# रूसी एस-400 मिसाइल डिफेंस बेचने की तैयारी में तुर्की, यूएई सौदे पर इजरायल की आपत्ति से फंसा नया पेंच

> तुर्की द्वारा रूस से खरीदे गए एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को यूएई को ट्रांसफर करने की योजना पर इजरायल के कड़े रुख से नया कूटनीतिक मोड़ आ गया है। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे अमेरिकी एफ-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम और पश्चिम एशिया का रणनीतिक संतुलन अहम वजह माना जा रहा है।

**Type:** article · **Category:** दुनिया · **Published:** 2026-09-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/world/rusi-s-400-misaila-diphensa-bechane-ki-taiyari-men-turkey-uae-saude-para-israel-ki-apatti-se-phnsa-naya-pencha-37628 · **Language:** Hindi
**Tags:** एस-400 मिसाइल, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, इजरायल, अमेरिका, काट्सा प्रतिबंध, एफ-35 फाइटर जेट

हवाई सुरक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक आधुनिक माने जाने वाले रूसी एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम को लेकर पश्चिम एशिया और नाटो खेमे में एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। भारत की सीमाओं की निगरानी में तैनात इसी रूसी तकनीक का इस्तेमाल तुर्की भी करता आ रहा है, लेकिन वाशिंगटन के साथ लंबे समय से चले आ रहे विवाद को खत्म करने की दिशा में तुर्की इसे किसी तीसरे देश को सौंपने के विकल्प तलाश रहा था। इस पूरे मामले में तुर्की में अमेरिकी राजदूत टॉम बराक के ताजा बयानों से साफ हुआ है कि रूसी हथियार और तुर्की पर थोपे गए अमेरिकी काट्सा प्रतिबंधों पर दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक संवाद लगातार जारी है। हालांकि जिस समझौते को अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद की जा रही थी, उसमें अब इजरायल के दखल और संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई पर बढ़ते दबाव के कारण नई जटिलताएं पैदा हो गई हैं।

## वाशिंगटन और अंकारा के बीच एस-400 से उपजा गतिरोध
तुर्की ने जब मॉस्को से एस-400 एयर डिफेंस प्रणाली खरीदने का ऐतिहासिक फैसला लिया था, तब पश्चिमी रक्षा गलियारों में भारी नाराजगी देखी गई थी। इस सौदे की सीधी प्रतिक्रिया के रूप में अमेरिका ने तुर्की को अपने पांचवीं पीढ़ी के एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट कार्यक्रम से तत्काल बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इसके साथ ही वाशिंगटन ने अपने 2017 के सख्त संघीय कानून काट्सा के तहत तुर्की पर कड़े आर्थिक व सैन्य प्रतिबंध भी थोप दिए थे। काट्सा यानी काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट एक ऐसा अमेरिकी कानूनी प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल रूस, ईरान अथवा उत्तर कोरिया के साथ बड़े रणनीतिक या रक्षा अनुबंध करने वाले किसी भी देश या विदेशी संस्था के खिलाफ दंडात्मक कदम उठाने के लिए किया जाता है। तुर्की इसी कड़े कानून के दायरे में फंसकर अपनी रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में गंभीर रुकावटों का सामना कर रहा था।

## खाड़ी देश को मिसाइल प्रणाली सौंपने की योजना
इस राजनयिक और तकनीकी गतिरोध को सुलझाने के लिए दोनों देशों के विशेषज्ञ लगातार किसी व्यवहार्य समाधान पर विचार विमर्श कर रहे हैं। अमेरिकी राजदूत टॉम बराक ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस जटिल विवाद को हल करने में अभी और वक्त लगेगा तथा दोनों देशों के रणनीतिक दल कई स्तरों पर सक्रियता से काम कर रहे हैं। उनके अनुसार यह मामला महज तुर्की के एकतरफा फैसले पर निर्भर नहीं है, बल्कि इसमें व्यापक सुरक्षा समीकरण शामिल हैं। लगभग ढाई महीने पहले तुर्की के समाचार पत्र हुर्रियत में छपे एक विश्लेषण में यह बात सामने आई थी कि तुर्की ने अपने एस-400 सिस्टम को किसी खाड़ी देश को बेचने का पक्का मन बना लिया है। इसके बाद विभिन्न जानकारियों में यह स्पष्ट हुआ कि यह संभावित खरीदार देश कोई और नहीं बल्कि संयुक्त अरब अमीरात है।

## रूस की सहमति के बावजूद इजरायल का कड़ा ऐतराज
शुरुआती आकलनों के विपरीत इस पूरी प्रक्रिया में रुकावट रूस की तरफ से नहीं आई है। तुर्की के संचार माध्यम हेबर-7 में प्रकाशित विवरण के मुताबिक, वार्ता प्रक्रिया से जुड़े एक सूत्र ने यह स्पष्ट किया है कि मॉस्को और अंकारा के बीच एस-400 के ट्रांसफर को लेकर आपसी सहमति का फॉर्मूला पहले ही निकाला जा चुका है। वास्तविक अड़चन तब खड़ी हुई जब इजरायल ने इस संभावित रक्षा सौदे को लेकर अबू धाबी पर कड़ा कूटनीतिक दबाव बनाना शुरू कर दिया। सामने आए तथ्यों के अनुसार यदि यूएई इस रूसी रक्षा प्रणाली को अपने बेड़े में शामिल करता है, तो इजरायल इसे अपने क्षेत्रीय हितों के खिलाफ मानता है और इसी वजह से उसने इस पूरी डील को रोकने के लिए अबू धाबी प्रशासन पर दबाव बढ़ाया है।

## इजरायल की सामरिक चिंता और एफ-35 की वापसी का डर
इस पूरे मामले में इजरायल की चिंता केवल यूएई की वायु रक्षा क्षमताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध तुर्की के संभावित सैन्य पुनरुत्थान से जुड़ा है। तुर्की और इजरायल के बीच सामान्य या दोस्ताना रिश्ते नहीं हैं। इसके अलावा मुस्लिम बहुल देश होने के नाते तुर्की का स्पष्ट झुकाव खाड़ी देशों की ओर रहता है और वह इस्लामी जगत में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का निरंतर प्रयास करता रहा है। यदि तुर्की और अमेरिका के बीच एस-400 का विवाद यूएई को बिक्री के जरिए हल हो जाता है, तो अमेरिका अपने सभी काट्सा प्रतिबंध वापस ले लेगा। प्रतिबंध हटते ही तुर्की के लिए अत्याधुनिक एफ-35 लड़ाकू विमान कार्यक्रम में दोबारा शामिल होने का सीधा मार्ग खुल जाएगा। इजरायल बिल्कुल नहीं चाहता कि तुर्की वायु सेना को उन्नत स्टील्थ फाइटर जेट्स मिलें, क्योंकि इससे क्षेत्र में इजरायल की वायु श्रेष्ठता को सीधी चुनौती मिल सकती है।

## अमेरिका और तुर्की के बीच समाधान की तलाश
इन तमाम क्षेत्रीय पेचों के बीच अमेरिका स्वयं इस विवाद को समाप्त करने के स्पष्ट संकेत दे रहा है। राजदूत टॉम बराक के अनुसार वर्तमान समय में अमेरिका और तुर्की के द्विपक्षीय संबंध पहले की तुलना में अधिक मजबूत स्थिति में हैं और दोनों देशों की व्यापक रक्षा साझेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह विश्वास भी व्यक्त किया कि एस-400 से जुड़े विवाद का स्थायी हल निकाल लिया जाएगा। इससे साफ झलकता है कि वाशिंगटन और अंकारा एक ऐसा व्यावहारिक रास्ता तलाश रहे हैं जिससे रूसी मिसाइल प्रणाली का विवाद भी समाप्त हो जाए और भविष्य में द्विपक्षीय रक्षा सहयोग बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ सके।

## इसका आप पर असर
पश्चिम एशिया और नाटो के बीच रक्षा हथियारों के पुनर्संतुलन का वैश्विक सुरक्षा और कूटनीति पर सीधा असर पड़ता है।

- **रक्षा नीति पर असर:** तीसरे देशों के जरिए हथियार हस्तांतरण के नियमों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इससे भविष्य में बहुपक्षीय रक्षा खरीद समझौतों पर निगरानी और अधिक कड़ी की जाएगी।
- **पश्चिम एशिया सुरक्षा संतुलन:** यूएई और इजरायल के बीच सैन्य सहयोग को लेकर नए मतभेद उभर सकते हैं। इससे खाड़ी क्षेत्र में हथियारों की होड़ और रणनीतिक समीकरणों पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।
- **अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार:** रूसी सैन्य साजो-सामान खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा और स्पष्ट हो गया है। दूसरे खरीदार देश अब ऐसे सौदों में द्वितीयक प्रतिबंधों के जोखिम का नए सिरे से मूल्यांकन करेंगे।
- **नाटो गठबंधन की मजबूती:** तुर्की और अमेरिका के बीच रक्षा विवाद सुलझने से नाटो के दक्षिणी हिस्से की सुरक्षा समन्वय मजबूत होगा। इससे वैश्विक स्तर पर सैन्य सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
तुर्की पर लगे अमेरिकी काट्सा प्रतिबंधों को हटाने और इजरायल द्वारा अपने क्षेत्रीय सैन्य दबदबे को सुरक्षित रखने की कोशिशों के कारण यह गतिरोध पैदा हुआ है।

- **काट्सा प्रतिबंधों का दबाव:** तुर्की ने रूस से एस-400 प्रणाली खरीदकर अमेरिकी कानून काट्सा का उल्लंघन किया था, जिसके बाद अमेरिका ने उसे एफ-35 कार्यक्रम से निकाल दिया। इस गतिरोध को खत्म करने के लिए तुर्की इस प्रणाली को किसी तीसरे देश को बेचना चाहता है।
- **यूएई सौदे पर इजरायली आपत्ति:** तुर्की ने इस रक्षा प्रणाली को यूएई को सौंपने की योजना बनाई जिस पर रूस भी सहमत हो गया था। लेकिन इजरायल ने इस सौदे का विरोध करते हुए अबू धाबी पर डील रोकने का दबाव डाल दिया।
- **एफ-35 कार्यक्रम में तुर्की की वापसी का डर:** अगर यह सौदा पूरा होता तो अमेरिका तुर्की पर से प्रतिबंध हटा लेता और तुर्की दोबारा एफ-35 लड़ाकू विमान पाने का हकदार बन जाता। इजरायल नहीं चाहता कि तुर्की की वायु सेना को उन्नत स्टील्थ फाइटर जेट्स मिलें।

## सवाल-जवाब

### 1. तुर्की ने रूस से कौन सा रक्षा सिस्टम खरीदा था?
तुर्की ने रूस से हवा में लंबी दूरी तक मार करने वाला एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम खरीदा था।

### 2. अमेरिका ने तुर्की पर काट्सा प्रतिबंध क्यों लगाए थे?
अमेरिका के 2017 के काट्सा कानून के तहत रूस के साथ बड़ा रक्षा सौदा करने के कारण तुर्की पर ये कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे।

### 3. तुर्की किस देश को अपना एस-400 सिस्टम बेचने की तैयारी कर रहा था?
तुर्की ने अपने एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम को संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई को बेचने का फैसला किया था।

### 4. इजरायल यूएई और तुर्की के बीच इस रक्षा सौदे का विरोध क्यों कर रहा है?
इजरायल को आशंका है कि डील पूरी होने पर तुर्की से प्रतिबंध हट जाएंगे और वह अमेरिकी एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट कार्यक्रम में वापस लौट जाएगा।

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