{
  "type": "article",
  "title": "प्रशांत महासागर की गर्माहट से बढ़ेगा मौसमी संकट, साल के अंत में चरम पर पहुंचेगा एल नीनो",
  "summary": "विश्व मौसम संगठन ने प्रशांत महासागर में एल नीनो के मजबूत होने को लेकर आगाह किया है, जिसका चरम प्रभाव दिसंबर में दिखने का अनुमान है।",
  "content": "भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह पर तापमान में हो रही असामान्य बढ़ोतरी के कारण दुनिया भर में मौसमी असंतुलन गहराने का खतरा पैदा हो गया है। आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर कई इलाकों को गंभीर सूखे का सामना करना पड़ सकता है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में अप्रत्याशित रूप से मूसलाधार बारिश और बाढ़ की परिस्थितियां बन सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध विश्व मौसम संगठन ने इस संदर्भ में आगाह करते हुए स्पष्ट किया है कि वर्तमान मौसमी परिघटना का सबसे गंभीर और व्यापक प्रभाव अभी सामने आना बाकी है, जो इस वर्ष के अंतिम चरण में अपने उच्चतम स्तर को छू सकता है।\n\nदिसंबर में दिखेगा एल नीनो का सबसे उग्र रूप\nविश्व मौसम संगठन के अनुसार वर्तमान में जारी एल नीनो चक्र अभी समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि यह धीरे-धीरे और अधिक सक्रिय होता जा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों का आकलन है कि अक्टूबर से दिसंबर के दौरान यह मौसमी बदलाव अपने चरम पर पहुंच जाएगा। इस परिघटना के प्रभाव से पृथ्वी के व्यापक भूभागों में औसत तापमान सामान्य से कहीं अधिक दर्ज किया जा सकता है। वर्षा के पारंपरिक चक्र में बड़ा फेरबदल होने के कारण एक तरफ जहां जलाभाव और सूखे के हालात पैदा होंगे, वहीं दूसरी तरफ कुछ हिस्सों में अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसी आपदाएं सामने आ सकती हैं।\n\nएल नीनो मूल रूप से एक महासागरीय और वायुमंडलीय घटना है, जो प्रशांत महासागर के सतही जल के अत्यधिक गर्म होने पर सक्रिय होती है। विश्व मौसम संगठन की महासचिव सेलेस्टे साउलो के अनुसार, \n \"एल नीनो मजबूती से स्थापित हो चुका है और तेजी से मजबूत हो रहा है।\"\n उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुमानों के आधार पर फरवरी 2027 तक इस परिघटना के सक्रिय रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है। यदि यह गति बनी रहती है, तो यह 1950 के बाद से दर्ज की गई सबसे शक्तिशाली मौसमी घटनाओं में शामिल हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मौसमी दबाव 2027 के वसंत ऋतु तक खिंच सकता है, जिससे फरवरी के आसपास तक विषम मौसमी परिस्थितियां बनी रह सकती हैं।\n\nभारत के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर दिखा प्रतिकूल प्रभाव\nइस मौसमी उथल-पुथल की सीधी मार भारतीय उपमहाद्वीप पर भी साफ देखी गई है। देश में इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज करने के साथ समाप्त हुआ है। पर्याप्त मानसूनी वर्षा न होने के कारण महाराष्ट्र और कर्नाटक के व्यापक क्षेत्रों में आधिकारिक तौर पर सूखा घोषित करना पड़ा है। पानी की गंभीर किल्लत से निपटने और जल संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से महाराष्ट्र प्रशासन ने कई जिलों में जलापूर्ति में 10 प्रतिशत की कटौती भी लागू की है।\n\nयूरोप में नदियों का जलस्तर घटा और गर्मी के रिकॉर्ड टूटे\nमहासागरों के बढ़ते तापमान और मौसमी बदलावों का असर पश्चिमी देशों में भी बेहद स्पष्ट रूप से दिखाई दिया है। यूरोप में इस वर्ष ग्रीष्मकाल के दौरान अब तक की सबसे भीषण गर्मी दर्ज की गई, जिसने पूर्व के सभी कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए। फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में पारा सामान्य से कहीं ऊपर पहुंच गया। अत्यधिक ताप और कम वर्षा की वजह से डेन्यूब, राइन और टेम्स जैसी प्रमुख ऐतिहासिक नदियों का जलस्तर तेजी से गिर गया और कई स्थानों पर वे लगभग सूखने के कगार पर पहुंच गईं, जहां अब नाममात्र का पानी शेष बचा है।\n\nमहासागरीय तापमान में दर्ज हुआ तेज उछाल\nप्राकृतिक रूप से यह समुद्री-वायुमंडलीय प्रक्रिया प्रत्येक दो से सात वर्षों के अंतराल में दोहराई जाती है, जिसके मुख्य रूप से तीन चरण होते हैं। इनमें पहला गर्म चरण एल नीनो कहलाता है, दूसरा सामान्य चरण होता है, जबकि तीसरा ठंडा चरण ला नीना के नाम से जाना जाता है। हालिया महीनों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के तापमान में अप्रत्याशित तेजी देखी गई है। आंकड़ों के अनुसार अगस्त में नीनो 3.4 क्षेत्र में सतही जल का तापमान सामान्य औसत से 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया था। यह विसंगति सीधे तौर पर वर्षा के सामान्य वितरण को प्रभावित करती है, जिसके कारण दुनिया भर की सरकारों और आम नागरिकों को आगामी जटिल मौसम के लिए सतर्क रहने की आवश्यकता है।\n\nइसका आप पर असर\nप्रशांत महासागर में असामान्य तापमान वृद्धि से कृषि, पेयजल और दैनिक तापमान पर सीधा प्रतिकूल असर पड़ने वाला है।\n\n• भारत में: दक्षिण-पश्चिम मॉनसून में 13 प्रतिशत की कमी के चलते देश के कई हिस्सों में खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। आगामी महीनों में जलाशयों में कम पानी के कारण किसानों को रबी की बुवाई में सिंचाई संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।\n• महाराष्ट्र और कर्नाटक में: दोनों राज्यों के सूखाग्रस्त जिलों में पेयजल और कृषि के लिए पानी का गंभीर संकट गहराने वाला है। महाराष्ट्र के कई जिलों में 10 प्रतिशत पानी की कटौती लागू रहने से शहरी और ग्रामीण नागरिकों को जल संचयन के कड़े उपाय करने होंगे।\n• तापमान और गर्मी: वैश्विक स्तर पर सामान्य से अधिक गर्मी रहने के कारण आने वाले महीनों में असामान्य मौसमी परिस्थितियां देखने को मिलेंगी। लोगों को सर्दियों के मौसम में भी तापमान में उतार-चढ़ाव और संभावित सूखे के लिए तैयार रहना होगा।\n• खाद्य और जल सुरक्षा: नदियों और बांधों का जलस्तर गिरने से खाद्य उत्पादन लागत में वृद्धि हो सकती है। उपभोक्ताओं को आने वाले समय में आवश्यक कृषि उत्पादों की कीमतों में वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nभूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह के पानी का तापमान सामान्य से अत्यधिक गर्म होने के कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में बड़ा असंतुलन पैदा हुआ है। यह प्राकृतिक महासागरीय चक्र हर दो से सात साल में दोहराया जाता है, लेकिन इस बार तापमान में अभूतपूर्व उछाल देखा गया है।\n\n• प्रशांत महासागरीय जल का असामान्य रूप से गर्म होना: अगस्त महीने में महत्वपूर्ण नीनो 3.4 क्षेत्र का तापमान सामान्य औसत से 2.5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। इस तीव्र तापन ने सामान्य वायुमंडलीय परिसंचरण को बिगाड़कर एल नीनो को मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है।\n• प्राकृतिक चक्रीय मौसमी परिवर्तन: यह घटना एक नियमित महासागरीय-वायुमंडलीय प्रणाली का हिस्सा है जो सामान्य, गर्म (एल नीनो) और ठंडे (ला नीना) चरणों के बीच घूमती रहती है। यह प्राकृतिक बदलाव वैश्विक मानसूनी हवाओं और वर्षा चक्र को बाधित करने के लिए जाना जाता है।\n• दीर्घकालिक स्थिरता के अनुमान: मौसम विज्ञानियों के अनुसार वर्तमान परिस्थितियां इतनी सुदृढ़ हैं कि इनके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है। यह स्थिति इसे वर्ष 1950 के बाद के सबसे शक्तिशाली मौसमी दौरों में से एक बनाती है।\n• वैश्विक मौसम प्रणालियों का विचलन: समुद्र की सतह पर अत्यधिक गर्मी जमा होने से बादलों के निर्माण और हवा के रुख में बदलाव आया है। इसके परिणामस्वरूप भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर पड़ा और यूरोप में रिकॉर्डतोड़ ग्रीष्म लहर उत्पन्न हुई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. एल नीनो क्या है और यह कैसे बनता है?\nएल नीनो एक समुद्री और वायुमंडलीय परिघटना है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इससे दुनिया भर के मौसम और वर्षा चक्र पर व्यापक असर पड़ता है।\n\n2. विश्व मौसम संगठन ने एल नीनो के चरम को लेकर क्या चेतावनी दी है?\nविश्व मौसम संगठन के अनुसार यह परिघटना अक्टूबर से दिसंबर के दौरान अपने चरम पर पहुंचेगी और इसके प्रभाव से वैश्विक तापमान सामान्य से काफी ऊपर जा सकता है।\n\n3. वर्तमान एल नीनो कब तक जारी रहने की संभावना है?\nपूर्वानुमानों के मुताबिक फरवरी 2027 तक इसके सक्रिय रहने की संभावना लगभग 100 प्रतिशत है, और यह संकट 2027 के वसंत तक खिंच सकता है।\n\n4. भारत के मॉनसून पर इस साल क्या प्रभाव पड़ा है?\nभारत का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ है, जिसके कारण महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखा घोषित करना पड़ा है।\n\n5. महाराष्ट्र में जल संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठाया गया है?\nजल संतुलन बनाए रखने के लिए महाराष्ट्र प्रशासन ने कई जिलों में 10 प्रतिशत पानी की कटौती लागू की है।\n\n6. यूरोप में इस मौसमी बदलाव का क्या असर देखा गया?\nयूरोप में इतिहास की सबसे गर्म गर्मियां दर्ज की गईं, फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन में तापमान के रिकॉर्ड टूटे और डेन्यूब, राइन तथा टेम्स जैसी प्रमुख नदियां सूखने की कगार पर पहुंच गईं।",
  "url": "https://trendkia.com/world/pacific-ocean-ki-garmahata-se-barhega-mausami-snkata-sala-ke-anta-men-charama-para-pahunchega-el-nino-45308",
  "category": "दुनिया",
  "publishedAt": "2026-10-09",
  "tags": [
    "एल नीनो",
    "विश्व मौसम संगठन",
    "मौसम चेतावनी",
    "सूखा",
    "जलवायु संकट",
    "मॉनसून",
    "तापमान"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}