बॉलीवुड डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा एक बार फिर अपने बेबाक बयान की वजह से सुर्खियों में हैं। वह हमेशा से अपनी बात बिना लाग लपेट के रखने के लिए जाने जाते हैं और इस बार उन्होंने सीधे सेंसर बोर्ड को ही निशाने पर ले लिया है। सोशल मीडिया पर एक लंबा नोट लिखते हुए राम गोपाल वर्मा ने साफ कहा कि वह फिल्मों में सेंसर बोर्ड की कैंची चलाने के सख्त खिलाफ हैं और उनका मानना है कि इस बोर्ड को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहिए।
वोट देने का हक है तो फिल्म चुनने का क्यों नहीं
अपने पोस्ट में राम गोपाल वर्मा ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया। उनका कहना है कि जिन युवाओं को अपने देश की सरकार चुनने, यानी वोट डालने का पूरा अधिकार मिला हुआ है, उन्हीं युवाओं को यह तय करने का अधिकार क्यों नहीं दिया जाता कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं। कुछ दिन पहले ही राम गोपाल वर्मा फरहान अख्तर की फिल्म डॉन 3 को लेकर छिड़े विवाद में रणवीर सिंह के समर्थन में सामने आए थे, और अब उन्होंने अपना गुस्सा सीधे सेंसर व्यवस्था पर उतार दिया है।
सेंसरशिप दर्शकों का अपमान है
राम गोपाल वर्मा ने X पर लिखा कि फिल्मों पर सेंसरशिप थोपना असल में दर्शकों की समझदारी का अपमान करने जैसा है। उन्होंने लिखा कि स्मार्टफोन और ग्लोबल स्ट्रीमिंग के इस दौर में यह सोचना ही पुराना खयाल है कि दर्शकों को किसी सच्चाई तक पहुंचने से रोका जा सकता है। उनके मुताबिक असली पाखंड यही है कि बालिगों को देश का नेता चुनने, अपना बिजनेस चलाने और परिवार पालने के लायक तो समझा जाता है, लेकिन यह तय करने के लायक नहीं समझा जाता कि उन्हें क्या देखना है और क्या नहीं। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार बालिगों को वोट डालने जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंपती है, तो दूसरी तरफ यह मान लिया जाता है कि एक फिल्म देखकर वही इंसान बिगड़ जाएगा। उनके शब्दों में यह समाज की सुरक्षा करना नहीं, बल्कि उसे बच्चा समझने जैसा रवैया है।
18 साल का शख्स समझदार है, किसी कमेटी की जरूरत नहीं
राम गोपाल वर्मा ने आगे लिखा कि जब 18 साल की उम्र का कोई व्यक्ति अपना नेता चुन सकता है, तो उसे यह बताने के लिए किसी अनजान कमेटी की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि कोई गाली सुनकर या कोई सीन देखकर वह बिगड़ जाएगा या नहीं। उन्होंने समझाया कि कोई भी फिल्म असल में एक फिल्ममेकर की नजर से सुनाई गई एक ड्रामैटिक कहानी भर होती है, और उस कहानी से सहमत होना है या नहीं, यह पूरी तरह दर्शकों की अपनी मर्जी पर निर्भर करता है। उन्होंने थिएटर रिलीज के लिए सीन काटने के चलन को हास्यास्पद बताया, क्योंकि बिना कटा हुआ ओरिजिनल वर्जन कुछ ही घंटों के भीतर टोरेंट, टेलीग्राम और तमाम इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर पहुंच जाता है।
ऑब्सेशन के हेड बैंगिंग सीन से दी दलील
अपनी बात को और पुख्ता करने के लिए राम गोपाल वर्मा ने फिल्म ऑब्सेशन के हेड बैंगिंग सीन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि सेंसर बोर्ड ने भले ही इस सीन पर कैंची चलाई हो, लेकिन इंस्टाग्राम रील्स पर इसे उन लोगों की संख्या से करीब 10 गुना ज्यादा लोगों ने देख लिया है, जितनों ने यह फिल्म थिएटर जाकर देखी थी। उनका कहना है कि सेंसरशिप से कुछ भी छिपता नहीं, बल्कि इससे लोगों में उस चीज को लेकर उल्टा उत्सुकता ही बढ़ जाती है। उन्होंने जोड़ा कि एआई टूल्स और पूरी तरह खुले इंटरनेट के इस दौर में कंटेंट पर पाबंदी लगाने की कोशिश करना महज एक मजाक बनकर रह गया है। भाषा, सेंशुएलिटी, हिंसा और विचारधारा को लेकर फिल्मों में की जाने वाली काट-छांट सिनेमा को बेईमान और पाखंडी बना देती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब बच्चे इंटरनेट पर हर तरह की सीमाएं लांघने वाला कंटेंट आसानी से देख लेते हैं, तो सिर्फ फिल्मों के कुछ सीन पर ही इतनी सख्त पाबंदी क्यों लगाई जाती है।
इंडस्ट्री गेटकीपर्स के सामने घुटने टेकना बंद करे
अपने पोस्ट के आखिरी हिस्से में राम गोपाल वर्मा ने कहा कि फिल्मों में काट-छांट की कोई जरूरत ही नहीं है, बल्कि जरूरत सिर्फ इस बात की पारदर्शिता की है कि फिल्म में आखिर है क्या। उनके मुताबिक दर्शकों का सम्मान करते हुए उन्हें ही यह तय करने की आजादी दी जानी चाहिए कि वे क्या देखना चाहते हैं और क्या नहीं। उन्होंने कहा कि सभी फिल्ममेकर्स को उस बेतरतीब अफसरशाही तंत्र के सामने घुटने टेकना बंद कर देना चाहिए, जिसे न तो कला की समझ है और न ही दर्शकों की। उनका कहना है कि जब भी इंडस्ट्री कोई कट स्वीकार करती है या समझौता करती है, तो इससे उन तथाकथित गेटकीपर्स का ही हौसला बढ़ता है जो पूरी इंडस्ट्री को आसान निशाना बनाकर पूरे इकोसिस्टम को कमजोर करते हैं। राम गोपाल वर्मा ने अपनी बात खत्म करते हुए लिखा कि अब वक्त आ गया है कि पूरी इंडस्ट्री एकजुट होकर सेंसर बोर्ड के मौजूदा ढांचे को अदालतों में और सार्वजनिक मंचों पर खुलकर चुनौती दे। उन्होंने अपने पोस्ट के आखिर में सीधा नारा दिया, बैन द सेंसर।











