# वाशिंगटन से F-35 जेट्स हासिल करने के लिए रजब तैयब एर्दोगन ने डोनाल्ड ट्रंप पर बनाया दबाव, जानिए 1.4 अरब डॉलर और S-400 विवाद का पूरा सच

> एक विशेष इंटरव्यू में तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को F-35 फाइटर जेट्स का वादा याद दिलाया है। जानिए रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने के बाद शुरू हुए इस कूटनीतिक तनाव के पीछे की पूरी कहानी।

**Type:** article · **Category:** दुनिया · **Published:** 2026-08-15 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/world/washington-se-f-35-jets-hasil-karne-ke-liye-recep-tayyip-erdogan-ne-donald-trump-par-banaya-dabav-janiye-1-4-arab-dollar-aur-s-400-17144 · **Language:** Hindi
**Tags:** तुर्की, अमेरिका, रजब तैयब एर्दोगन, डोनाल्ड ट्रंप, F-35 फाइटर जेट, S-400 मिसाइल सिस्टम, रक्षा नीति, नाटो

वाशिंगटन और अंकारा के बीच पांचवीं पीढ़ी के F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स की आपूर्ति को लेकर लंबे समय से चला आ रहा कूटनीतिक गतिरोध एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर केंद्र में आ गया है। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हुई पिछली बातचीत और वादों का हवाला देते हुए वाशिंगटन पर नया रणनीतिक दबाव बनाया है। एक विशेष इंटरव्यू में एर्दोगन ने सार्वजनिक रूप से डोनाल्ड ट्रंप का नाम लेते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनसे F-35 लड़ाकू विमानों की डिलीवरी का वादा किया था और तुर्की अब उस प्रतिबद्धता के पूरा होने की उम्मीद कर रहा है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब रूस से S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की खरीद के बाद दोनों नाटो सहयोगियों के बीच पैदा हुए तनाव को सुलझाने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

## एर्दोगन का कूटनीतिक पैंतरा और अमेरिकी नेतृत्व से सवाल
तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन द्वारा सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति का जिक्र किया जाना अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों द्वारा एक सोची-समझी कूटनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है। रक्षा रणनीतिकारों ने भी एर्दोगन के इस साक्षात्कार को प्रमुखता से रेखांकित किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि तुर्की अब अमेरिका के अगले रणनीतिक कदम का इंतजार कर रहा है। एर्दोगन के इस सार्वजनिक बयान ने व्हाइट हाउस को एक जटिल स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि वाशिंगटन को अब यह तय करना होगा कि वह अपने राष्ट्रपति के कथित व्यक्तिगत आश्वासनों और अमेरिकी संसद तथा पेंटागन के सख्त रुख के बीच कैसे संतुलन बनाएगा।

अमेरिकी विदेश नीति और रक्षा प्रतिष्ठान में S-400 सौदे को लेकर गहरी नाराजगी रही है। अमेरिकी कांग्रेस ने CAATSA कानून के तहत तुर्की पर कड़े प्रतिबंध भी लगाए थे। ऐसे में एर्दोगन का सार्वजनिक रूप से डोनाल्ड ट्रंप के वादे को दोहराना, वाशिंगटन पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाने का एक बड़ा प्रयास है। अंकारा का मानना है कि दोनों शीर्ष नेताओं के बीच मौजूद व्यक्तिगत तालमेल के जरिए इस रक्षा विवाद की गुत्थी को सुलझाया जा सकता है।

## F-35 प्रोजेक्ट में तुर्की की हिस्सेदारी और 1.4 अरब डॉलर का दावा
दुनियाभर के रक्षा विशेषज्ञों के बीच यह सवाल अक्सर उठता है कि F-35 कार्यक्रम से बाहर किए जाने के बावजूद तुर्की आज भी इन अत्याधुनिक विमानों पर अपना दावा क्यों पेश कर रहा है। इसका उत्तर इस बहुराष्ट्रीय रक्षा परियोजना की आर्थिक और तकनीकी संरचना में छिपा है। तुर्की केवल इस पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ एयरक्राफ्ट का संभावित ग्राहक नहीं था, बल्कि वह F-35 जॉइंट स्ट्राइक फाइटर प्रोग्राम का शुरुआती सह-विकासकर्ता और ओरिजिनल पार्टनर देश रहा है।

तुर्की की प्रमुख रक्षा कंपनियों ने F-35 के विकास और विनिर्माण ढांचे में अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश किया था। तुर्की के अत्याधुनिक विनिर्माण संयंत्रों में F-35 जेट्स के लगभग 900 से अधिक अति-संवेदनशील कलपुर्जे तैयार किए जा रहे थे, जिनमें लैंडिंग गियर असेंबली, कॉकपिट डिस्प्ले सिस्टम, रोटर पार्ट्स और एयरफ्रेम के मुख्य बॉडी स्ट्रक्चर शामिल थे। इसके अतिरिक्त, तुर्की ने शुरुआती डिलीवरी प्राप्त करने के उद्देश्य से अमेरिका को 1.4 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि एडवांस बुकिंग के तौर पर हस्तांतरित की थी।

अंकारा का स्पष्ट कानूनी और वित्तीय तर्क है कि जिस रक्षा सामग्री के निर्माण के लिए उसने भारी पूंजी लगाई और अग्रिम राशि का भुगतान किया, वह उसका न्यायसंगत अधिकार है। तुर्की सरकार ने अमेरिका के सामने दो विकल्प रखे हैं: या तो वाशिंगटन तुर्की को उसके बकाए F-35 लड़ाकू विमानों की डिलीवरी सौंपे, या फिर एडवांस में ली गई 1.4 अरब डॉलर की पूरी राशि को ब्याज सहित अंकारा को वापस लौटाए।

## 2019 का S-400 सौदा और नाटो सुरक्षा विवाद
वाशिंगटन और अंकारा के बीच इस बड़े रक्षा समझौते में दरार साल 2019 में पड़ी, जब तुर्की ने अपनी राष्ट्रीय वायु रक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए रूस के साथ अत्याधुनिक S-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम खरीदने का करार किया। तुर्की द्वारा रूसी सैन्य तकनीक अपनाने के इस फैसले पर अमेरिका और नाटो सहयोगियों ने तीखी आपत्ति व्यक्त की थी।

वाशिंगटन का मुख्य तकनीकी तर्क यह था कि यदि नाटो का सदस्य देश तुर्की एक ही सैन्य तंत्र के तहत रूसी S-400 मिसाइल सिस्टम और अमेरिकी F-35 स्टील्थ जेट्स को संचालित करता है, तो इससे गंभीर सुरक्षा जोखिम उत्पन्न होंगे। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों को अंदेशा था कि S-400 के उन्नत रडार ट्रैकिंग सिस्टम F-35 की गुप्त स्टील्थ विशेषताओं और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर का संवेदनशील डेटा एकत्र कर सकते हैं। यह अंदेशा जताया गया था कि यह अति-वर्गीकृत तकनीकी डेटा अप्रत्यक्ष रूप से मॉस्को के हाथों में पहुंच सकता है, जिससे पश्चिमी देशों की हवाई श्रेष्ठता खतरे में पड़ जाएगी।

अमेरिका ने तुर्की को सख्त अल्टीमेटम देते हुए रूस के साथ S-400 सौदा तुरंत रद्द करने की शर्त रखी थी। हालांकि, राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने इसे तुर्की की राष्ट्रीय संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति पर सीधा हस्तक्षेप करार देते हुए अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से साफ मना कर दिया। तुर्की ने रूसी S-400 मिसाइल प्रणाली की डिलीवरी ले ली, जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप अमेरिकी प्रशासन ने तुर्की को F-35 बहुराष्ट्रीय कार्यक्रम से निष्कासित कर दिया और CAATSA कानून के तहत रक्षा प्रतिबंध लागू कर दिए। इसके साथ ही, तुर्की के लिए तैयार किए जा चुके उन विमानों को भी रोक लिया गया जिन पर तुर्की के राष्ट्रीय ध्वज के निशान अंकित किए जा चुके थे।

## ट्रंप और एर्दोगन के कूटनीतिक संबंध तथा ओबामा नीति का मुद्दा
एर्दोगन द्वारा सार्वजनिक मंच पर आकर डोनाल्ड ट्रंप के वादे का उल्लेख करना, वाशिंगटन के रक्षा नीति निर्माताओं को बैकफुट पर लाने की एक सोची-समझी रणनीति है। अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान, डोनाल्ड ट्रंप और रजब तैयब एर्दोगन के बीच कई मौकों पर सीधा संवाद और मजबूत व्यक्तिगत संबंध देखे गए थे। ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार किया था कि तुर्की को S-400 खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन ने अंकारा को अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल रक्षा प्रणाली बेचने से इनकार कर दिया था।

ट्रंप के इस पिछले रुख का लाभ उठाते हुए एर्दोगन अब उसी राजनीतिक और कूटनीतिक समझ का हवाला दे रहे हैं। अंकारा का मानना है कि ओबामा काल की गलतियों के कारण पैदा हुए इस संकट का निवारण अब व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप की मौजूदगी के दौरान ही संभव है। एर्दोगन ने सार्वजनिक रूप से ट्रंप का नाम लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति पर नैतिक उत्तरदायित्व डाला है कि वे राष्ट्राध्यक्षों के स्तर पर हुई बातचीत का सम्मान करें और इस सैन्य गतिरोध का सर्वमान्य समाधान निकालें।

## पूर्वी भूमध्य सागर में सैन्य संतुलन और वायुसेना के आधुनिकीकरण की आवश्यकता
तुर्की द्वारा F-35 लड़ाकू विमानों की त्वरित डिलीवरी पर जोर देने का एक मुख्य कारण मध्य पूर्व और पूर्वी भूमध्य सागर क्षेत्र में तेजी से बदलता सैन्य और रणनीतिक संतुलन है। वर्तमान में तुर्की वायुसेना का मुख्य आधार उसके पुराने हो रहे F-16 लड़ाकू विमानों का बेड़ा है। यद्यपि अमेरिका ने तुर्की के F-16 बेड़े को अपग्रेड करने और नए F-16 Block 70 जेट्स की बिक्री को मंजूरी दे दी है, किंतु चौथी पीढ़ी के ये विमान पांचवीं पीढ़ी के F-35 की स्टील्थ क्षमता और युद्धक्षेत्र नेटवर्क एकीकरण का मुकाबला नहीं कर सकते।

तुर्की की चिंताएं उसके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों की सैन्य तैयारियों से जुड़ी हैं। तुर्की का पड़ोसी देश ग्रीस अमेरिका से F-35 स्टील्थ जेट्स खरीदने की प्रक्रिया में अंतिम चरणों तक पहुंच चुका है। वहीं, इजराइल रक्षा बलों के पास पहले से ही F-35 फाइटर जेट्स के कई आधुनिक स्क्वाड्रन सक्रिय ड्यूटी पर तैनात हैं। यदि ग्रीस और इजराइल दोनों के पास पांचवीं पीढ़ी की स्टील्थ क्षमता आ जाती है और तुर्की इससे वंचित रहता है, तो पूर्वी भूमध्य सागर के हवाई क्षेत्र में अंकारा की रणनीतिक बढ़त और वायु श्रेष्ठता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।

## वाशिंगटन के सामने रणनीतिक विकल्प और पेंटागन की शर्तें
वर्तमान परिस्थिति में निर्णय लेने की जिम्मेदारी पूरी तरह से वाशिंगटन और डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के पाले में है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन के लिए इस गतिरोध को समाप्त करना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है। पेंटागन, अमेरिकी विदेश विभाग और कांग्रेस के नीति निर्माता इस बात पर कायम हैं कि जब तक तुर्की की धरती पर रूसी S-400 मिसाइल प्रणाली तैनात रहेगी, तब तक उसे F-35 जैसी अति-संवेदनशील तकनीक नहीं सौंपी जा सकती।

तुर्की और अमेरिका के बीच जारी यह तनातनी नाटो के भीतर रणनीतिक संबंधों की जटिलता को उजागर करती है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिकी प्रशासन S-400 के संबंध में कोई तकनीकी या कूटनीतिक समझौता तलाश पाता है या फिर तुर्की को 1.4 अरब डॉलर का वित्तीय हर्जाना देकर इस बहुचर्चित विवाद का पटाक्षेप करता है।

## इसका आप पर असर
**भारत और वैश्विक स्तर पर:** तुर्की, अमेरिका और रूस के बीच यह कूटनीतिक तनातनी वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला और नाटो के सैन्य संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

**अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में:** S-400 और F-35 जैसे प्रमुख हथियार प्रणालियों पर सख्त अमेरिकी रुख से अन्य देश भी अपनी रणनीतिक खरीदारी को लेकर सतर्क हो रहे हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. तुर्की F-35 फाइटर जेट्स की मांग क्यों कर रहा है?
तुर्की F-35 प्रोजेक्ट का ओरिजिनल पार्टनर देश था, जिसने इसके निर्माण में अरबों डॉलर का निवेश किया था और 1.4 अरब डॉलर का एडवांस भुगतान किया था।

### 2. अमेरिका ने तुर्की को F-35 प्रोग्राम से बाहर क्यों किया?
साल 2019 में तुर्की द्वारा रूस से S-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम खरीदने के बाद अमेरिका ने सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर तुर्की को प्रोजेक्ट से बाहर कर दिया था।

### 3. S-400 मिसाइल सिस्टम से अमेरिका को क्या ऐतराज था?
वाशिंगटन को डर था कि S-400 के रडार F-35 की गुप्त स्टील्थ तकनीक का संवेदनशील डेटा इकट्ठा कर सकते हैं, जो रूस के हाथ लग सकता है।

### 4. एर्दोगन ने डोनाल्ड ट्रंप को लेकर क्या बयान दिया है?
एक साक्षात्कार में एर्दोगन ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ने उनसे F-35 जेट्स देने का वादा किया था और तुर्की अब उस वादे के पूरा होने का इंतजार कर रहा है।

### 5. तुर्की के पास F-35 हासिल करने का क्या कानूनी तर्क है?
तुर्की का कहना है कि उसने जिन फाइटर जेट्स के लिए 1.4 अरब डॉलर चुकाए हैं, वे उसे सौंपे जाएं या फिर उसकी पूरी राशि ब्याज समेत लौटाई जाए।

### 6. क्या तुर्की में F-35 के कलपुर्जे भी बनते थे?
हां, तुर्की की रक्षा कंपनियां लैंडिंग गियर, कॉकपिट डिस्प्ले और बॉडी स्ट्रक्चर समेत 900 से अधिक महत्वपूर्ण कलपुर्जों का निर्माण करती थीं।

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