# प्रशांत में पनपते अल नीनो से एशिया में खाद्य संकट की घंटी, करोड़ों जिंदगियों पर मंडराया सूखा

> प्रशांत महासागर की असामान्य तपिश और अल नीनो के प्रचंड रूप से एशिया के कई मुल्कों में जलसंकट, सूखे और घटती पैदावार की गंभीर चुनौती पैदा हो गई है। वैश्विक एजेंसियों ने करोड़ों लोगों के भुखमरी की कगार पर पहुंचने का अंदेशा जताया है।

**Type:** article · **Category:** दुनिया · **Published:** 2026-09-19 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/world/prashanta-men-panapate-el-nino-se-eshiya-men-khadya-snkata-ki-ghnti-karoron-jindagiyon-para-mndaraya-sukha-33529 · **Language:** Hindi
**Tags:** अल नीनो, खाद्य संकट, सूखा, कृषि संकट, मौसम बदलाव, जलवायु परिवर्तन

प्रशांत महासागर की गहराइयों में जल के असामान्य रूप से तपने के कारण मौसम चक्र बुरी तरह लड़खड़ा चुका है, जिसके चलते समूचे एशियाई भूभाग पर व्यापक मौसमी विपदा का खतरा मंडराने लगा है। मौसम विज्ञान से जुड़े जानकारों का मानना है कि मौजूदा दौर का अल नीनो ऐतिहासिक रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकता है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर बढ़ते जलवायु असंतुलन ने इसकी उग्रता को अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मौसमी बदलाव के चलते करीब पांच करोड़ आबादी के भुखमरी के मुहाने पर धकेल दिए जाने की कड़ी चेतावनी सामने आई है। इस पर्यावरणीय उथल-पुथल की गंभीरता को रेखांकित करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, "अल नीनो हमारी आंखों के सामने ही और विकराल होता जा रहा है और आने वाले दिनों में इसका असर लोगों की जिंदगी को मुसीबतों से भर सकता है।"

## भारतीय खेती और मानसून पर सूखे की काली छाया
इस मौसमी उलटफेर की तपिश भारत के खेतों में मानसून के सामान्य चार महीनों के दौर में साफ देखी गई। जून और अगस्त के दौरान मानसूनी फुहारों में दर्ज की गई तीव्र गिरावट के बाद सितंबर के महीने में भी अनेक क्षेत्रों में बारिश सामान्य के मुकाबले लगभग आधी ही दर्ज हुई। महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचलों में जल स्रोतों के रीते होने से सूखे जैसी गंभीर विकट परिस्थितियां पैदा हो चुकी हैं। सिंचाई के पानी की कमी ने खरीफ की प्रमुख नकदी और खाद्यान्न फसलों को सीधी चोट पहुंचाई है, जिनमें प्रमुख रूप से धान, विविध दालें, कपास और मक्का शामिल हैं। कृषि विशेषज्ञों का आकलन है कि अगर खेतों में फसलों की उपज में यह कमी इसी तरह जारी रही, तो आने वाले दौर में आवश्यक खाद्य वस्तुओं के दाम आसमान छू सकते हैं। इसका सीधा आघात निम्न आय वर्ग और निर्धन परिवारों के रसोई बजट पर पड़ेगा, जिससे बुनियादी भरण-पोषण की समस्या पैदा हो सकती है।

## किसानों के बचाव में सरकारी नीतियां और जल संचयन
विगत चार महीनों से जारी मौसम संबंधी आगाहियों के मद्देनजर भारत के नीतिगत गलियारों में भी सक्रियता बढ़ गई है। केंद्रीय स्तर पर इस पर्यावरणीय चुनौती से निपटने के लिए योजनाओं को धरातल पर उतारा जा रहा है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, "किसानों के लिए सुरक्षा कवच तैयार किया जा रहा है।" प्रशासन ने देश के तीन सौ पचास से अधिक संवेदनशील चिह्नित जिलों में जल संचयन और संरक्षण की गति को तीव्र कर दिया है। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह पर किसानों को अब परंपरागत जल-गहन फसलों के स्थान पर कम सिंचाई वाली और बेहद कम समय में पककर तैयार होने वाली दालों और बाजरा जैसी फसलों की बुवाई के लिए प्रेरित किया जा रहा है। सूखे के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए वर्षा जल संचयन को प्राथमिकता दी जा रही है ताकि भविष्य की बुवाई के लिए भूजल और सतही जल संरक्षित रखा जा सके।

## पड़ोसी मुल्क श्रीलंका में गहराता ऐतिहासिक जल संकट
अल नीनो की मार भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण में श्रीलंका इस समय बीते दस वर्षों के सबसे भीषण सूखे की मार झेल रहा है। वहां की एक लाख साठ हजार से अधिक आबादी को दैनिक उपयोग के लिए स्वच्छ पेयजल जुटाना मुश्किल हो रहा है। देश के प्रमुख प्राकृतिक और कृत्रिम जलाशय पूरी तरह सूख चुके हैं, जिसके कारण विख्यात याला नेशनल पार्क जैसे वन्यजीव पर्यटन स्थलों को पर्यटकों के लिए बंद करने का अप्रत्याशित कदम उठाना पड़ा है। वन्यजीवों को जीवनदान देने के लिए टैंकरों से कृत्रिम रूप से पानी की आपूर्ति की जा रही है। श्रीलंका के उत्तर-पूर्वी हिस्सों में स्थित तालाबों के सूख जाने से हजारों मछलियों के तड़पकर दम तोड़ने की घटनाएं सामने आई हैं। यद्यपि वहां की आपदा राहत एजेंसी समुद्री जल के विलवणीकरण यानी उसे खारेपन से मुक्त कर पीने योग्य बनाने की दिशा में काम कर रही है, परंतु सीमित तकनीकी ढांचे के कारण यह प्रयास इस विकट संकट के सामने बेहद नाकाफी साबित हो रहे हैं।

## दक्षिण-पूर्व एशिया में धान की खेती को बड़ा झटका
दक्षिण-पूर्व एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में भी इस मौसमी आघात को लेकर गहरा तनाव व्याप्त है। पूर्ववर्ती अनुभवों के बावजूद मौजूदा संकट का पैमाना कहीं अधिक चिंताजनक दिखाई दे रहा है। नवीनतम अनुमानों के मुताबिक इस समूचे क्षेत्र के चावल उत्पादन में आठ से दस प्रतिशत तक की तीव्र गिरावट दर्ज हो सकती है। इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे मुल्कों में आम नागरिकों की घरेलू कमाई का एक बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के भोजन पर खर्च होता है। ऐसी स्थिति में यदि मुख्य खाद्यान्न की कमी से बाजार मूल्य में थोड़ा भी उछाल आता है, तो वह व्यापक सामाजिक अशांति और जनआक्रोश को भड़का सकता है। आधुनिक नीति विश्लेषकों का स्पष्ट तर्क है कि अनाज की सुरक्षा अब महज खेती तक सीमित मसला नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे-सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता का बुनियादी स्तंभ बन चुका है। नतीजतन, इस क्षेत्र की सरकारें अब रासायनिक खादों की निर्भरता छोड़कर जैविक खादों के उपयोग और पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को तेजी से अपना रही हैं।

## पूर्वी एशिया में तापमान के टूटे रिकॉर्ड और तूफानों का साया
पूर्वी एशियाई देशों में अत्यधिक गर्मी और तीव्र चक्रवातों का दोहरा खतरा सिर उठा रहा है। दक्षिण कोरिया में जुलाई का महीना सबसे सूखा दर्ज हुआ, जिसके तुरंत बाद अप्रत्याशित मूसलाधार बारिश ने तबाही मचा दी। इस अप्रत्याशित मौसमी उलटफेर से निपटने के लिए तकनीक संपन्न इस राष्ट्र ने अठारह वर्षों के अंतराल के बाद अपनी हीटवेव चेतावनी प्रणाली में आमूलचूल बदलाव किया है। नए दिशा-निर्देशों के अनुसार जब महसूस होने वाला तापमान अड़तीस डिग्री के पार जाएगा, तो खुले में किए जाने वाले सभी प्रकार के कार्यों को तुरंत रोकने की स्पष्ट हिदायत दी जाएगी। दूसरी ओर, जापान में तापमान का पारा चालीस डिग्री से ऊपर निकलने के साथ इतिहास में पहली बार आधिकारिक रूप से क्रूर गर्मी वाला दिन घोषित किया गया। इसके साथ ही वहां सुपर टाइफून आने की आशंकाओं ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है, जिसके चलते नागरिकों को पर्याप्त खाद्य सामग्री एकत्र रखने और घरों को मजबूत करने की सलाह दी गई है। मूसलाधार बारिश के खतरे को देखते हुए कुछ प्रमुख राजमार्गों के अंडरपास को एहतियातन पहले ही बंद करने की व्यवस्था तय की गई है।

## चीन, हांगकांग और ताइवान की प्रशासनिक तैयारियां
अत्यधिक गर्मी और मौसमी दुष्प्रभावों से निपटने के लिए चीन और उसके प्रशासनिक क्षेत्रों ने भी विस्तृत आपातकालीन योजनाएं लागू की हैं। हांगकांग के प्रशासन ने भीषण गर्मी के दौरान सभी वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों और कंपनियों के लिए अपने श्रमबल को शीतल वातावरण और नियमित विश्राम की सुविधा उपलब्ध कराना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया है। मुख्यभूमि चीन ने जलवायु जोखिमों का सटीक आकलन करने के लिए शहरों को विशेष मानचित्र विकसित करने का निर्देश दिया है और इसके साथ ही सौ दिनों का विशेष सुरक्षा अभियान प्रारंभ किया है। उधर, ताइवान ने तापमान के चालीस डिग्री से अधिक होने की परिस्थितियों से निपटने के लिए तीन दिनों तक चलने वाला व्यापक सिमुलेशन अभ्यास संचालित किया है। संक्षेप में कहें तो अल नीनो अब महज तापमान का बढ़ना या घटना नहीं रहा, बल्कि यह स्वास्थ्य, भोजन, पेयजल और वित्तीय व्यवस्थाओं को झकझोर देने वाला एक साझा वैश्विक संकट बन चुका है, जिससे केवल दीर्घकालिक पर्यावरण नीतियों और सतत कृषि के दम पर ही निपटा जा सकता है।

## इसका आप पर असर
अल नीनो की वजह से खाद्यान्न पैदावार में गिरावट और सूखे के कारण आम परिवारों के बजट और खानपान पर सीधा असर पड़ सकता है।

- **भारत में:** कम मानसूनी बारिश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सूखे के चलते खरीफ फसलों की पैदावार घटने से दालों और चावल की कीमतें बढ़ सकती हैं। आम उपभोक्ताओं को आने वाले महीनों में अपनी रसोई के खर्च में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, जिससे निपटने के लिए सरकार कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा दे रही है।
- **वैश्विक खाद्य बाजार:** दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल उत्पादन में आठ से दस प्रतिशत की गिरावट से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनाज के दाम बढ़ सकते हैं। जो परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं, उन पर खाद्य महंगाई का सीधा वित्तीय बोझ बढ़ेगा।
- **पेयजल और जनजीवन:** श्रीलंका जैसे पड़ोसी क्षेत्रों में भीषण सूखे के कारण एक लाख साठ हजार से ज्यादा लोगों के लिए पानी की भारी किल्लत हो गई है। घरेलू स्तर पर जल संचयन और पानी के नियंत्रित इस्तेमाल की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है।
- **श्रमिक और कार्यस्थल नियम:** अत्यधिक तापमान के मद्देनजर काम के घंटों और सुरक्षा नियमों में बड़े बदलाव लागू किए जा रहे हैं। दक्षिण कोरिया और हांगकांग जैसे क्षेत्रों में मजदूरों के लिए चिलचिलाती धूप में खुले में काम करने पर रोक और अनिवार्य आराम के नियम बनाए गए हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
प्रशांत महासागर की सतह के असामान्य तापमान और बढ़ते वैश्विक जलवायु परिवर्तन के गठजोड़ ने मौजूदा अल नीनो चक्र को असाधारण रूप से आक्रामक बना दिया है। इस वायुमंडलीय बदलाव ने एशिया के मानसूनी तंत्र और वर्षा चक्र को बाधित कर सूखे और अत्यधिक गर्मी की स्थिति पैदा कर दी है।

- **प्रशांत जल का असामान्य रूप से गर्म होना:** प्रशांत महासागर में पानी का तापमान सामान्य से कहीं अधिक बढ़ जाना अल नीनो की मुख्य भौतिक वजह है। जब यह प्राकृतिक मौसमी घटना जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ मिलती है, तो इसकी तीव्रता कई दशकों के पुराने रिकॉर्ड तोड़ने की सीमा तक पहुंच जाती है।
- **मानसूनी हवाओं की विफलता:** अल नीनो के प्रभाव से मानसूनी बादलों की चाल प्रभावित हुई, जिससे भारत में जून और अगस्त में कम बारिश हुई और सितंबर में कई इलाकों में सामान्य से आधी बारिश ही दर्ज हुई। इस अनियमितता ने भूजल स्तर और जलाशयों को भरने का मौका नहीं दिया।
- **ग्लोबल वार्मिंग का दोहरा प्रभाव:** वायुमंडलीय तापमान में लगातार वृद्धि के कारण जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में तापमान चालीस डिग्री के खतरनाक स्तर को छू रहा है। इसके साथ ही वायुमंडल में नमी के असंतुलन से अचानक भीषण बारिश और सुपर टाइफून का खतरा भी गहरा गया है।

## सवाल-जवाब

### 1. अल नीनो से एशिया में कितने लोगों पर भुखमरी का खतरा मंडरा रहा है?
विश्व खाद्य कार्यक्रम की चेतावनी के अनुसार अल नीनो और सूखे के चलते लगभग पांच करोड़ लोग भुखमरी के जोखिम का सामना कर सकते हैं।

### 2. भारत में अल नीनो का सबसे ज्यादा असर किन फसलों पर पड़ने की आशंका है?
मानसून कमजोर रहने के कारण चावल, दालें, कपास और मक्का जैसी खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।

### 3. भारत सरकार सूखे के संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है?
केंद्र सरकार 350 से ज्यादा संवेदनशील जिलों में जल संरक्षण बढ़ा रही है और किसानों को कम पानी वाली फसलों जैसे दालें और बाजरा उगाने के लिए प्रेरित कर रही है।

### 4. श्रीलंका में सूखे के हालात कितने गंभीर हैं?
श्रीलंका में 1.6 लाख से अधिक लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं, जलाशय सूख चुके हैं और याला नेशनल पार्क जैसे वन्यजीव स्थल बंद करने पड़े हैं।

### 5. दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल के उत्पादन में कितनी गिरावट का अनुमान है?
अल नीनो के प्रभाव के चलते दक्षिण-पूर्व एशिया में क्षेत्रीय चावल पैदावार में आठ से दस प्रतिशत की कमी आने का अनुमान लगाया गया है।

### 6. दक्षिण कोरिया ने गर्मी से बचाव के लिए अपने नियमों में क्या बदलाव किया है?
दक्षिण कोरिया ने 18 साल बाद हीटवेव अलर्ट व्यवस्था बदली है, जिसके तहत 38 डिग्री तापमान महसूस होने पर बाहरी काम रोकने की सलाह दी जाती है।

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