष्ट्र के बीच मोरों के इस ताजे हस्तांतरण से पहले के पैंतालीस वर्षों का यह लंबा अंतराल पहली नजर में थोड़ा हैरान करने वाला लग सकता है। हालांकि, इसके पीछे किसी प्रकार का राजनीतिक मतभेद या कूटनीतिक दूरी नहीं थी। वर्ष 1981 में भेजे गए मूल जोड़े और उनकी अगली पीढ़ियों ने कई दशकों तक परिसर की पारिस्थितिकी को संभाले रखा। सामान्य तौर पर मोर प्राकृतिक परिवेश में पंद्रह से बीतीस साल तक जीवित रह सकते हैं और विशेष सुरक्षा मिलने पर उनकी उम्र कुछ अधिक भी हो सकती है। वक्त गुजरने के साथ उन पुराने मोरों की आयु बढ़ती गई और प्राकृतिक कारणों से उनकी संख्या घटती गई। अंततः जब परिसर में सिर्फ एक मोर शेष बचा, तब भारत ने एक बार फिर अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए कदम बढ़ाया।\n\nरंगों का अनूठा मेल और कूटनीतिक संदेश\nइस बार भारत की तरफ से कुल पांच मोर भेजे गए हैं, जिनमें चार नीले और एक दुर्लभ सफेद मोर है। इन मोरों का यह रंग संयोजन संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक रंगों के साथ पूरी तरह मेल खाता है। इस प्रकार भारत का राष्ट्रीय पक्षी एक तरफ जहां देश की समृद्ध प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करता है, वहीं दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र की पहचान के साथ भी एक सुंदर दृश्य संबंध स्थापित करता है। भारतीय संस्कृति में मोर का स्थान हमेशा से बेहद खास रहा है और वैज्ञानिक भाषा में इसे पावो क्रिस्टाटस कहा जाता है।\n\nऔपचारिक हस्तांतरण और आपसी सहयोग\nइन पांचों मोरों को सौंपने के इस पूरे कार्यक्रम को भले ही एक साधारण वन्यजीव संरक्षण गतिविधि के रूप में देखा जा सके, लेकिन इसके गहरे कूटनीतिक मायने भी हैं। भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में जिनेवा स्थित स्थायी प्रतिनिधि राजदूत अरिंदम बागची ने इन पक्षियों को संयुक्त राष्ट्र जिनेवा की महानिदेशक तातियाना वालोवाया को आधिकारिक रूप से सौंपा। इस मौके ने भारत और वैश्विक संगठन के बीच बरसों से चले आ रहे मजबूत सहयोग और साझीदारी के रिश्ते को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया। इस तरह भारत ने जिनेवा को केवल पांच पक्षी ही नहीं दिए हैं, बल्कि उस ऐतिहासिक सिलसिले को भी नया जीवन दिया है जिसकी शुरुआत इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुई थी.\n\nइसका आप पर असर\nयह समाचार विशुद्ध रूप से कूटनीतिक और ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ा है, इसलिए इसका आम नागरिकों के दैनिक जीवन, वित्त, कर या कीमतों पर कोई सीधा व्यावहारिक प्रभाव नहीं पड़ता है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भारत ने संयुक्त राष्ट्र के जिनेवा मुख्यालय में कितने मोर भेजे हैं?\nभारत ने जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय को कुल पांच मोर सौंपे हैं।\n\n2. इन मोरों में कौन-कौन से रंग शामिल हैं?\nइन पांच मोरों में चार सामान्य नीले मोर और एक दुर्लभ सफेद मोर शामिल है।\n\n3. संयुक्त राष्ट्र परिसर में मोरों को रखना क्यों जरूरी माना जाता है?\n19वीं सदी की एक ऐतिहासिक शर्त के अनुसार अरियाना पार्क की जमीन पर मोरों का स्वतंत्र रूप से घूमना अनिवार्य है।\n\n4. इससे पहले भारत ने किस वर्ष जिनेवा में मोर भेजे थे?\nतत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1981 में जिनेवा के लिए मोरों का एक जोड़ा भेजा था।\n\n5. वर्तमान में भारत की ओर से मोरों को किसने सौंपा?\nजिनेवा में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत अरिंदम बागची ने ये मोर सौंपे।\n\n6. इन मोरों को किसे सौंपा गया है?\nइन्हें संयुक्त राष्ट्र जिनेवा की महानिदेशक तातियाना वालोवाया को सौंपा गया है।",
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  "category": "दुनिया",
  "publishedAt": "2026-08-09",
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