US-Iran शांति समझौता: ओबामा की JCPOA रद्द करने के बाद ट्रंप ने आखिर क्या हासिल किया, पढ़ें पूरी कहानी अमेरिका और ईरान एक शांति समझौते पर राज़ी हुए हैं और 19 जून को स्विट्जरलैंड में MoU पर दस्तखत होंगे। 2002 से लेकर अब तक की इस पूरी डील की कहानी और ओबामा बनाम ट्रंप की तुलना यहां समझिए। अमेरिका और ईरान के बीच आखिर तय क्या हुआ लंबे टकराव के बाद अमेरिका और ईरान एक शांति समझौते पर सहमत हो गए हैं। इस समझौते के तहत मध्य पूर्व में लेबनान समेत हर मोर्चे पर लड़ाई तुरंत रोकने पर रज़ामंदी बनी है। समझौते की लगभग सभी शर्तें अब सार्वजनिक हो चुकी हैं और इनमें सबसे बड़ी शर्त यही है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे। साथ ही दुनिया की सप्लाई चेन की सबसे संवेदनशील नस मानी जाने वाली स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को भी फौरन सबके लिए खोल दिया जाएगा। 19 जून को स्विट्जरलैंड में MoU पर दस्तखत होते ही यह समझौता अमल में आ जाएगा। लेकिन इस घोषणा के बीच जानकार एक सवाल पर अटके हुए हैं। ओबामा की JCPOA को रद्द करने के बाद ट्रंप ने आखिर ऐसा कौन सा बड़ा तीर मारा है, जो पहले की डील में नहीं था। इसका जवाब समझने के लिए ईरान डील के पूरे इतिहास पर एक नज़र डालनी ज़रूरी है। कहानी की शुरुआत: 2002 और परमाणु शक की पहली दस्तक यह पूरी कहानी 2002 में शुरू होती है, जब दुनिया को पहली बार पता चला कि ईरान एक परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा है। अमेरिका के सामने यह बात आई कि ईरान नतांज और अरक में परमाणु गतिविधियां चला रहा है, यानी आने वाले समय में वह परमाणु बम तक पहुंच सकता है। इस खुलासे के बाद ईरान पर अमेरिका, यूरोप और IAEA का दबाव तेज़ी से बढ़ने लगा। प्रतिबंधों की मार और ईरान का संकट 2006 के बाद हालात और कड़े हो गए। संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोप ने ईरान पर कई तरह के प्रतिबंध थोप दिए। इन प्रतिबंधों का सीधा असर ईरान के तेल और बैंकिंग सेक्टर पर पड़ा और दोनों बड़े संकट में फंस गए। नतीजा यह हुआ कि ईरान इन प्रतिबंधों से निकलने का रास्ता तलाशने में जुट गया। ओबामा का नज़रिया और 2015 की JCPOA 2009 में रिपब्लिकन जॉर्ज डब्ल्यू बुश के बाद डेमोक्रेट बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने। ओबामा की सोच इससे अलग थी। उनका मानना था कि न तो प्रतिबंध और न ही जंग किसी समस्या का असली हल हैं। इसी सोच के साथ 2012-2013 में ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच गुप्त बातचीत की नींव पड़ी। उस दौर में ईरान की कमान डॉ. हसन रूहानी के हाथ में थी और रूहानी खुद भी पश्चिम के साथ किसी समझौते के पक्ष में थे। इन गुप्त बातचीत ने औपचारिक वार्ता का पुल तैयार कर दिया और यहीं से JCPOA की ज़मीन बननी शुरू हुई। 2013 में दोनों देश एक अंतरिम समझौते तक पहुंचे और इसके बाद करीब दो साल तक अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, चीन और ईरान के बीच बातचीत का दौर चला। आखिरकार 2015 में JCPOA पर मुहर लग गई। JCPOA की अहम शर्तें • ओबामा ने ईरान के यूरेनियम एनरिचमेंट को 3.67 फीसद तक सीमित कर दिया। • एनरिच यूरेनियम का भंडार 300 किग्रा तक सीमित किया गया। • हज़ारों की तादाद में सेंट्रीफ्यूज़ हटाए गए। • IAEA को बड़े पैमाने पर निरीक्षण का अधिकार दिया गया। • बदले में अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र ने ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों से राहत दी। ट्रंप की एंट्री और JCPOA से बाहर निकलना डेमोक्रेट ओबामा का राष्ट्रपति पद का सफर 2009 में शुरू हुआ था और उनका दूसरा कार्यकाल 2017 में पूरा हो रहा था। 2016 के आखिर में चुनाव प्रचार के दौरान से ही रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ओबामा की इस डील को 'बैड डील' और 'वन साइडेड डील' बताते आ रहे थे। जनवरी 2017 में ट्रंप ने अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली और अगले ही साल, यानी मई 2018 में, उन्होंने अमेरिका को JCPOA से बाहर खींच लिया। ट्रंप ने JCPOA छोड़ने के पीछे क्या दलीलें दीं • ट्रंप को लगता था कि ओबामा की डील में कुछ प्रतिबंध 15 साल बाद खत्म होने थे, यानी डील स्थायी नहीं थी। • उनका तर्क था कि इससे ईरान भविष्य में दोबारा परमाणु बम की दिशा में बढ़ सकता है। • ट्रंप का मानना था कि ओबामा की डील सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सिमटी हुई थी, जबकि वे इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम को भी जोड़ना चाहते थे। • ओबामा की डील में ईरान की क्षेत्रीय गतिविधियों को शामिल नहीं किया गया था, जिनमें हिज़बुल्लाह, हूती और दूसरे शिया मिलीशिया को समर्थन देना भी आता है। • उनका मानना था कि ईरान को प्रतिबंधों से राहत देने का मतलब है उसे और मज़बूत करना, जिससे मध्य पूर्व में उसके साथी गुट भी ताकतवर होंगे। • ट्रंप यह भी मानते थे कि कड़े प्रतिबंध लगाकर ईरान को एक बेहतर और व्यापक समझौते के लिए मजबूर किया जा सकता है। • इन्हीं तमाम वजहों से ट्रंप ने 2015 वाली ओबामा डील को खारिज कर दिया था। ट्रंप का दूसरा कार्यकाल और MAGA एंगल डोनाल्ड ट्रंप 2025 में दूसरी बार सत्ता में लौटे और अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के तौर पर कामकाज संभाला। इस बार वे मागा यानी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नारे के साथ वापसी कर रहे थे। ईरान के साथ 19 जून को होने वाले शांति समझौते को भी इसी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के एंगल से पेश किया जा रहा है। ओबामा बनाम ट्रंप: दो डील, फर्क और कौन बेहतर • ट्रंप ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देना चाहते और ईरान ने भी परमाणु बम न बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई है। • ट्रंप ने यूरेनियम एनरिचमेंट को लेकर ईरान को बांधा है, लेकिन इस पर तस्वीर अब भी साफ नहीं है। • ट्रंप ने होर्मुज खोलने का रास्ता तैयार किया है, हालांकि ओबामा के दौर में भी होर्मुज बंद नहीं था। • जानकारों का मानना है कि ओबामा की डील ट्रंप की डील के मुकाबले कहीं ज़्यादा स्पष्ट थी, जिसमें परमाणु कार्यक्रम की निगरानी का बेहतर और व्यापक इंतज़ाम मौजूद था। • ट्रंप ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गुटों के मुद्दे को इस समझौते में शामिल नहीं कर पाए, जबकि इन्हीं बातों को लेकर वे ओबामा को कोसते रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही वजह है कि कई एक्सपर्ट अब सीधा सवाल उठा रहे हैं। अगर आखिर में यही समझौता करना ही था, तो फिर ईरान के साथ जंग के हालात तक जाने की ज़रूरत ही क्या थी। इसका आप पर असर आप पर इसका क्या असर पड़ेगा: • तेल और कीमतें: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबके लिए खुलने से कच्चे तेल की सप्लाई पर दबाव घटेगा, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर राहत की उम्मीद बन सकती है। • बाज़ार और निवेशक: मध्य पूर्व में लड़ाई रुकने से वैश्विक अनिश्चितता घटती है, जो शेयर बाज़ार और निवेशकों की धारणा के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है। सवाल-जवाब 1. अमेरिका और ईरान की डील पर दस्तखत कब और कहां होंगे? इस शांति समझौते का MoU 19 जून को स्विट्जरलैंड में साइन किया जाएगा और दस्तखत होते ही यह अमल में आ जाएगा। 2. इस समझौते की सबसे अहम शर्त क्या है? सबसे बड़ी शर्त यह है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे, और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को तुरंत सबके लिए खोल दिया जाएगा। 3. ट्रंप ने ओबामा की JCPOA से अमेरिका को कब बाहर निकाला था? जनवरी 2017 में 45वें राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने मई 2018 में अमेरिका को JCPOA से बाहर निकाल लिया था। 4. जानकार ओबामा और ट्रंप की डील में किसे बेहतर मानते हैं? कई जानकारों का मानना है कि ओबामा की डील ज़्यादा स्पष्ट थी और उसमें परमाणु कार्यक्रम की निगरानी का बेहतर तथा व्यापक इंतज़ाम था। https://trendkia.com/world/us-iran-shanti-samajhauta-obama-ki-jcpoa-radda-karane-ke-bada-trnpa-ne-akhira-ky-1223 TrendKia — Har trend, sabse pehle.