गन्ने के लहलहाते खेतों से निकलने वाला मीठा गुड़ सदियों से ग्रामीण भारत की सांस्कृतिक पहचान और देहाती खान-पान का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। आधुनिक दौर में भले ही बाजार औद्योगिक चीनी, तरह-तरह की मिठाइयों और फैक्ट्रियों में बने पैकेटबंद उत्पादों से भरा पड़ा हो, लेकिन मिट्टी की सौंधी महक और प्राकृतिक मिठास से भरपूर पारंपरिक गुड़ की मांग आज भी बनी हुई है। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के गांवों में आज भी पारंपरिक भट्टी और कोल्हू के सहारे प्राकृतिक तरीके से गुड़ बनाने की पुरानी विधा जीवित है। स्थानीय किसान जगत नारायण पाठक ने खेत से गन्ने की कटाई से लेकर उसके गाढ़े रस को विभिन्न आकारों में ढालने तक की पूरी विधि को तफसील से समझाया है।
शीत ऋतु की दस्तक और खेत से कोल्हू तक का सफर
सर्दियों का मौसम शुरू होते ही गांवों में गन्ने की कटाई और गुड़ बनाने की गतिविधियां रफ्तार पकड़ लेती हैं। किसान सबसे पहले खेतों से पूरी तरह तैयार गन्ना काटते हैं और फिर उसकी पत्तियों को अलग कर साफ तनों को कोल्हू या पेराई मशीन तक ले जाते हैं। कोल्हू में गन्ने को दबाकर ताजा रस निकाला जाता है। इस निकले हुए कच्चे रस को सीधे इस्तेमाल करने के बजाय बारीक जाली या साफ कपड़े से छाना जाता है ताकि उसमें मौजूद तिनके, मिट्टी या गन्ने के रेशे अलग हो जाएं। साफ किए गए इस रस को फिर भट्टी पर रखे विशाल लोहे के कड़ाह में डाला जाता है। पाठक बताते हैं कि गुड़ की अंतिम गुणवत्ता, उसकी बनावट और मिठास पूरी तरह से गन्ने के रस की स्वच्छता पर निर्भर करती है। रस जितना ज्यादा शुद्ध और ताजा होगा, तैयार गुड़ का रंग और स्वाद भी उतना ही अव्वल दर्जे का होता है।
विशाल कड़ाह में खौलता रस और अशुद्धियों की सफाई
गन्ने के रस से भरा विशालकाय कड़ाह भट्टी की तेज लपटों पर चढ़ाया जाता है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, रस खौलने लगता है। इस उफान के दौरान रस में घुली प्राकृतिक अशुद्धियां और मैल झाग के रूप में सतह पर तैरने लगते हैं। कड़ाह के पास मुस्तैद किसान लंबी डंडी वाले बड़े करछुल की मदद से इस मैल और झाग को लगातार बाहर निकालते रहते हैं। रस को बिना रुके लगातार हिलाना और चलाना बेहद आवश्यक होता है, क्योंकि थोड़ी सी भी असावधानी से रस कड़ाह की तली में चिपक सकता है या जल सकता है, जिससे पूरे गुड़ का स्वाद कड़वा हो सकता है। घंटों तक तेज आंच पर उबलने के कारण रस में मौजूद पानी भाप बनकर उड़ता जाता है और पतला रस धीरे-धीरे गाढ़े चाशनी रूपी द्रव्य में परिवर्तित होने लगता है।
रस का गाढ़ा होना और भेली का निर्माण
कड़ाह में कई घंटों की निरंतर आंच और पकाई के बाद गन्ने का रस अत्यंत सघन और गहरे सुनहरे रंग का हो जाता है। अनुभवी किसान अपनी पुरानी परख से यह भांप लेते हैं कि रस किस बिंदु पर जमने की सटीक स्थिति में पहुंच चुका है। सही वक्त आते ही खौलते गाढ़े रस को कड़ाह से उतारकर एक अलग ठंडे बर्तन या साफ चपटी सतह पर फैलाया जाता है। यहां इसे ठंडा करने के लिए लगातार पलटा और चलाया जाता है, जिससे गुड़ का रंग साफ बने और उसकी बनावट एकदम एकसार हो। जब यह पेस्ट हल्का गुनगुना और बंधने लायक रह जाता है, तब इसे हाथों या सांचों से मनचाहा स्वरूप दिया जाता है। इसे कहीं गोल भेली का आकार मिलता है तो कहीं चौकोर व छोटे टुकड़ों में ढाला जाता है।
ग्रामीण परिवारों की मेहनत और आजीविका का मजबूत जरिया
देसी गुड़ तैयार करने की यह पूरी कवायद केवल एक पाक कला नहीं है, बल्कि इसमें किसानों की कड़ी शारीरिक मेहनत, धूप-धुएं का सामना और पीढ़ियों का तजुर्बा शामिल होता है। खेत में फसल की देखभाल से लेकर, कटाई, कोल्हू चलाने, भारी कड़ाह को घंटों आग पर तपाने तक पूरा परिवार जुटा रहता है। पूरी तरह ठंडा और ठोस हो जाने के बाद यह देशी गुड़ बोरियों व टोकरियों में भरकर स्थानीय हाट-बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाता है। सुल्तानपुर समेत समूचे ग्रामीण अंचल में पारंपरिक गुड़ निर्माण कई मेहनतकश परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार बना हुआ है, जो गन्ने के खेत से शुरू होकर आम जन की थाली में शुद्ध मिठास घोलता है।



















