सर्दियों का मौसम आते ही उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी और समूचे तराई क्षेत्र में ताजी हरी सब्जियों की मांग काफी बढ़ जाती है। इस दौरान स्थानीय मंडियों और हाट बाजारों में पालक, सरसों, बथुआ, मेथी और फूलगोभी की भरमार देखने को मिलती है। अमूमन ज्यादातर रसोईघरों में फूलगोभी के सफेद फूलों से सब्जी या अन्य पकवान बना लिए जाते हैं, लेकिन उसके चारों तरफ लिपटे हुए घने हरे पत्तों को कचरा समझकर सीधे कूड़ेदान में डाल दिया जाता है। बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि गोभी के ये ताजे पत्ते फेंकने के लिए नहीं, बल्कि एक बेहद लजीज और पौष्टिक देसी साग बनाने के काम आते हैं।
गोभी के पत्तों को क्यों न फेंकें
अक्सर जब लोग बाजार से फूलगोभी खरीदकर लाते हैं, तो सब्जी पकाने से पहले वे उसके ऊपरी बड़े और भारी पत्तों को काटकर अलग कर देते हैं। कई घरों में यह मान लिया जाता है कि इन पत्तों का कोई उपयोग नहीं है। यदि पत्ते एकदम ताजे, हरे और कीड़ों से मुक्त हों, तो उनसे झटपट स्वादिष्ट साग तैयार किया जा सकता है। इस तरह के पत्तों से साग तैयार करने के लिए किसी खास या महंगे मसाले की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है। घर की रसोई में रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले सामान्य सूखे मसाले, थोड़ा सा कटा हुआ लहसुन, हरी मिर्च और शुद्ध सरसों तेल के साथ इसे आसानी से पकाया जा सकता है। इसका अनोखा स्वाद चखने के बाद खाने वाले अपनी उंगलियां चाटते रह जाते हैं।
पकाने से पहले इस तरह करें पत्तों की सफाई
गोभी के पत्तों से बढ़िया स्वाद पाने के लिए सबसे अहम चरण उनकी सही तरीके से छंटाई और सफाई करना है। खेतों से सीधे आने के कारण इन पत्तों पर अक्सर चिकनी मिट्टी, धूलकण या छोटे-मोटे कीट चिपके रह सकते हैं। पत्तों को पकाने की तैयारी के बारे में प्राची बताती हैं कि उनके घर जब भी बाजार से फूलगोभी आती है, तो गोभी की मुख्य सब्जी तैयार होने के बाद वे बचे हुए पत्तों से साग बनाती हैं। साग का असली जायका तभी निखरकर आता है जब पत्तों की सफाई पूरी सतर्कता से की जाए।
सफाई के लिए सबसे पहले गोभी के सभी पत्तों को एक-एक करके डंठल से अलग कर लें। इसके बाद जो पत्ते पीले पड़ चुके हों, बहुत ज्यादा गल गए हों या जिन पर किसी तरह के दाग-धब्बे दिख रहे हों, उन्हें चाकू की मदद से काटकर हटा दें। केवल हरे और स्वस्थ पत्तों को ही इस्तेमाल के लिए छांटें। इसके बाद इन चुने हुए पत्तों को गहरे बर्तन में साफ पानी भरकर कम से कम तीन से चार बार अच्छी तरह धोएं ताकि सारी धूल और मिट्टी निकल जाए।
बारीक कटाई और पानी सुखाने का तरीका
पत्तों को धोने के तुरंत बाद काटने की जल्दी न करें। धुले हुए सभी पत्तों को एक बड़ी छलनी या जालीदार बर्तन में कुछ देर के लिए रख दें, ताकि उनमें मौजूद अतिरिक्त पानी पूरी तरह से टपक कर निकल जाए। जब पानी सूख जाए, तब पत्तों को एक साथ रखकर धारदार चाकू से जितना हो सके बारीक-बारीक काट लें। इस दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पत्तों के बीच में जो बहुत मोटी, सख्त या रेशेदार डंठल होती है, उसे काटकर अलग कर देना चाहिए। सख्त डंठल देर से गलती है और साग के मुलायम स्वाद को बिगाड़ सकती है, इसलिए केवल कोमल पत्तों और उनके पतले डंठल को ही काटना बेहतर रहता है।
सरसों तेल और लहसुन के छौंक से तैयार करें साग
बारीक कटे हुए पत्तों को पकाने के लिए गैस चूल्हे पर एक कड़ाही रखें। कड़ाही में एक से दो बड़े चम्मच शुद्ध सरसों का तेल डालें और उसे मध्यम आंच पर गर्म होने दें। सरसों के तेल में बनने के कारण इस साग का देसी स्वाद बेहद लाजवाब आता है। जब तेल से हल्का धुआं उठने लगे, तब इसमें बारीक कटा हुआ लहसुन और हरी मिर्च डाल दें। लहसुन और हरी मिर्च को कुछ सेकंड के लिए तब तक भूनें जब तक कि लहसुन से हल्की खुशबू न आने लगे और उसका रंग हल्का सुनहरा न हो जाए।
लहसुन और मिर्च भुन जाने के बाद कड़ाही में बारीक कटे हुए गोभी के पत्ते डाल दें और कलछी से अच्छी तरह मिला लें। शुरुआत में कुछ देर तक इन्हें खुला ही पकाएं। थोड़ी देर गर्म आंच लगने के बाद इन ताजे पत्तों से अपने आप पानी छूटने लगेगा, जिससे साग अपने ही रस में पकता है। इसके बाद कड़ाही को किसी ढक्कन या प्लेट से ढक दें और धीमी से मध्यम आंच पर करीब 8 से 12 मिनट तक पकने दें।
पकाते समय बरतें यह जरूरी सावधानी
जब साग ढक्कन बंद करके पक रहा हो, तब उसे लगातार ढका हुआ न छोड़ें। बीच-बीच में ढक्कन हटाकर कलछी से साग को उलटते-पलटते रहें। ऐसा करने से साग कड़ाही के तलवे में चिपकेगा नहीं और जलेगा भी नहीं। लगभग 8 से 12 मिनट के भीतर पत्ते पूरी तरह से गलकर एकदम कोमल और मुलायम हो जाएंगे। जब पत्तों का पानी सूख जाए और साग अच्छी तरह पककर तैयार हो जाए, तब गैस बंद कर दें।
किन चीजों के साथ परोसें यह देसी व्यंजन
गोभी के पत्तों से तैयार यह पारंपरिक साग खाने में जितना सादा है, स्वाद में उतना ही बेजोड़ होता है। इसे तवे से उतरी गर्मागर्म रोटी या घी लगे फूले हुए पराठों के साथ परोसने पर इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा कई लोग इसे दोपहर के भोजन में सादे उबले चावल या दाल-चावल के साथ साइड डिश के रूप में खाना भी बेहद पसंद करते हैं। उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सर्दियों की दोपहर में ऐसे पारंपरिक साग भोजन की थाली की जान माने जाते हैं।



















