# संयुक्त राष्ट्र महासभा में तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने फिर उठाया कश्मीर का मुद्दा, बातचीत की दी सलाह

> तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक बार फिर कश्मीर मुद्दे का जिक्र करते हुए यूएन प्रस्तावों के तहत बातचीत से समाधान निकालने की वकालत की है।

**Type:** article · **Category:** दुनिया · **Published:** 2026-09-23 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/world/snyukta-rashtra-mahasabha-men-turkey-ke-rashtrapati-erdogan-ne-phira-uthaya-kashmir-ka-mudda-batachita-ki-di-salaha-36776 · **Language:** Hindi
**Tags:** तुर्की, रेचेप तैयप एर्दोगन, संयुक्त राष्ट्र महासभा, कश्मीर मुद्दा, भारत तुर्की संबंध, कूटनीति, शहबाज शरीफ

संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन के दौरान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच से तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने एक बार फिर दक्षिण एशिया और कश्मीर का प्रसंग छेड़ा है। वैश्विक नेताओं की सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने क्षेत्रीय विवादों पर अपने विचार रखे और कश्मीर के मामले को बातचीत के रास्ते सुलझाने पर जोर दिया। यह बयान ऐसे समय में सामने आया जब सभा कक्ष में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी उपस्थित थे।

## संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्या बोले तुर्की के राष्ट्रपति
मंगलवार को महासभा को संबोधित करते हुए रेचेप तैयप एर्दोगन ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र की स्थिरता पर टिप्पणी की। उन्होंने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि दक्षिण एशिया में कश्मीर विवाद सहित तमाम अनसुलझे मसलों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा संबंधित प्रस्तावों के दायरे में रखकर वार्ता के माध्यम से हल किया जाना अत्यंत आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में इस टिप्पणी को तुर्की के पुराने रुख की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।

एर्दोगन का यह भाषण केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने वैश्विक राजनीति के कई अन्य ज्वलंत मुद्दों पर भी तुर्की का पक्ष रखा। उन्होंने गाजा में चल रहे सैन्य संघर्ष पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कड़े और प्रभावी कदम उठाने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने फिलिस्तीनी राज्य को पुनः औपचारिक मान्यता दिए जाने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में व्यापक सुधार किए जाने की मांग दोहराई।

## फिलिस्तीन और साइप्रस पर भी रखा अपना रुख
अपने विस्तृत भाषण में तुर्की के राष्ट्रपति ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की अनुपस्थिति को भी रेखांकित किया। उन्होंने जानकारी दी कि महमूद अब्बास लगातार दूसरे वर्ष इस महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से भाग नहीं ले सके हैं। एर्दोगन ने स्पष्ट किया कि उनका देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों और उनकी मांगों को पूरी मजबूती से उठाता रहेगा। उन्होंने गाजा क्षेत्र के हालात का जिक्र करते हुए इजरायल के सैन्य अभियानों की कड़े शब्दों में निंदा की और वहां पनपे मानवीय संकट को अत्यंत गंभीर करार दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने तुर्की साइप्रस के नागरिकों के अंतरराष्ट्रीय अलगाव को समाप्त करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

## 2019 के बाद से लगातार बयानों का सिलसिला
तुर्की के राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर का उल्लेख किया जाना कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कई वर्षों से वे अपने वार्षिक संबोधनों में इस विषय को अलग-अलग संदर्भों और लहजों में शामिल करते रहे हैं। इस सिलसिले की शुरुआत विशेष तौर पर वर्ष 2019 में देखी गई थी, जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत लागू विशेष दर्जे को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था।

वर्ष 2019 में आयोजित 74वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान एर्दोगन ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि 80 लाख लोग लगभग नाकाबंदी की स्थिति में हैं। उन्होंने उस समय यह आरोप भी लगाया था कि वैश्विक समुदाय ने पिछले 72 वर्षों के लंबे अंतराल में इस विवाद के समाधान पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है।

## कूटनीतिक प्रतिक्रियाएं और नई दिल्ली का रुख
साल 2019 में दिए गए उस बयान पर भारत की ओर से बेहद कड़ा कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया गया था। नई दिल्ली ने तब स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी थी कि तुर्की को दूसरे संप्रभु राष्ट्रों की आंतरिक सीमाओं और अखंडता का सम्मान करना चाहिए तथा घरेलू विषयों में अवांछित हस्तक्षेप से पूरी तरह बचना चाहिए। इस तल्खी का असर द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ा, जिसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित तुर्की यात्रा रद्द हो गई थी और भारत ने तुर्की के साथ अपने रक्षा सहयोग को भी काफी सीमित करने के कदम उठाए थे।

इसके बावजूद एर्दोगन ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने रुख में बदलाव नहीं किया। वर्ष 2021 के अपने संबोधन में भी उन्होंने इस मसले को 74 वर्षों से जारी समस्या बताते हुए एक ऐसा समाधान खोजने की पैरवी की थी जो स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप हो। भारत सरकार लगातार यह दोहराती रही है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का संपूर्ण क्षेत्र भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है और इसमें किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप अथवा अंतरराष्ट्रीय मंच पर अनावश्यक बयानबाजी की कोई गुंजाइश नहीं है।

## इसका आप पर असर
संयुक्त राष्ट्र में तुर्की के राष्ट्रपति द्वारा दिया गया यह बयान द्विपक्षीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता है।

- **भारत में:** नई दिल्ली द्वारा इस तरह के बयानों को आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानकर खारिज किए जाने से रणनीतिक स्थिरता बनी रहती है। कूटनीतिक स्तर पर तुर्की के साथ रक्षा एवं आर्थिक वार्ताओं में सतर्कता का रुख जारी रहने की संभावना है।
- **वैश्विक मंचों पर:** अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तीसरे पक्ष की बयानबाजी से जमीनी वास्तविकताओं या शासन नीतियों में कोई बदलाव नहीं आता है। भारत अपने आंतरिक फैसलों पर किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को पूरी तरह अस्वीकार करने की नीति पर दृढ़ है।
- **द्विपक्षीय संबंधों पर:** इस प्रकार की राजनीतिक टिप्पणियों से दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद और व्यापारिक समझौतों की गति प्रभावित हो सकती है। वर्ष 2019 के बाद से दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक संबंधों में दूरी और सतर्कता साफ देखी गई है।
- **नागरिकों और यात्रियों के लिए:** सामान्य व्यापार और पर्यटन पर इसका कोई सीधा या तत्काल असर नहीं पड़ता है। छात्र और पर्यटक दोनों देशों के बीच सामान्य नियमों के तहत अपनी यात्राएं जारी रख सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
तुर्की के राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर का मुद्दा उठाने के पीछे उनकी विदेश नीति और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं का पुराना क्रम रहा है। यह बयान वैश्विक और क्षेत्रीय राजनीति के कई कारकों से प्रेरित दिखाई देता है।

- **पाकिस्तानी नेतृत्व से तालमेल:** तुर्की के राष्ट्रपति ने यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सभा में उपस्थिति के दौरान दिया। तुर्की लंबे समय से इस्लामाबाद के साथ मजबूत राजनीतिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखने की नीति पर चल रहा है।
- **2019 के संवैधानिक बदलावों की पृष्ठभूमि:** वर्ष 2019 में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया था, तब से एर्दोगन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय पर टिप्पणी करते आ रहे हैं। इस मुद्दे पर उनकी पुरानी लाइन बयानों के जरिए लगातार दोहराई जाती रही है।
- **मुस्लिम जगत में नेतृत्व की कूटनीति:** एर्दोगन अपने भाषणों में फिलिस्तीन, गाजा और साइप्रस जैसे विवादों को प्रमुखता देकर खुद को एक मुखर मुस्लिम नेता के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं। कश्मीर का उल्लेख भी उनकी इसी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जाता है।

## सवाल-जवाब

### 1. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने यूएनजीए में क्या कहा?
उन्होंने दक्षिण एशिया के विवादों, विशेष रूप से कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संबंधित प्रस्तावों के तहत बातचीत से सुलझाने की अपील की।

### 2. एर्दोगन के भाषण के समय वहां कौन उपस्थित था?
उनके संबोधन के समय संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ मौजूद थे।

### 3. कश्मीर पर भारत का आधिकारिक रुख क्या रहा है?
भारत ने स्पष्ट किया है कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और अन्य देशों को संप्रभुता का सम्मान करते हुए ऐसे मामलों में हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

### 4. एर्दोगन ने 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्या बयान दिया था?
सितंबर 2019 में उन्होंने कहा था कि 80 लाख लोग लगभग नाकाबंदी की स्थिति में हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने 72 वर्षों में इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

### 5. 2019 के बयान के बाद भारत ने क्या कूटनीतिक कदम उठाए थे?
भारत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित तुर्की यात्रा रद्द कर दी थी और रक्षा सहयोग को सीमित करने के कदम उठाए थे।

### 6. एर्दोगन ने अपने भाषण में अन्य किन वैश्विक मुद्दों पर बात की?
उन्होंने गाजा में इजरायली सैन्य अभियान की आलोचना की, फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देने की वकालत की, यूएन सुरक्षा परिषद में सुधार मांगे और तुर्की साइप्रस के अलगाव को खत्म करने पर जोर दिया।

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