जापान की 1600 किमी मिसाइल टेस्टिंग और टॉमहॉक सौदे से बदला हिंद-प्रशांत का रक्षा संतुलन बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच जापान ने लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों का सफल परीक्षण किया है, जिससे देश की दशकों पुरानी रक्षात्मक सैन्य नीति में जवाबी हमले की क्षमता जोड़ने का बड़ा बदलाव संकेतित हो रहा है। पश्चिम एशिया से लेकर पूर्वी एशिया तक गहराते सुरक्षा संकटों और संप्रभु देशों पर बढ़ते हमलों ने दुनिया भर के रक्षा तंत्रों को सतर्क कर दिया है। दशकों तक सख्त रक्षात्मक रक्षा नीति पर चलने वाले देश भी अब अपनी पारंपरिक सैन्य सीमाओं से आगे बढ़कर आधुनिक हमलावर क्षमताओं को मजबूत करने में जुट गए हैं। इस वैश्विक रणनीतिक बदलाव में जापान सबसे अग्रणी भूमिका में दिखाई दे रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से शांतिपूर्ण अप्रोच अपनाने वाला जापान अब अपनी नीतियों में ऐतिहासिक मोड़ ले रहा है। हाल ही में जापानी रक्षा बलों ने लंबी दूरी तक सटीक निशाना साधने वाली दो अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियों के सफल परीक्षण संपन्न किए हैं। इनमें से एक मिसाइल की मारक क्षमता 1,600 किलोमीटर तक बताई जा रही है, जो पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है। यह घटनाक्रम बीजिंग की क्षेत्रीय आक्रामकता पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिससे भारत जैसी मित्र शक्तियों के रणनीतिक हितों को भी मजबूती मिलने की संभावना है। प्रशांत महासागर में टॉमहॉक का ऐतिहासिक परीक्षण जुलाई के अंतिम सप्ताह में जापान के रक्षा मंत्रालय ने अपनी नई रक्षा रणनीति के तहत दो अत्यंत महत्वपूर्ण मिसाइल परीक्षणों को अंजाम दिया। पहला परीक्षण जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स (JMSDF) ने अमेरिकी नौसेना के साथ मिलकर प्रशांत महासागर के खुले जलक्षेत्र में पूरा किया। इस सैन्याभ्यास के दौरान कोंगो क्लास के गाइडेड मिसाइल एजिस डिस्ट्रॉयर जेएस चोकाई से अमेरिकी निर्मित टॉमहॉक लैंड-अटैक क्रूज मिसाइल का सफल प्रक्षेपण किया गया। इस ऐतिहासिक परीक्षण के साथ ही जापान दुनिया का ऐसा तीसरा विदेशी राष्ट्र बन गया है जिसने सतह पर तैरते युद्धपोत से टॉमहॉक मिसाइल दागने की परिचालन क्षमता हासिल की है। यह परीक्षण केवल एक तकनीकी सफलता नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि जापानी नौसेना अब दूरस्थ दुश्मन ठिकानों पर सीधे हमले करने के लिए तैयार हो रही है। गिफू एयर बेस पर स्वदेशी टाइप-12 मिसाइल का वायु परीक्षण जापान का दूसरा महत्वपूर्ण परीक्षण गिफू एयर बेस पर आयोजित किया गया, जहां जापान एयर सेल्फ-डिफेंस फोर्स (JASDF) ने अपने F-2 लड़ाकू विमान का उपयोग करके अपग्रेडेड टाइप-12 एयर-लॉन्च मिसाइल का पहला फ्लाइट टेस्ट शुरू किया। यह स्वदेशी मिसाइल प्रणाली आधुनिक स्टेल्थ तकनीक से लैस है, जिससे दुश्मन के रडार इसकी पहचान आसानी से नहीं कर पाते। नेटवर्क-आधारित कमान प्रणाली पर काम करने वाली इस मिसाइल की वर्तमान मारक क्षमता 900 किलोमीटर से अधिक आंकी गई है। हालांकि, जापानी इंजीनियर इसके ऐसे उन्नत वेरिएंट पर काम कर रहे हैं जिसकी रेंज भविष्य में 1,600 किलोमीटर तक बढ़ जाएगी। यह मिसाइल प्रणाली जापानी वायुसेना को दुश्मन की हवाई रक्षा सीमा के बाहर रहकर दूरस्थ लक्ष्यों को सटीकता से नष्ट करने की क्षमता प्रदान करती है। अस्थायी टॉमहॉक खरीद और 2027 का स्वदेशी रोडमैप अपनी जवाबी हमले की क्षमता में आए अंतर को तुरंत भरने के लिए जापान सरकार अमेरिका से 400 टॉमहॉक मिसाइलों की खरीद कर रही है। इन अमेरिकी मिसाइलों को एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में सशस्त्र बलों में शामिल किया जा रहा है। इसके साथ ही, जापान का लक्ष्य वित्त वर्ष FY 2027 तक अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की स्टैंडऑफ मिसाइलों को पूरी तरह से सेना में सेवा में शामिल करने का है। यद्यपि आधिकारिक स्तर पर टोक्यो अभी भी यही रुख अपनाए हुए है कि उसकी बुनियादी रक्षा नीति केवल आत्मरक्षा तक सीमित है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इन नई लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों का समावेश यह स्पष्ट संकेत देता है कि जापान अब केवल हमलों को रोकने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर विरोधी के सैन्य अड्डों पर सीधा जवाबी प्रहार करने की रणनीति पर अमल कर रहा है। चीन की चिंताएं और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन जापान की इस नई सैन्य दिशा का सबसे सीधा और गहरा असर चीन के साथ उसके रणनीतिक संबंधों पर पड़ रहा है। हाल के महीनों में जापानी रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी द्वारा देश में परमाणु हथियारों पर चर्चा की संभावना जताए जाने और प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची द्वारा ताइवान की सुरक्षा को जापान की संप्रभुता से जुड़ा अनिवार्य मुद्दा बताए जाने के बाद से बीजिंग की सामरिक चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। रणनीतिक विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि जापान अपनी काउंटर-स्ट्राइक क्षमताओं को पूर्ण रूप से स्थापित कर लेता है, तो चीन भी अपनी परमाणु और पारंपरिक सैन्य तैनाती में बदलाव करने के लिए मजबूर हो सकता है, जिससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सैन्य प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता का नया दौर शुरू होने की आशंका जताई जा रही है। इंटेलिजेंस निर्भरता और किल चेन की चुनौतियां लंबी दूरी की मिसाइलों को हासिल कर लेने के बावजूद जापान के सामने परिचालन से जुड़ी कई गंभीर तकनीकी सीमाएं बनी हुई हैं। जापानी सेना के पास वर्तमान में एक स्वतंत्र ‘किल चेन’ प्रणाली का अभाव है, जिसमें दुश्मन के लक्ष्य की पहचान, निरंतर निगरानी, हमले की कमान और हमले के बाद हुए नुकसान का सटीक आकलन (बैटल डैमेज असेसमेंट) शामिल होता है। इस पूरी जटिल प्रक्रिया के लिए जापान अभी भी अमेरिकी खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) नेटवर्क पर बहुत ज्यादा निर्भर है। यदि किसी गंभीर युद्ध संकट के दौरान वाशिंगटन और टोक्यो के बीच संचार या समन्वय में बाधा आती है, या फिर चीन जापानी और अमेरिकी कम्यूनिकेशन तथा मॉनिटरिंग सिस्टम को जाम करने में सफल हो जाता है, तो जापान की इन नई मिसाइलों की मारक प्रभावशीलता काफी हद तक सीमित हो सकती है। उत्पादन क्षमता में सुस्ती और कलपूर्जों की कमी मिसाइल प्रणालियों के विकास के अलावा जापान के सामने दूसरा बड़ा संकट हथियारों के बड़े पैमाने पर विनिर्माण और उनके दीर्घकालिक भंडारण का है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, जापान का घरेलू रक्षा उद्योग सीमित विनिर्माण क्षमता से जूझ रहा है और उसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक्स तथा संवेदनशील कलपूर्जों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका में भी टॉमहॉक मिसाइलों के उत्पादन की गति में तेजी लाना एक कठिन चुनौती बना हुआ है। वैश्विक संघर्षों के कारण अमेरिकी हथियारों की मांग अत्यधिक बढ़ गई है, जिससे टॉमहॉक मिसाइलों की नई खेप की आपूर्ति में 47 महीने तक का लंबा समय लग सकता है। इसके अतिरिक्त, जापान ने हाल के वर्षों में F-35 स्टेल्थ फाइटर, modernised F-15 जेट और एजिस वॉरशिप जैसे अत्यधिक महंगे सैन्य प्लेटफॉर्म खरीदने में भारी बजट खर्च किया है, जिसके कारण उसके पास मिसाइलों और इंटरसेप्टर का पर्याप्त भंडार बनाए रखना एक बड़ी वित्तीय व परिचालन चुनौती साबित हो रहा है। संविधान का अनुच्छेद 9 और भारत के लिए सामरिक अवसर जापान की यह सैन्य यात्रा उसके युद्ध-विरोधी संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत बने पारंपरिक नियमों पर भी बहस छिड़ रही है, जो जापान को युद्ध का अधिकार देने से रोकता है। हालांकि, बदलते वैश्विक परिदृश्य में जापान द्वारा अपनी सैन्य शक्ति को पुनर्गठित करने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत रक्षात्मक संतुलन स्थापित हो रहा है। बीजिंग की एकतरफा विस्तारवादी नीति पर यह मिसाइल क्षमताएं एक मजबूत अंकुश का काम करेंगी। रणनीतिक रूप से यह स्थिति भारत के लिए बेहद अनुकूल मानी जा रही है, क्योंकि नई दिल्ली और टोक्यो के बीच ऐतिहासिक रूप से घनिष्ठ द्विपक्षीय और सुरक्षा संबंध रहे हैं। हिंद-प्रशांत में जापान की मजबूत उपस्थिति से क्षेत्रीय शक्ति का पलड़ा संतुलित रहेगा, जो भारत की समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक हितों दोनों के दृष्टिकोण से एक सकारात्मक विकास है। इसका आप पर असर भारत में: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जापान की बढ़ती मिसाइल क्षमता से चीन पर दबाव बढ़ेगा, जिससे भारतीय सीमाओं और समुद्री मार्गों पर रणनीतिक संतुलन मजबूत होगा। वैश्विक स्तर पर: रक्षा सौदों और मिसाइल प्रणालियों में हो रही बढ़ोतरी से एशियाई रक्षा बाजार और भू-राजनीतिक सुरक्षा परिदृश्य में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। सवाल-जवाब 1. जापान ने हाल ही में किन मिसाइलों का परीक्षण किया है? जापान ने अमेरिकी टॉमहॉक क्रूज मिसाइल (जेएस चोकाई युद्धपोत से) और स्वदेशी अपग्रेडेड टाइप-12 एयर-लॉन्च मिसाइल (F-2 लड़ाकू विमान से) का सफलता पूर्वक परीक्षण किया है। 2. जापान अमेरिका से कितनी टॉमहॉक मिसाइलें खरीद रहा है? जापान अपनी अंतरिम रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अमेरिका से 400 टॉमहॉक मिसाइलें खरीद रहा है। 3. अपग्रेडेड टाइप-12 मिसाइल की मारक क्षमता कितनी है? इस मिसाइल की वर्तमान मारक क्षमता 900 किलोमीटर से अधिक है, जबकि इसके भावी वेरिएंट की रेंज 1,600 किलोमीटर तक बढ़ाने की योजना है। 4. जापान की नई मिसाइल रणनीति के सामने मुख्य चुनौती क्या है? मुख्य चुनौती स्वतंत्र 'किल चेन' की कमी, अमेरिकी ISR प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता और टॉमहॉक आपूर्ति में लगने वाला 47 महीने तक का समय है। 5. इस बदलाव का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? भारत और जापान के बीच मजबूत ऐतिहासिक संबंध हैं; जापान की बढ़ती सैन्य क्षमता से हिंद-प्रशांत में चीन की मनमानी पर रोक लगेगी जो भारत के लिए सामरिक दृष्टि से लाभदायक है। https://trendkia.com/world/japan-ki-1600-kimi-misaila-testinga-aura-tomahawk-saude-se-badala-hinda-prashanta-ka-raksha-sntulana-14685 TrendKia — Har trend, sabse pehle.