पंजाब के कई जिलों पर बलूचिस्तान का दावा, नया राष्ट्रीय नक्शा जारी कर 64 प्रतिशत क्षेत्रफल का किया ऐलान रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान संगठन ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में शामिल तौंसा शरीफ, डेरा गाजी खान और राजनपुर जैसे बलोच बहुल इलाकों को अपने नक्शे में वापस शामिल करने के लिए देशव्यापी अभियान शुरू किया है। पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्रता की मांग कर रहे संगठन रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने अपने ऐतिहासिक और पारंपरिक भूभागों को पुनः प्राप्त करने का औपचारिक ऐलान किया है। संगठन का कहना है कि अतीत में जिन इलाकों को जबरन तथा गैर-कानूनी तरीके से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का हिस्सा बना दिया गया था, उन्हें अब बलूचिस्तान के मूल और वास्तविक राष्ट्रीय नक्शे में फिर से शामिल किया जा रहा है। इस नए राजनीतिक तथा भौगोलिक दावे के तहत पंजाब प्रांत के अंतर्गत आने वाले तौंसा शरीफ, डेरा गाजी खान और राजनपुर समेत कई प्रमुख बलोच बहुल क्षेत्रों को बलूचिस्तान की प्रांतीय व राष्ट्रीय सीमाओं के अधीन माना गया है। पंजाब प्रांत के बलोच बहुल जिलों पर ऐतिहासिक संप्रभुता का दावा रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान की ओर से जारी बयान में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि पंजाब के प्रशासन के तहत आने वाले ये क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से बलूचिस्तान की मातृभूमि का अभिन्न अंग रहे हैं। संगठन के अनुसार, पंजाब प्रांतीय सरकार का इन इलाकों पर शासन पूरी तरह से अवैध है और अब इन्हें सीधे तौर पर बलूचिस्तान के संप्रभु नियंत्रण में लाया जाएगा। इस राजनीतिक फैसले का मुख्य उद्देश्य उन सभी बलोच क्षेत्रों को एक ही राष्ट्रीय प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत लाना है जिन्हें प्रशासनिक फेरबदल के नाम पर बलूचिस्तान से अलग कर दिया गया था। बलोच जनजातियों को एकजुट करने के लिए देशव्यापी अभियान की शुरुआत अपनी सीमाओं की पुनर्स्थापना के इस फैसले को धरातल पर उतारने के लिए संगठन ने एक वृहद देशव्यापी अभियान का शुभारंभ किया है। इस अभियान का प्राथमिक लक्ष्य पंजाब के विभिन्न हिस्सों में सदियों से निवास कर रहे बलोच समुदायों को उनकी ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ना और एक सूत्र में पिरोना है। रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने लेघारी, खोसा, मजारी, द्रिशाक, कैसरानी, बुजदार, गोरचानी, सुखानी, खेतरान, रिंद, लशारी, होत, दश्ती, जमाली और जतोई जैसी प्रमुख बलोच जनजातियों तथा उनकी उप-जनजातियों से सामूहिक रूप से संगठित होने का आह्वान किया है। संगठन ने इन सभी समूहों से अपील की है कि वे अपनी राष्ट्रीय पहचान, भाषाई बंधुत्व, सांस्कृतिक विरासत और अपनी मातृभूमि बलूचिस्तान के साथ अपने रक्त संबंधों को गर्व से उजागर करें। सरकारी दस्तावेजों और नागरिक पहचान पत्रों में बदलाव की अपील इस आंदोलन को प्रशासनिक स्तर पर मजबूती देने के मकसद से रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने पंजाब में रह रहे बलोच नागरिकों के सामने एक विशेष मांग रखी है। संगठन ने लोगों से आग्रह किया है कि वे अपने दैनिक कामकाज और कानूनी पहचान से जुड़े सभी प्रमुख दस्तावेजों में पंजाब की जगह बलूचिस्तान को दर्ज कराना शुरू करें। इसमें राष्ट्रीय पहचान पत्र, पासपोर्ट, स्थानीय निवास प्रमाण पत्र (डोमिसाइल), स्कूल दाखिला फॉर्म और जन्म प्रमाण पत्र शामिल हैं। संगठन का मानना है कि नागरिक दस्तावेजों में इस प्रकार का बदलाव बलोच क्षेत्रों की ऐतिहासिक पहचान को मिटने से बचाएगा और भावी पीढ़ियों के सांस्कृतिक व भौगोलिक संबंधों को पूरी तरह सुरक्षित रखेगा। 2024 के बलोच लॉन्ग मार्च और 6 करोड़ जनता की एकजुटता का हवाला अपने आधिकारिक बयान में संगठन ने वर्ष 2024 में आयोजित हुए ऐतिहासिक बलोच लॉन्ग मार्च का विशेष रूप से उल्लेख किया है। बयान के अनुसार, जब लॉन्ग मार्च के प्रतिभागी पंजाब के बलोच बहुल इलाकों से गुजरे थे, तब वहां के लाखों स्थानीय निवासियों ने उनका अभूतपूर्व और भव्य स्वागत किया था। संगठन का दावा है कि पंजाब के प्रशासनिक कब्जे में रह रहे बलोच नागरिक हमेशा से ही अपनी मूल मातृभूमि बलूचिस्तान में दोबारा शामिल होने की उम्मीद लगाए बैठे थे। इस नए फैसले को दुनिया भर में फैले 6 करोड़ बलोच लोगों के लिए एक अत्यंत गर्व और खुशी का अवसर बताते हुए संगठन ने कहा कि बलोच राष्ट्र आज इतिहास में पहली बार इतना अधिक मजबूत और एकजुट नजर आ रहा है। क्षेत्रफल को लेकर बड़ा दावा: 44 प्रतिशत नहीं, 64 प्रतिशत है वास्तविक सीमा प्रांतीय सीमाओं के दावों के साथ-साथ रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने बलूचिस्तान के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल को लेकर भी एक बड़ा और चौंकाने वाला दावा पेश किया है। संगठन का कहना है कि बलूचिस्तान का वास्तविक और ऐतिहासिक क्षेत्रफल 44 प्रतिशत न होकर 64 प्रतिशत है। बयान में स्पष्ट किया गया कि 44 प्रतिशत का आंकड़ा पाकिस्तानी शासन और उसके सैन्य तंत्र द्वारा फैलाया गया एक भ्रम है, जिसका उद्देश्य बलूचिस्तान के विशाल प्राकृतिक संसाधनों और वास्तविक सीमाओं को छोटा करके दिखाना रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, मीडिया और गूगल से नक्शा बदलने की मांग भौगोलिक स्थिति से जुड़े इस दावे को वैश्विक मान्यता दिलाने के लिए रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक बड़ी मांग रखी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी बयान के माध्यम से संगठन ने सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाचार माध्यमों, ऑनलाइन सूचना पोर्टलों, गूगल, अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों, वैश्विक भौगोलिक संस्थानों तथा संयुक्त राष्ट्र समेत पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे अब से अपने नक्शों, लेखों और आंकड़ों में बलूचिस्तान का क्षेत्रफल 64 प्रतिशत के रूप में ही दर्ज करें। संगठन का कहना है कि ऐसा करने से बलूचिस्तान के ऐतिहासिक भूगोल और उसकी वास्तविक राष्ट्रीय सीमाओं का सही तथा न्यायसंगत चित्रण दुनिया के सामने आ सकेगा। इसका आप पर असर पाकिस्तान के आंतरिक भूगोल और प्रशासनिक सीमाओं को लेकर जारी यह विवाद क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक हलचलों को प्रभावित कर सकता है। • भारत पर प्रभाव: पड़ोसी देश पाकिस्तान में बढ़ते आंतरिक असंतोष और सीमा विवादों से दक्षिण एशियाई क्षेत्र की सामरिक स्थिति पर असर पड़ता है, जिससे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को पश्चिमी सीमा पर स्थिति की निगरानी बढ़ानी पड़ सकती है। • बलूचिस्तान व पंजाब क्षेत्र में: पंजाब प्रांत के तौंसा, डेरा गाजी खान और राजनपुर जिलों में रहने वाले नागरिकों के लिए यह घोषणा प्रशासनिक अनिश्चितता और राजनीतिक तनाव बढ़ा सकती है। • अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानचित्र एजेंसियों पर: गूगल और वैश्विक भौगोलिक संस्थानों के सामने बलूचिस्तान के क्षेत्रफल और सीमाओं के नए दावों के बाद डेटा सत्यापन की चुनौती खड़ी होगी। • स्थानीय बलोच आबादी पर: बलोच जनजातियों से पहचान पत्रों में बलूचिस्तान दर्ज कराने की अपील से स्थानीय स्तर पर राज्य प्रशासन के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसा क्यों हुआ रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान संगठन का दावा है कि ऐतिहासिक रूप से बलोच बहुल इलाकों को अतीत में अनुचित तरीके से पंजाब प्रांत में मिलाया गया था। इस नए अभियान के पीछे का मुख्य कारण बलोच राष्ट्रीय पहचान को पुनर्जीवित करना और अपनी सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है। • ऐतिहासिक प्रशासनिक विलय: संगठन के अनुसार, ब्रिटिश काल और बाद में पाकिस्तान के गठन के समय बलोच बहुल क्षेत्रों जैसे डेरा गाजी खान और राजनपुर को पंजाब के अधीन कर दिया गया था, जिसे वे गैर-कानूनी मानते हैं। • 2024 के लॉन्ग मार्च का प्रभाव: वर्ष 2024 में आयोजित बलोच लॉन्ग मार्च को पंजाब के बलोच इलाकों में मिले भारी जनसमर्थन के बाद इस आंदोलन को राजनीतिक बल मिला। • क्षेत्रफल के आंकड़ों पर विवाद: बलोच गुटों का आरोप है कि पाकिस्तानी प्रशासन बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों और वास्तविक आकार को छुपाने के लिए इसका क्षेत्रफल 64 प्रतिशत के बजाय केवल 44 प्रतिशत दर्शाता है। सवाल-जवाब 1. रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने पंजाब के किन जिलों पर दावा ठोका है? संगठन ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित तौंसा शरीफ, डेरा गाजी खान और राजनपुर जैसे बलोच बहुल इलाकों पर अपना दावा पेश किया है। 2. बलूचिस्तान के क्षेत्रफल को लेकर संगठन का क्या दावा है? संगठन का दावा है कि बलूचिस्तान का वास्तविक ऐतिहासिक क्षेत्रफल 64 प्रतिशत है, जबकि पाकिस्तान सरकार इसे केवल 44 प्रतिशत बताती है। 3. संगठन ने पंजाब में रहने वाले बलोच लोगों से क्या अपील की है? उन्होंने बलोच नागरिकों से पहचान पत्र, पासपोर्ट, डोमिसाइल और जन्म प्रमाण पत्रों में पंजाब की जगह बलूचिस्तान दर्ज कराने का आह्वान किया है। 4. किन प्रमुख बलोच जनजातियों का बयान में जिक्र किया गया है? बयान में लेघारी, खोसा, मजारी, द्रिशाक, कैसरानी, बुजदार, गोरचानी, सुखानी, खेतरान, रिंद, लशारी, होत, दश्ती, जमाली और जतोई जनजातियों का उल्लेख है। 5. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और गूगल से क्या मांग की गई है? संगठन ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया, गूगल और भौगोलिक संस्थानों से अपने नक्शों व अभिलेखों में बलूचिस्तान का क्षेत्रफल 64 प्रतिशत दर्ज करने की मांग की है। https://trendkia.com/world/punjab-ke-kai-jilon-para-balochistan-ka-dava-naya-rashtriya-naksha-jari-kara-64-pratishata-kshetraphala-ka-kiya-ailana-32465 TrendKia — Har trend, sabse pehle.