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  "title": "जब दुनिया ने भारत से मुंह मोड़ा, तब फ्रांस बना ढाल: 1998 की वो कहानी जिसने रची भारत-फ्रांस दोस्ती की बुनियाद",
  "summary": "1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका, जापान और कनाडा जैसे देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगाए, मगर फ्रांस अकेला ऐसा पश्चिमी देश था जो नई दिल्ली के साथ खड़ा रहा। यही भरोसा आगे चलकर भारत की पहली रणनीतिक साझेदारी की नींव बना।",
  "content": "भारत और फ्रांस के बीच आज जो गहरा रणनीतिक रिश्ता दिखाई देता है, उसकी जड़ें किसी एक रक्षा सौदे या शिखर बैठक में नहीं, बल्कि एक ऐसे कठिन दौर में छिपी हैं जब बाकी दुनिया भारत से दूरी बना रही थी। यह कहानी समझने के लिए पहले मौजूदा रिश्तों की गर्मजोशी पर नजर डालना जरूरी है।\n\nदौरों की झड़ी बताती है रिश्ते की गहराई\nप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 12 साल के कार्यकाल में 7वीं बार फ्रांस के दौरे पर हैं। उनसे पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल में चार बार पेरिस की यात्रा की थी। और उनसे भी पहले अटल बिहारी वाजपेयी बतौर प्रधानमंत्री अपने करीब छह साल के कार्यकाल में दो बार फ्रांस गए। दूसरी तरफ का हिसाब देखें तो वर्ष 2000 से अब तक नौ बार फ्रांसीसी राष्ट्रपति भारत का आधिकारिक दौरा कर चुके हैं, जिनमें मौजूदा राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अकेले 2018 से अब तक चार बार भारत आ चुके हैं।\n\nये आंकड़े यूं ही नहीं बने। इतने उच्च स्तरीय दौरों के पीछे दशकों की मेहनत और भरोसा है, जो धीरे-धीरे पककर इस मुकाम तक पहुंचा। और इस पूरे सफर में सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुई 1998 की एक घटना, जब अमेरिका, कनाडा और जापान समेत कई बड़े यूरोपीय देशों ने भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगा दिए, लेकिन फ्रांस एक सच्चे दोस्त की तरह सीना तानकर नई दिल्ली के साथ डटा रहा।\n\nपोखरण का वह धमाका जिसने दुनिया हिला दी\nमई 1998 का दौर था। राजस्थान के पोखरण का तपता रेगिस्तान। जमीन के नीचे कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरी दुनिया की भू-राजनीति को झकझोर दिया। भारत ने पांच परमाणु परीक्षण कर खुद को खुले तौर पर परमाणु शक्ति घोषित कर दिया। उस वक्त देश की कमान अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों में थी। नई दिल्ली के लिए यह राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वाभिमान का पल था, मगर वाशिंगटन, टोक्यो और कई पश्चिमी राजधानियों ने इसे सीधी चुनौती की तरह लिया।\n\nनतीजा कुछ ही दिनों में सामने आ गया। अमेरिका ने प्रतिबंधों की झड़ी लगा दी—आर्थिक मदद रोकने से लेकर तकनीकी सहयोग सीमित करने तक कई कदम उठाए गए। जापान, कनाडा और कुछ दूसरे देशों ने भी भारत से किनारा करना शुरू कर दिया। ऐसा लगने लगा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अकेला छूट जाएगा।\n\nयूरोप से उठी एक अलग आवाज\nठीक इसी मुश्किल घड़ी में यूरोप से एक ऐसी आवाज उभरी जिसने भारत को एहसास कराया कि हर पश्चिमी देश एक जैसी सोच नहीं रखता। वह आवाज फ्रांस की थी। पोखरण-2 के बाद ज्यादातर पश्चिमी देशों की दलील थी कि भारत को अपने फैसले की कीमत चुकानी चाहिए। भारत पर वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था को चुनौती देने के आरोप मढ़े जा रहे थे और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिशें हो रही थीं।\n\nतभी फ्रांस भारत के साथ आ खड़ा हुआ। तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति जैक्स शिराक ने साफ संकेत दिया कि भारत को अलग-थलग करना किसी समस्या का हल नहीं है। पेरिस का मानना था कि भारत की सुरक्षा चिंताओं को समझे बगैर सिर्फ प्रतिबंधों की भाषा बोलना व्यावहारिक नहीं होगा। फ्रांस ने यह भी भांप लिया कि दक्षिण एशिया की उलझी हुई सुरक्षा परिस्थितियों को यूरोप के चश्मे से नहीं पढ़ा जा सकता। यह वही दौर था जब भारत का एक पड़ोसी पाकिस्तान परमाणु क्षमता की चाहत रखता था और दूसरी ओर चीन पहले से ही परमाणु ताकत बन चुका था।\n\nबर्मिंघम की जी-8 बैठक और संकटमोचक\nपरमाणु परीक्षण के बाद ब्रिटेन के बर्मिंघम में जी-8 शिखर सम्मेलन हुआ, जहां भारत के खिलाफ कड़े सामूहिक रुख पर चर्चा हुई। अमेरिका और उसके कुछ सहयोगी नई दिल्ली पर दबाव और बढ़ाना चाहते थे। गौरतलब है कि आज का जी-7 ही उस वक्त जी-8 कहलाता था, क्योंकि तब इस समूह में रूस भी शामिल था; बाद में रूस के बाहर हो जाने पर इसका नाम बदलकर जी-7 कर दिया गया।\n\nकूटनीतिक गलियारों में संदेश साफ था—भारत को पूरी तरह खलनायक बना दिया जाए। लेकिन इसी मोड़ पर रूस और फ्रांस संकटमोचक बनकर उभरे। फ्रांस का मत था कि संवाद के दरवाजे खुले रहने चाहिए। यही वह क्षण था जब नई दिल्ली ने पहली बार महसूस किया कि पेरिस महज एक साझेदार नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में साथ खड़ा रहने वाला मित्र भी हो सकता है। यहीं से दोनों देशों के बीच भरोसे की वह बहाली शुरू हुई, जो आगे चलकर रणनीतिक साझेदारी में बदल गई।\n\nवाजपेयी की पेरिस यात्रा और पहली रणनीतिक साझेदारी\nपोखरण परीक्षणों के कुछ ही महीने बाद, सितंबर 1998 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी फ्रांस पहुंचे। यह यात्रा सिर्फ एक औपचारिक राजनयिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई। इसी दौरे में भारत और फ्रांस ने औपचारिक रूप से ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ की शुरुआत की। खास बात यह कि किसी पश्चिमी देश के साथ यह भारत की पहली रणनीतिक साझेदारी थी। आज जब भारत की रणनीतिक साझेदारियों की लंबी फेहरिस्त सामने आती है, तो यह याद रखना जरूरी है कि इसका पहला अध्याय फ्रांस के साथ लिखा गया था।\n\nभरोसे की उम्र लंबी होती गई\nराजनीति और कूटनीति में दोस्तियां अक्सर हालात के साथ बदल जाती हैं, लेकिन भारत-फ्रांस रिश्ते की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि 1998 में बना भरोसा आने वाले बरसों में लगातार और मजबूत होता गया। फ्रांस उन शुरुआती देशों में रहा जिसने भारत के साथ परमाणु मुद्दों पर उच्च स्तरीय संवाद शुरू किया। बाद में जब भारत को वैश्विक परमाणु व्यवस्था में स्वीकार्यता मिलने लगी, तो उसी विश्वास ने नई संभावनाओं के दरवाजे खोल दिए। 2008 में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) से छूट मिलने के बाद भारत के साथ असैन्य परमाणु समझौता करने वाला पहला देश भी फ्रांस ही बना। यह कोई इत्तेफाक नहीं था—इसकी बुनियाद तो एक दशक पहले उसी दौर में पड़ चुकी थी, जब भारत पर प्रतिबंधों का साया मंडरा रहा था।\n\nआज भी क्यों जिंदा है 1998 की यह याद?\nआज भारत और फ्रांस रक्षा, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, परमाणु ऊर्जा और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे तमाम क्षेत्रों में कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। राफेल लड़ाकू विमानों से लेकर हिंद महासागर में सहयोग तक, दोनों देशों के रिश्ते लगातार गहरे होते गए हैं। लेकिन इन संबंधों की असली ताकत किसी रक्षा सौदे या साझा बयान में नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक स्मृति में बसी है—जब भारत अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था और दुनिया का एक प्रभावशाली देश बिना डगमगाए उसके साथ खड़ा दिखाई दिया।",
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  "category": "दुनिया",
  "publishedAt": "2026-06-14",
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    "भारत-फ्रांस संबंध",
    "पोखरण परमाणु परीक्षण 1998",
    "रणनीतिक साझेदारी",
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    "अमेरिकी प्रतिबंध",
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    "अटल बिहारी वाजपेयी"
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