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लस्ट स्टोरीज 3 रिव्यू (2026): रिश्तों की उलझन, राज और मानवीय इच्छाओं का असरदार एंथोलॉजीमूवी रिव्यू
24 सित॰ 2026, 2:42 pm (1 दिन पहले)· 0

लस्ट स्टोरीज 3 रिव्यू (2026): रिश्तों की उलझन, राज और मानवीय इच्छाओं का असरदार एंथोलॉजी

नेटफ्लिक्स की लोकप्रिय एंथोलॉजी फ्रेंचाइजी अपने तीसरे भाग के साथ लौटी है, जिसमें चार जाने-माने निर्देशकों ने मानवीय इच्छाओं, विवाह और आधुनिक रिश्तों की जटिलताओं को बेहद परिपक्व अंदाज में पेश किया है।

नेटफ्लिक्स की चर्चित एंथोलॉजी सीरीज अपने नए अध्याय के साथ डिजिटल पर्दे पर लौट आई है, और 'लस्ट स्टोरीज 3' रिव्यू इस बात को स्पष्ट करता है कि यह फ्रेंचाइजी अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक परिपक्व, साहसी और प्रयोगात्मक सिनेमाई रूप ले चुकी है। पहले दोनों भागों की व्यापक लोकप्रियता के बाद, इस तीसरे संस्करण में चार अलग-अलग सोच वाले फिल्म निर्माताओं विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज को एक साझा विषय पर अपनी व्यक्तिगत सिनेमाई दृष्टि रखने का मौका मिला है। यह पूरी एंथोलॉजी केवल शारीरिक आकर्षण तक सीमित न रहकर मानवीय चाहतों, दांपत्य जीवन के छिपे तनावों, अकेलेपन और सामाजिक वर्जनाओं को गहराई से टटोलती है। कलाकारों का उम्दा चयन और चारों कहानियों का अनूठा धरातल इसे अब तक का सबसे संतुलित और आकर्षक हिस्सा बनाता है।

चार निर्देशकों का अलग नजरिया और विविध कथा संसार

इस एंथोलॉजी की सबसे मुख्य ताकत इसकी कहानियों का विविधता भरा ताना-बाना है। चारों फिल्मकार दर्शकों को पूरी तरह अलग-अलग कालखंड, माहौल और भावनात्मक स्थितियों में ले जाते हैं। हर कहानी का अपना एक अलग अंदाज और ट्रीटमेंट है, जिससे दर्शक लगातार स्क्रीन से जुड़े रहते हैं।

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विक्रमादित्य मोटवाने का सेगमेंट पार्टनर स्वैपिंग जैसे संवेदनशील और असामान्य विषय को केंद्र में रखता है। राधिका आप्टे, कोंकणा सेन शर्मा, विजय वर्मा और अभिषेक शर्मा के अभिनय से सजी यह कहानी कोरियन फिक्शन की तर्ज पर एक डार्क और रोमांचक मिजाज पेश करती है। इसमें किसी भी तरह का सतहीपन या फूहड़ता नहीं है, बल्कि किरदारों के बीच का मनोवैज्ञानिक खिंचाव कहानी को बेहद स्वाभाविक और बेचैन करने वाला बनाता है।

किरण राव का निर्देशित हिस्सा दर्शकों को एक एकदम अलग, ऊर्जावान और हल्का-फुल्का माहौल देता है। गुरफतेह पीरजादा और सना थम्पी के मुख्य किरदारों वाली यह कहानी ड्रग्स के अवैध कारोबार, मनी लॉन्ड्रिंग और धोखेबाजी के इर्द-गिर्द घूमती है। इसमें डार्क कॉमेडी के साथ ऐसे अप्रत्याशित मोड़ बुने गए हैं जो दर्शकों की उत्सुकता को अंत तक बनाए रखते हैं।

शकुन बत्रा का खंड आधुनिक दौर की शादीशुदा जिंदगी के मानसिक दबाव, थेरेपी सेशंस, पुराने अनसुलझे भावनात्मक बोझ और आकर्षण की जटिलताओं को परत-दर-परत खोलता है। अली फजल और राधिका मदान की मुख्य भूमिकाओं वाली यह कहानी इस बात को रेखांकित करती है कि जब किसी रिश्ते में मानसिक और शारीरिक जरूरतें एक दिशा में नहीं चलतीं, तो वैवाहिक बंधन के भीतर कितनी घुटन और द्वंद्व पैदा हो सकता है।

विशाल भारद्वाज का सेगमेंट दर्शकों को सीधे साल 1987 के दौर में ले जाता है। अदिति राव हैदरी, सिद्धार्थ और गजराज राव के अभिनय से सजा यह पीरियड ड्रामा 1980 के दशक के सामाजिक परिवेश में सेक्स एजुकेशन के विषय को बड़ी खूबसूरती से उठाता है। इस कहानी में न्यूक्लियस वोमिका और बेलाडोना जैसे होम्योपैथिक उपचारों को लेकर रचा गया अनोखा ट्विस्ट इसे बेहद दिलचस्प और ताजा बना देता है।

कलाकारों का दमदार और सधा हुआ अभिनय

अभिनय के मोर्चे पर यह एंथोलॉजी पूरी तरह से अपने मंझे हुए कलाकारों के कंधों पर मजबूती से टिकी है। विक्रमादित्य मोटवाने के हिस्से में कोंकणा सेन शर्मा और विजय वर्मा के बीच की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री और उनकी संवाद अदायगी बेहद प्रभावी है। आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कह जाने की उनकी कला दर्शकों को बांधे रखती है। वहीं राधिका आप्टे ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वह असहज, भारी और पेचीदा किरदारों को पर्दे पर कितनी स्वाभाविकता से जी सकती हैं।

शकुन बत्रा की कहानी में अली फजल और राधिका मदान ने एक बिखरती आधुनिक शादी के आंतरिक दर्द, असहज चुप्पी और भीतर के तूफान को बारीकी से परदे पर उतारा है। दूसरी ओर, किरण राव के युवा केंद्रित सेगमेंट में गुरफतेह पीरजादा और सना थम्पी की ताजगी भरी ऊर्जा स्क्रीन पर साफ झलकती है। दोनों ने आधुनिक युवाओं के तौर-तरीकों और अपराध की दुनिया के बीच फंसे पात्रों को बेहतरीन तरीके से निभाया है।

विशाल भारद्वाज के 1987 वाले हिस्से में गजराज राव का काम लाजवाब है। उन्होंने गंभीर अभिनय और सटीक कॉमिक टाइमिंग के बीच एक बेहतरीन तालमेल बिठाया है। अदिति राव हैदरी अपनी पारंपरिक सादगी और सम्मोहक उपस्थिति से दृश्य को समृद्ध करती हैं, जबकि सिद्धार्थ ने अपने किरदार के सभी रंगों को पूरी ईमानदारी से जिया है।

निर्देशन, कैमरा और विजुअल क्राफ्ट

चार अलग-अलग निर्देशकों का एक ही साझा विषय पर काम करना और प्रत्येक लघु फिल्म को अपनी अनूठी पहचान देना एक चुनौतीपूर्ण काम होता है, लेकिन इस एंथोलॉजी में सभी निर्देशक अपने शिल्प में खरे उतरे हैं। विक्रमादित्य मोटवाने ने बोल्ड और संवेदनशील विषय को बिना किसी अश्लीलता के गंभीर थ्रिलर का रूप दिया है। किरण राव का निर्देशन काफी तेज, चुस्त और मनोरंजक है, जो डार्क कॉमेडी की दुनिया को सहजता से पेश करता है। शकुन बत्रा रिश्तों की बारीक उलझनों को पर्दे पर उकेरने के अपने खास हुनर को यहां भी दोहराते हैं, जबकि विशाल भारद्वाज का 1987 के बैकड्रॉप में होम्योपैथी और यौन शिक्षा को जोड़ने का सिनेमाई अंदाज बेहद अनोखा और साहसिक है।

तकनीकी रूप से फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट काफी समृद्ध है। चारों कहानियों का कैमरावर्क और कलर पैलेट उनकी थीम के अनुसार बिल्कुल अलग रखा गया है। विक्रमादित्य के हिस्से में डार्क और मूडी शेड्स का उपयोग पात्रों के बीच चल रहे अंदरूनी तनाव को दिखाता है। किरण राव के सेगमेंट में चटक और जीवंत रंग युवाओं की स्वच्छंद ऊर्जा को दर्शाते हैं। शकुन बत्रा के निर्देशन में बेहद सजीव और अंतरंग लाइटिंग का प्रयोग किया गया है, जबकि विशाल भारद्वाज के हिस्से में विंटेज 80s के टोन का इस्तेमाल हुआ है जो दर्शकों को चार दशक पुराने समय की स्मृतियों में ले जाता है।

बैकग्राउंड स्कोर और संगीत का जादू

एंथोलॉजी का बैकग्राउंड स्कोर हर कहानी के उतार-चढ़ाव को खूबसूरती से सहारा देता है। विशाल भारद्वाज के सेगमेंट में उनका खुद का तैयार किया गया संगीत शास्त्रीय धुनों और लोक संगीत का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है, जो 1987 के दौर के माहौल को पूरी प्रामाणिकता के साथ जिंदा कर देता है। अन्य निर्देशकों के हिस्सों में भी बैकग्राउंड म्यूजिक अनावश्यक रूप से लाउड नहीं होता, बल्कि दृश्यों के सस्पेंस, थ्रिल और रोमांस के पलों में पात्रों की भावनाओं को गहराई देने का काम करता है। इसका साउंड डिजाइन बेहद बारीकी और संवेदनशीलता के साथ तैयार किया गया है।

कमी और स्क्रीनप्ले की सीमाएं

अपनी तमाम खूबियों के बावजूद, इस एंथोलॉजी में कुछ स्पष्ट कमजोरियां भी देखने को मिलती हैं। चारों कहानियां दर्शकों पर एक समान असर नहीं छोड़ पातीं। जहां मोटवाने और भारद्वाज के हिस्से दर्शकों के जेहन में लंबे समय तक दर्ज रहते हैं, वहीं शकुन बत्रा का ड्रामा कई जगहों पर अपनी गति खो देता है और कुछ हद तक दोहराव भरा महसूस होता है। आधुनिक रिश्तों की उलझनें सुलझाते हुए स्क्रीनप्ले की रफ्तार जरूरत से ज्यादा धीमी हो जाती है। इसके अलावा, किरण राव के क्राइम-कॉमेडी सेगमेंट में कुछ ऐसे उतार-चढ़ाव हैं जिनका पूर्वाभास सतर्क दर्शकों को पहले ही हो जाता है।

अंतिम फैसला

समग्र रूप से देखा जाए तो यह एंथोलॉजी केवल सनसनी फैलाने के बजाय इंसानी रिश्तों की अनकही परतों, वैवाहिक जीवन की खट्टी-मीठी सच्चाईयों, अकेलेपन और बुनियादी इच्छाओं को गहराई से समझने की एक परिपक्व कोशिश है। बेहतरीन अभिनय, शानदार निर्देशन और विजुअल विविधता के चलते यह इस पूरी फ्रेंचाइजी का अब तक का सबसे प्रभावशाली प्रयास बनकर उभरता है।

सवाल-जवाब

क्या लस्ट स्टोरीज 3 देखने लायक है?
हां, यदि आप परिपक्व ड्रामा, बेहतरीन अभिनय और विक्रमादित्य मोटवाने तथा विशाल भारद्वाज जैसे निर्देशकों के अनूठे सिनेमाई प्रयोगों को पसंद करते हैं, तो यह एंथोलॉजी देखने लायक है।
लस्ट स्टोरीज 3 में कौन-कौन से निर्देशक शामिल हैं?
इस एंथोलॉजी में चार प्रमुख निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज शामिल हैं।
लस्ट स्टोरीज 3 जैसी और कौन सी फिल्में हैं?
लस्ट स्टोरीज और लस्ट स्टोरीज 2 के अलावा, बॉम्बे टॉकीज और अजीब दास्तान्स जैसी एंथोलॉजी फिल्में इसी तरह के बहु-निर्देशकीय फॉर्मेट पर आधारित हैं।
विक्रमादित्य मोटवाने के सेगमेंट की कहानी किस बारे में है?
उनका सेगमेंट पार्टनर स्वैपिंग के संवेदनशील विषय पर आधारित है, जिसे कोरियन थ्रिलर के अंदाज में डार्क और तनावपूर्ण तरीके से पेश किया गया है।
विशाल भारद्वाज की कहानी का बैकड्रॉप क्या है?
उनकी कहानी 1987 के दौर में सेट है और इसमें सेक्स एजुकेशन के विषय को न्यूक्लियस वोमिका और बेलाडोना जैसे होम्योपैथिक इलाज के दिलचस्प ट्विस्ट के साथ दिखाया गया है।
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