7 जुलाई को बुध ग्रह वक्री चाल में कर्क राशि छोड़कर मिथुन राशि में प्रवेश करने जा रहा है। इस राशि परिवर्तन के साथ ही बुध और गुरु के बीच एक खास ज्योतिषीय स्थिति बनेगी, जिसे द्विद्वादश योग कहा जाता है। दरअसल गुरु ग्रह बुध से दूसरे भाव में बैठेंगे, जबकि बुध ग्रह गुरु से बारहवें भाव में स्थित होंगे। ज्योतिष के अनुसार यह संयोग तीन राशियों, मिथुन, कन्या और तुला के जीवन में बड़ा असर डाल सकता है। इन राशियों के जातकों को परिवार और पैसों से जुड़े मामलों में सुधार दिख सकता है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में सतर्क रहने की भी जरूरत होगी।
मिथुन राशि वालों का करियर चमकेगा
मिथुन राशि का स्वामी ग्रह बुध खुद है, इसलिए बुध का अपनी ही राशि में लौटना इस राशि के जातकों के लिए काफी शुभ माना जा रहा है। करियर में नई उपलब्धियां मिलने के आसार हैं और मनचाही जगह पर नौकरी पाने के योग भी बन रहे हैं। वैवाहिक जीवन में भी सुखद बदलाव दिख सकते हैं, पति-पत्नी के बीच नजदीकियां बढ़ने की संभावना है। हालांकि इस दौरान खर्चों पर नियंत्रण रखना जरूरी होगा वरना बजट गड़बड़ा सकता है। मिथुन राशि के विद्यार्थियों के लिए भी यह समय अच्छा रहेगा, पढ़ाई में मन लगेगा और एकाग्रता बढ़ेगी।
कन्या राशि वालों को पैतृक संपत्ति से फायदा
कन्या राशि का स्वामी ग्रह भी बुध ही है, इसलिए बुध के राशि परिवर्तन और गुरु के साथ बनने वाले द्विद्वादश योग का असर इस राशि पर भी साफ दिखेगा। बीते समय में की गई मेहनत का अच्छा फल करियर में मिल सकता है। लेकिन अगर अतीत में कोई गलती हुई है, तो सीनियर्स की नाराजगी या बातें सुनने की नौबत भी आ सकती है। जो लोग अभी बेरोजगार हैं, उनके लिए नौकरी मिलने के मौके बन रहे हैं। इसके अलावा इस दौरान पैतृक संपत्ति से जुड़ा कोई लाभ भी मिल सकता है।
तुला राशि वालों के लिए विदेश यात्रा और नए कारोबार के योग
तुला राशि के जातकों के लिए यह द्विद्वादश योग भाग्यशाली साबित हो सकता है। भाग्य भाव में बुध और कर्म भाव में गुरु की मौजूदगी कई सकारात्मक बदलाव ला सकती है। जिन लोगों का सपना विदेश में नौकरी करने का था, वह पूरा हो सकता है। कुछ जातक अपना नया कारोबार शुरू करने में भी कामयाब हो सकते हैं। परिवार के साथ रिश्ते बेहतर होंगे और घर में सबके साथ अच्छा वक्त बीतेगा। हालांकि इस राशि के लोगों को अपनी सेहत का खास ध्यान रखने की सलाह दी गई है।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है।)













