दक्षिण भारत की पाक परंपरा में कृत्रिम चीनी के बजाय प्राकृतिक और देशी मिठास को हमेशा प्राथमिकता दी जाती रही है। इसी समृद्ध खानपान का एक अहम हिस्सा करुपट्टी है, जिसे ताड़ का गुड़ भी कहा जाता है। कैरेमल चॉकलेट जैसी चमकदार बनावट और खास सौंधी महक वाला यह गुड़ स्वाद में जितना अनूठा है, पोषण के लिहाज से भी उतना ही समृद्ध है। इसमें प्रचुर मात्रा में आयरन और जरूरी खनिज पाए जाते हैं। दक्षिण भारत में कई परिवार करीब 40 वर्षों से अपनी पीढ़ियों पुरानी पारंपरिक विधि का पालन करते हुए पूरी शुद्धता के साथ इस विशेष गुड़ का उत्पादन कर रहे हैं।
तैयार करने के लिए आवश्यक सामग्री
इस देसी गुड़ को बनाने के लिए किसी तरह के रासायनिक तत्वों या कृत्रिम प्रिजर्वेटिव की जरूरत नहीं पड़ती है। इसे तैयार करने के लिए मुख्य रूप से दो ही चीजों का इस्तेमाल होता है
- ताड़ का ताजा मीठा रस: ताड़ के पेड़ों से निकाला गया ताजा प्राकृतिक अर्क, जिसे स्थानीय बोलचाल में पदनीर कहा जाता है।
- पारंपरिक सांचे: गुड़ को मनचाहा आकार देने के लिए सूखे नारियल के आधे कटे खोल या लकड़ी के बने सांचों का इस्तेमाल किया जाता है।
रस निकालने से लेकर गुड़ बनने का पूरा तरीका
करुपट्टी बनाने का काम बेहद सादगी और धैर्य से किया जाता है, जिसमें हर एक चरण पर प्राकृतिक शुद्धता का ख्याल रखा जाता है।
सुबह तड़के रस उतारना और छानना
इस प्रक्रिया की शुरुआत सुबह बहुत जल्दी करीब 5 बजे होती है। कारीगर ताड़ के ऊंचे पेड़ों पर चढ़ते हैं और रात भर में मिट्टी के बर्तनों में जमा हुए ताजे रस को नीचे उतारते हैं। पेड़ से उतारा गया यह ताजा पदनीर सबसे पहले एक बेहद बारीक छलनी से छाना जाता है। इस छनाई से पेड़ के सूखे पत्तों के टुकड़े, रेशे और किसी भी प्रकार के धूल कण पूरी तरह साफ हो जाते हैं।
भट्टी पर धीमी आंच में पकाना
साफ किए गए ताजे रस को मिट्टी के बने बड़े पारंपरिक चूल्हों पर चढ़ी विशाल कढ़ाइयों में डाला जाता है। चूल्हे में ईंधन के रूप में ताड़ के सूखे पत्तों और लकड़ियों का ही उपयोग किया जाता है। तेज आंच पर इस रस को बड़े करछुल की मदद से बिना रुके लगातार चलाया जाता है और यह प्रक्रिया करीब 4 से 5 घंटे तक चलती है। लगातार उबलने के बाद रस धीरे-धीरे गाढ़ा होने लगता है और इसका रंग बदलकर गहरा भूरा हो जाता है। जब यह मिश्रण बिल्कुल गाढ़े कैरेमल जैसा रूप ले लेता है, तब कढ़ाई को आंच से उतार लिया जाता है।
नारियल के खोल में ढलाई और जमना
गर्म और गाढ़े चाशनी रूपी घोल को तुरंत आकार देने के लिए सूखे नारियल के कटे हुए खोलों और लकड़ी के चौकोर सांचों में सावधानी से डाला जाता है। सांचों में ढलने के बाद इसे सामान्य तापमान पर ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है। कुछ ही घंटों में यह मिश्रण ठंडा होकर एकदम ठोस और सख्त रूप ले लेता है, जिससे शुद्ध और प्राकृतिक करुपट्टी तैयार हो जाती है।
पारंपरिक खानपान में इस्तेमाल और स्वास्थ्य लाभ
दक्षिण भारतीय घरों में करुपट्टी केवल एक मिठाई नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के खानपान और घरेलू नुस्खों का अहम हिस्सा है। इसका उपयोग विशेष रूप से सोंठ डालकर बनाई जाने वाली सुक्कू कॉफी, विभिन्न प्रकार की हर्बल चाय और पारंपरिक मिठाइयों में किया जाता है। यह गुड़ पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में मददगार माना जाता है और इसमें मौजूद प्राकृतिक आयरन शरीर में खून की कमी को दूर करने में बेहद सहायक साबित होता है।


















