राजस्थान के थार मरुस्थल के करीब बसा पाली शहर आज देशभर में कपड़ों की रंगाई, छपाई और सूती वस्त्र निर्माण के प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता है। लेकिन इस पूरे औद्योगिक परिदृश्य की आधारशिला दशकों पहले रखी गई थी। वर्ष 1939 में मारवाड़ रियासत के तत्कालीन महाराजा उम्मेद सिंह और जाने-माने उद्योगपति रामकुंवर-मुगनीराम बांगड़ ने मिलकर एक ऐसी कपड़ा मिल की नींव रखी, जिसने राजस्थान के आर्थिक इतिहास की दिशा ही बदल दी। उस दौर में जब राज्य में भारी उद्योगों की भारी कमी थी, तब पाली में एक वृहद सूती वस्त्र कारखाने की स्थापना करना किसी औद्योगिक क्रांति से कम नहीं था। आज महाराजा श्री उम्मेद मिल केवल एक कारखाना नहीं, बल्कि पाली के गौरवशाली अतीत और वर्तमान औद्योगिक आत्मनिर्भरता की जीवित मिसाल है।
मारवाड़ में औद्योगिक क्रांति का आगाज: उम्मेद मिल की नींव
इस ऐतिहासिक औद्योगिक यात्रा का औपचारिक शुभारंभ 1939 से 1942 के मध्य हुआ था। उस समय रियासत की प्रशासनिक राजधानी जोधपुर में औद्योगिक बुनियादी ढांचे और पर्याप्त जल संसाधनों की सीमित उपलब्धता थी। इसके विपरीत, पाली भौगोलिक रूप से जवाई बांध के जल संग्रहण क्षेत्र और जलापूर्ति व्यवस्था के निकट स्थित था। इसी कारण महाराजा उम्मेद सिंह ने कपड़ा उद्योग स्थापित करने के लिए जोधपुर के बजाय पाली का चयन किया। वर्ष 1942 में 'महाराजा उम्मेद मिल्स लिमिटेड' के नाम से व्यावसायिक उत्पादन की प्रक्रिया गति पकड़ने लगी। इस मिल की सफलता ने यह साबित कर दिया कि मारवाड़ की शुष्क भूमि पर भी वृहद विनिर्माण उद्योग सफलतापूर्वक चलाए जा सकते हैं।
कच्चे कपास से कपड़ों तक: एक ही छत के नीचे संपूर्ण उत्पादन
महाराजा श्री उम्मेद मिल की सबसे बड़ी खासियत इसका एकीकृत या कम्पोजिट ढांचा रहा है। राजस्थान की इस सबसे पुरानी और विशाल मिल परिसर के भीतर कच्चे कपास की आवक से लेकर धागे की कताई और अंतिम रूप से तैयार कपड़े की बुनाई तक की तमाम प्रक्रियाएं एक साथ संचालित की जाती हैं। मिल में तैयार होने वाले सूती धागे की गुणवत्ता इतनी उत्कृष्ट रही है कि देश के विभिन्न राज्यों के अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी इसकी भारी मांग रही। इसके अलावा, मिल द्वारा उत्पादित 'लिली' और 'रूपमती' जैसे सूती कपड़ों के ब्रांड ने भारतीय परिधान बाजार में दशकों तक अपनी मजबूत धाक जमाए रखी।
कुटीर उद्योग से टेक्सटाइल हब बनने तक का सफर
उम्मेद मिल की अभूतपूर्व सफलता ने स्थानीय निवासियों और व्यापारियों में नया आत्मविश्वास भरा। मिल के चालू होने के बाद पाली के घर-घर में कपड़ा रंगाई और छपाई का काम कुटीर उद्योग के रूप में पनपने लगा। शुरुआत में पाली में मुख्य रूप से पारंपरिक राजस्थानी साफे (पगड़ियां) और महीन मलमल का कपड़ा तैयार किया जाता था। हालांकि, बाजार की मांग और फैशन के बदलते रुझानों के साथ यहां के उद्यमियों ने अपने उत्पादों का दायरा बढ़ाया। आज पाली में पारंपरिक मलमल के साथ-साथ सलवार-सूट, आधुनिक कॉटन फैब्रिक और कई तरह के डिजाइनर परिधानों का बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाता है।
मुंबई की चुनौती और स्वदेशी रंग तकनीक की खोज
जब पाली में पक्के रंगों से कपड़े की रंगाई और छपाई का काम तेजी से बढ़ा, तब इसे मुंबई की स्थापित पावर प्रोसेस मिलों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। मुंबई के कपड़ा उद्योगपतियों का केंद्रीय राजनीति और व्यापार नीति पर गहरा प्रभाव था, जिसके कारण पाली के नवोदित कपड़ा उद्योग के सामने कई व्यापारिक रुकावटें खड़ी की गईं। लेकिन पाली के स्थानीय उद्यमियों ने हार मानने के बजाय नवाचार का रास्ता चुना। उन्होंने स्थानीय रंगरेजों के साथ मिलकर काम किया और लगभग 80 प्रतिशत पक्के रंग स्थानीय स्तर पर ही तैयार करने की तकनीक विकसित कर ली। स्वदेशी तकनीक से तैयार इन रंगों ने उत्पादन लागत में भारी कमी की, जिससे पाली का कपड़ा बाजार मुंबई के बड़े मिलों के सामने मजबूती से टिक सका। वर्तमान में पाली के उद्यमी गुजरात के सूरत शहर में बनने वाली कपड़ों की विविध किस्मों और डिजाइनों को स्थानीय स्तर पर तैयार कर सूरत के बाजार को सीधी टक्कर दे रहे हैं।
पाली में टेक्सटाइल क्रांति के ऐतिहासिक पड़ाव और दिग्गज नाम
पाली के कपड़ा उद्योग के विकास क्रम में वर्ष 1947 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। देश की आजादी के समय पाली के प्यारा चौक में छीपा अल्लाबख्श थुली वाला ने 5 मीटर लंबी टेबलों पर 'घाघरापाट' की छपाई का काम शुरू किया। बाद में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए 15 मीटर और 42 मीटर लंबी विशाल प्रिंटिंग टेबलें लगाई गईं। उस समय लकड़ी के ढोल में कांजी और कच्चे रंगों का इस्तेमाल कर हाथों से रंगाई की जाती थी।
इसके बाद तकनीकी आधुनिकता का दौर शुरू हुआ, जब स्वर्गीय समीरमल लोढ़ा ने अहमदाबाद और मुंबई के कपड़ा प्रसंस्करण संयंत्रों का अध्ययन करने के बाद पाली में पहली 'जिगर' (Jigger Machine) स्थापित की। इस नई तकनीक ने कपड़े की प्रोसेसिंग की गति और गुणवत्ता को अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंचा दिया। समीरमल लोढ़ा के इस दूरदर्शी कदम के बाद मदनलाल धोका, बाबूलाल कोठारी, मदनभाई रंगरेज, नियामत भाई, रूपचंद बलाई, भंवरलाल संचेती और अमरचंद गादिया जैसे कई साहसी उद्यमियों ने अपनी-अपनी विनिर्माण इकाइयां स्थापित कीं। इन सभी दिग्गजों के प्रयासों से पाली की गलियों से शुरू हुआ यह कारोबार आज देश भर में अपनी विश्वसनीयता की छाप छोड़ चुका है।
आधुनिक दौर, घटती कार्यबल और 'जीरो लिक्विड डिस्चार्ज' तकनीक
दशकों के इस सफर में उम्मेद मिल ने कई आर्थिक उतार-चढ़ाव, श्रमिक आंदोलनों और वैश्विक मंदी के दौर देखे हैं। एक समय ऐसा था जब इस विशाल मिल परिसर में 3,500 से अधिक कर्मचारी और श्रमिक एक साथ काम करते थे। हालांकि, समय के साथ बढ़ती महंगाई के बीच वेतन वृद्धि से जुड़ी समस्याओं और फिर स्वचालित आधुनिक मशीनों के आगमन के कारण कार्यबल में कमी आती गई। वर्तमान में एलएन बांगड़ ग्रुप के कुशल प्रबंधन के तहत यह मिल संचालित हो रही है, जहां लगभग 2,100 से 2,200 श्रमिक तीन अलग-अलग पारियों (शिफ्टों) में कार्य करते हैं।
प्रतिस्पर्धा के इस आधुनिक दौर में मिल प्रबंधन ने उच्च तकनीक वाली स्पिनिंग और वीविंग मशीनों को शामिल किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण संरक्षण और जल संसाधनों के पुनर्चक्रण को प्राथमिकता देते हुए आधुनिक 'जीरो लिक्विड डिस्चार्ज' (ZLD) संयंत्र स्थापित किए गए हैं। यह संयंत्र शोधित जल का शत-प्रतिशत पुनरू उपयोग सुनिश्चित करता है। आज भी पाली क्षितिज पर उम्मेद मिल की गगनचुंबी चिमनी से निकलता धुआं इस बात का गवाह है कि मारवाड़ का यह ऐतिहासिक औद्योगिक स्तंभ कल भी प्रासंगिक था और आज भी पाली की पहचान का आधार बना हुआ है।





















