मोरक्को में मिली चार हजार साल पुरानी विशाल किलेबंदी, अनाज और मवेशियों की रक्षा के लिए बना था यह प्राचीन सुरक्षा घेरा पुरातत्वविदों को मोरक्को की ओउद बेहत नदी घाटी में करीब चार हजार साल पुराना अनोखा रक्षा ढांचा मिला है, जो मिट्टी, सिल्ट और पत्थरों से तैयार किया गया था। यह विशाल सुरक्षा घेरा किसी सैन्य छावनी के बजाय एक बड़े कृषि केंद्र और विशाल अनाज भंडारों की हिफाजत के लिए बनाया गया था। उत्तरी अफ्रीका के इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करने वाली एक असाधारण पुरातात्विक खोज सामने आई है। मोरक्को की ओउद बेहत नदी घाटी में शोधकर्ताओं को करीब 4,000 साल पुराना एक विशाल सुरक्षा ढांचा मिला है। आधुनिक समय में सीमाओं की हिफाजत के लिए भले ही अरबों रुपये खर्च करके मिसाइल ढाल, रडार और कंक्रीट के दुर्ग बनाए जाते हों, लेकिन कांस्य युग के इस समाज ने बिना किसी उन्नत मशीनरी या भारी वित्तीय बजट के पूरी बस्ती के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार कर लिया था। मिस्र में बहने वाली नील नदी की घाटी के बाहर पूरे उत्तरी अफ्रीकी भूभाग में यह अब तक खोजा गया सबसे प्राचीन किलेबंदी वाला सुरक्षा तंत्र है। ओउद बेहत घाटी में हुआ महत्वपूर्ण पुरातात्विक उत्खनन यह ऐतिहासिक स्थल मोरक्को की मौजूदा राजधानी रबात से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ओउद बेहत नदी घाटी में खोजा गया है। इस खोज को इटली, मोरक्को और इंग्लैंड के शोधकर्ताओं की एक संयुक्त वैज्ञानिक टीम ने अंजाम दिया है। व्यापक स्तर पर की गई वैज्ञानिक खुदाई के दौरान इस इलाके में गहरी खाइयों, मिट्टी के विशाल टीलों और बेहद मजबूत प्राचीरों के प्रमाण मिले हैं। पुरातत्वविदों ने जब इन अवशेषों का बारीकी से अध्ययन किया, तो पाया कि यह पूरी व्यवस्था एक सुनियोजित रक्षा प्रणाली का हिस्सा थी, जिसने उस कालखंड की बस्ती को चारों तरफ से सुरक्षित कर रखा था। इस वैज्ञानिक अध्ययन के प्रमुख लेखक और इटली के पुरातत्वविद गियुलियो लुकारिनी ने इस खोज के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से रोशनी डाली है। उनके अनुसार, इस पूरे सुरक्षा तंत्र का सबसे प्रमुख घटक दक्षिणी छोर पर खड़ी की गई एक असाधारण रूप से मजबूत दीवार है। रेडियोकार्बन और पुरातात्विक विश्लेषणों के आधार पर वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि इस दीवार के निचले हिस्से का निर्माण आज से लगभग 3,500 से 4,000 वर्ष पहले किया गया था। इस खोज ने साबित कर दिया है कि प्राचीन काल में भी यह इलाका पूरी तरह आबाद और संगठित था। स्थानीय संसाधनों और साधारण सामग्री से तैयार हुई प्राचीर इस रक्षा दीवार की बनावट से जुड़ा सबसे दिलचस्प पहलू इसकी निर्माण सामग्री है। इस विशाल प्राचीर को खड़ा करने के लिए किसी दूरदराज के महंगे पत्थर या जटिल तकनीक पर निर्भर नहीं रहना पड़ा था। उस दौर के कारीगरों ने अपने आसपास की प्रकृति में मौजूद सबसे बुनियादी संसाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल किया। इसे तैयार करने के लिए मुख्य रूप से स्थानीय मिट्टी, राख, सिल्ट और सामान्य पत्थरों का एक मजबूत मिश्रण तैयार किया गया था। साधारण सामग्री होने के बावजूद इसकी तकनीकी समझ इतनी उत्कृष्ट थी कि यह ढांचा हजारों साल तक मौसम और समय की मार झेलता रहा। इस दीवार का ठोस ढांचा यह दर्शाता है कि प्राचीन शिल्पकारों को मिट्टी और गारे की पकड़, उसकी भार वहन क्षमता और स्थायित्व का गहरा व्यावहारिक ज्ञान था। बिना किसी भारी औद्योगिक तकनीक के ऐसा टिकाऊ ढांचा तैयार करना उस समय के लोगों के उच्च स्तरीय निर्माण कौशल का जीवंत प्रमाण है। सैन्य छावनी नहीं, विशाल कृषि केंद्र की सुरक्षा का था मकसद वैज्ञानिकों के सामने सबसे स्वाभाविक सवाल यह था कि चार हजार वर्ष पहले के लोगों को इतनी भारी मशक्कत करके, गहरी खाइयां खोदकर और ऊंची दीवारें बनाकर बस्ती को घेरने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह विशाल रक्षा तंत्र किसी पारंपरिक सैन्य ठिकाने या जंग के लिए बनी छावनी के रूप में काम नहीं कर रहा था। इसके विपरीत, यह एक बहुत बड़े और समृद्ध कृषि केंद्र की हिफाजत के लिए बनाया गया था। इस संरक्षित बस्ती के भीतरी हिस्से में खेती से जुड़े विभिन्न कार्यों, उगाई गई फसलों, पालतू मवेशियों और अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए व्यापक बंदोबस्त किए गए थे। बस्ती के भीतर फसलों और पशुधन को सुरक्षित रखना उस काल में समुदाय के अस्तित्व का सबसे बुनियादी आधार था। यही वजह थी कि खाद्य सुरक्षा को किसी भी संभावित खतरे से बचाने के लिए इतनी मजबूत किलेबंदी की गई थी। घंटी के आकार के विशाल गड्ढों में सुरक्षित रहता था अनाज उत्खनन कार्य के दौरान पुरातत्वविदों को बस्ती के अंदर दर्जनों ऐसे गहरे गड्ढे मिले हैं जिनका आकार घंटी जैसा है। विस्तृत वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद यह माना गया है कि इन विशिष्ट गड्ढों का निर्माण अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और भंडारित करने के उद्देश्य से किया गया था। जमीन के भीतर बने ये गड्ढे अनाज को नमी, कीड़ों और मौसम के बदलाव से बचाने के लिए उस दौर की उन्नत तकनीक माने जा सकते हैं। हैरानी की बात यह है कि इन भंडारण गड्ढों की कुल क्षमता अत्यधिक विशाल थी। यह क्षमता उस बस्ती में रहने वाले आम निवासियों की तात्कालिक जरूरतों की तुलना में कहीं अधिक थी। इससे यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि ओउद बेहत महज एक साधारण गांव नहीं था, बल्कि यह पूरे आसपास के क्षेत्र और एक विस्तृत क्षेत्रीय समुदाय के लिए एक केंद्रीय खाद्यान्न वितरण और संचयन केंद्र के तौर पर काम करता था। आक्रमणकारियों का डर या संसाधनों पर वर्चस्व की होड़ आम तौर पर इतिहास में विशाल प्राचीरों और खाइयों का निर्माण बाहरी लुटेरों या आक्रांताओं के हमलों से बचने के लिए देखा जाता है। हालांकि ओउद बेहत के मामले में शोधकर्ता परिस्थितियां थोड़ी भिन्न पाते हैं। गियुलियो लुकारिनी का कहना है कि वर्तमान में यह पूरी तरह तय नहीं किया जा सका है कि उस समय के निवासी वस्तुतः किस प्रतिद्वंद्वी या खतरे से अपनी रक्षा कर रहे थे। लुकारिनी का अनुमान है कि यह सुरक्षा तंत्र शायद किसी दूरगामी बाहरी आक्रमणकारी के डर से नहीं, बल्कि उपजाऊ जमीन और सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार जमाने के लिए स्थानीय समुदायों के बीच बढ़ती होड़ के कारण बनाया गया हो सकता है। इसके अलावा क्षेत्रीय व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण स्थापित करने और एक संगठित नेतृत्व द्वारा अपने प्रभाव क्षेत्र को सुरक्षित रखने की मंशा भी इस निर्माण के पीछे हो सकती है। परियोजना की योजना पर चर्चा करते हुए लुकारिनी ने बताया कि इस प्रकार के विशाल निर्माण कार्य बिना सोची-समझी योजना के अचानक अस्तित्व में नहीं आ सकते। इसके लिए बेहतरीन योजना, इलाके के भूगोल और जमीन की प्राकृतिक बनावट का सटीक चुनाव और लंबे समय तक भारी संख्या में श्रमिकों को एकजुट रखने व उनके बीच तालमेल बैठाने की जरूरत होती है। मग्रेब क्षेत्र के इतिहास का भरा खाली पन्ना यह पुरातात्विक खोज महज एक प्राचीन दीवार या अनाज के गड्ढों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तरी अफ्रीका के ऐतिहासिक आख्यान को पूरी तरह बदल देती है। इस विशाल क्षेत्र को अरबी भाषा में मग्रेब कहा जाता है, जिसमें मोरक्को के अलावा मॉरिटानिया, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया और लीबिया जैसे देश शामिल हैं। आधुनिक इतिहास और पुरातत्व में लंबे समय तक यह मान लिया गया था कि प्राचीन काल में मग्रेब क्षेत्र एक शांत और खाली पन्ने की तरह था जहां कोई बड़ी संगठित सभ्यता मौजूद नहीं थी। गियुलियो लुकारिनी ने स्पष्ट किया कि एक सदी से भी अधिक समय तक भूमध्यसागरीय इतिहास के अध्ययन में मग्रेब को एक शून्य या खाली स्थान के रूप में देखा जाता रहा। लेकिन हालिया वैज्ञानिक उत्खननों और साक्ष्यों ने सिद्ध कर दिया है कि यह पुरानी धारणा केवल वैज्ञानिक शोध और साक्ष्यों की कमी के कारण बनी हुई थी। नए प्रमाणों से साबित होता है कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों से जीवंत, संगठित और आर्थिक गतिविधियों से भरा हुआ था। प्राचीन डीएनए पर आधारित अध्ययनों से यह बात पहले ही सामने आ चुकी थी कि लगभग 8,500 साल पहले शिकारी और खाद्य संग्राहक समुदाय यूरोप से भूमध्य सागर पार करके मग्रेब पहुंचे थे। इसके अतिरिक्त, पिछले वर्ष इसी वैज्ञानिक दल ने ओउद बेहत से करीब 190 किलोमीटर उत्तर की दिशा में, जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के समीप मोरक्को की रिफ पहाड़ियों में स्थित कच कोच नामक एक प्रागैतिहासिक गांव के प्राचीन अवशेषों की भी खोज की थी। कांस्य युग में यूरोप और अफ्रीका के गहरे अंतर्संबंध जर्नल लिब्यन स्टडीज में 7 सितंबर को प्रकाशित इस नए शोध के नतीजे यह भी रेखांकित करते हैं कि उस प्राचीन कालखंड में उत्तरी अफ्रीका और यूरोपीय महाद्वीप के बीच गहरे और सक्रिय रिश्ते कायम थे। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य के उत्तर में स्थित इबेरिया प्रायद्वीप के प्रागैतिहासिक उत्खनन स्थलों पर पुरातत्वविदों को अफ्रीकी हाथीदांत और शुतुरमुर्ग के अंडों के छिलके मिले थे। ये वस्तुएं साफ तौर पर यह प्रमाणित करती थीं कि यूरोप के निवासियों का उत्तरी अफ्रीका के समाजों के साथ सीधा व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क था। अब ओउद बेहत में मिले इस प्राचीन कृषि केंद्र ने इस पारस्परिक रिश्ते के अफ्रीकी पहलू को ठोस साक्ष्यों के साथ दुनिया के सामने ला दिया है। इसके साथ ही दोनों क्षेत्रों की तत्कालीन सामाजिक संरचना में कुछ दिलचस्प भिन्नताएं भी देखने को मिलती हैं। उस युग में इबेरिया की पहाड़ियों पर कांस्य धातु के उपयोग और अमीर-गरीब के सामाजिक विभाजन को दर्शाने वाली भव्य कब्रों वाले बड़े किलेबंद शहर मौजूद थे, जो समाज में गहरी गैर-बराबरी का संकेत देते थे। इसके विपरीत, मोरक्को की ओउद बेहत घाटी में मिला सुरक्षा ढांचा आकार में उन इबेरियाई शहरों से अपेक्षाकृत छोटा था, लेकिन यह स्थानीय संसाधनों के साझा उपयोग और कृषि उपज के संगठित संरक्षण का एक बेजोड़ मॉडल पेश करता है। इसका आप पर असर यह पुरातात्विक खोज प्राचीन समाजों के खाद्य सुरक्षा प्रबंधन और स्थानीय संसाधनों के उपयोग की गहरी समझ प्रदान करती है। • इतिहास प्रेमियों और छात्रों के लिए: यह खोज अफ्रीकी महाद्वीप के इतिहास को देखने के पुराने नजरिए को पूरी तरह बदल देती है। छात्र और शोधकर्ता अब भूमध्यसागरीय कांस्य युग के अध्ययनों में मोरक्को और पूरे मग्रेब क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका को नए सिरे से समझ सकेंगे। • सभ्यताओं के विकास को समझने के लिए: यह साबित करता है कि प्राचीन काल में बड़ी किलेबंदियां केवल सेना या युद्ध के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक खाद्यान्न और आजीविका की रक्षा के लिए भी बनाई जाती थीं। आधुनिक समाज भी इससे सीख सकता है कि स्थानीय सामग्री का प्रभावी प्रबंधन कैसे संकट के समय स्थिरता दे सकता है। • वैश्विक पर्यटन और पुरातात्विक शोध के लिए: मोरक्को में इस तरह की खोजें उत्तरी अफ्रीका में पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक पर्यटन के नए रास्ते खोलती हैं। अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों की सक्रियता से भविष्य में इस क्षेत्र से जुड़ी कई और महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आने की संभावना है। • पर्यावरण और निर्माण तकनीकों के लिए: मिट्टी, सिल्ट, राख और पत्थरों जैसी प्राकृतिक सामग्री से 4,000 साल तक टिकने वाले ढांचे बनाना प्राचीन इंजीनियरिंग का बेजोड़ उदाहरण है। पर्यावरण अनुकूल निर्माण तकनीकों पर काम कर रहे आधुनिक विशेषज्ञों के लिए यह अध्ययन प्रेरणादायक हो सकता है। ऐसा क्यों हुआ यह प्राचीन सुरक्षा घेरा स्थानीय स्तर पर उपजाऊ जमीन और संसाधनों पर बढ़ते दबाव के चलते अस्तित्व में आया था। • कृषि और खाद्य भंडारण की सुरक्षा: इस बस्ती के भीतर विशाल मात्रा में अनाज और मवेशी मौजूद थे, जो पूरे इलाके के जीवन का आधार थे। इन बहुमूल्य संसाधनों को सुरक्षित रखने और संभावित लूटपाट से बचाने के लिए इतनी मजबूत प्राचीरें और खाइयां बनाई गई थीं। • संसाधनों और व्यापार मार्गों पर नियंत्रण की होड़: शोधकर्ताओं के अनुसार, यह निर्माण किसी बाहरी आक्रमणकारी के बजाय स्थानीय समुदायों के बीच उपजाऊ भूमि, जल स्रोतों और व्यापारिक रास्तों पर वर्चस्व की बढ़ती प्रतिस्पर्धा का नतीजा था। संगठित नेतृत्व ने अपने प्रभाव क्षेत्र और संचित संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए यह कदम उठाया। • संगठित श्रम और सामुदायिक नेतृत्व का विकास: इस तरह की विशाल दीवारें और खाइयां बिना सोची-समझी योजना और कुशल नेतृत्व के संभव नहीं थीं। उस समय के समाज में एक मजबूत सामाजिक ताना-बाना विकसित हो चुका था जो बड़ी संख्या में श्रमिकों को एकजुट कर ऐसे बड़े निर्माण कार्य करवा सकता था। सवाल-जवाब 1. मोरक्को में मिला यह प्राचीन रक्षा ढांचा कितना पुराना है? वैज्ञानिकों के अनुसार इस सुरक्षा तंत्र और इसकी मुख्य दीवार का निर्माण आज से लगभग 3,500 से 4,000 साल पहले कांस्य युग के दौरान हुआ था। 2. यह ऐतिहासिक खोज मोरक्को में किस जगह पर हुई है? यह खोज मोरक्को की राजधानी रबात से करीब 80 किलोमीटर दूर ओउद बेहत नदी घाटी में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम द्वारा की गई है। 3. इस सुरक्षा दीवार को बनाने में किन सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया था? इस विशाल प्राचीर को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध साधारण चीजों जैसे मिट्टी, राख, सिल्ट और सामान्य पत्थरों के मजबूत मिश्रण से तैयार किया गया था। 4. इस बस्ती को इतनी मजबूती से सुरक्षित करने का मुख्य उद्देश्य क्या था? यह ढांचा किसी सैन्य अड्डे के लिए नहीं, बल्कि एक बड़े कृषि केंद्र, मवेशियों और भारी मात्रा में जमा किए गए अनाज के भंडारों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। 5. खुदाई में मिले घंटी के आकार के गड्ढों की क्या खासियत है? ये गड्ढे अनाज को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए थे, और इनकी भंडारण क्षमता बस्ती के आम लोगों की जरूरत से कहीं ज्यादा थी, जो इसे एक क्षेत्रीय केंद्र साबित करती है। 6. पुरातत्वविदों के अनुसार उस समय इस बस्ती को किससे खतरा था? शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खतरा शायद बाहरी हमलावरों का नहीं, बल्कि उपजाऊ जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और व्यापारिक रास्तों पर कब्जे के लिए स्थानीय प्रतिस्पर्धा का था। 7. यह खोज उत्तरी अफ्रीका के इतिहास के लिए क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है? इस खोज ने उस पुरानी धारणा को गलत साबित कर दिया है जिसमें मग्रेब क्षेत्र को प्राचीन भूमध्यसागरीय इतिहास में एक खाली या असंगठित पन्ना मान लिया गया था। 8. इस शोध के नतीजे किस वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं? इस अध्ययन के विस्तृत नतीजे 7 सितंबर को प्रतिष्ठित शोध पत्रिका लिब्यन स्टडीज में प्रकाशित किए गए हैं। https://trendkia.com/world/morocco-men-mili-chara-hajara-sala-purani-vishala-kilebndi-anaja-aura-maveshiyon-ki-raksha-ke-lie-bana-tha-yaha-prachina-suraksha--40839 TrendKia — Har trend, sabse pehle.