ब्रिटेन के ऑक्सफोर्डशायर स्थित बिस्टर शहर में द कूपर स्कूल की कम उम्र छात्राओं ने एक अनोखा और साहसिक अभियान शुरू किया है। लिटिल फेमिनिस्ट बुक क्लब की सदस्य 14 और 15 वर्ष की चार छात्राओं मे, आयलिन, रोज और विलो ने वयस्क सामग्री में स्कूली परिधानों के निरूपण और बढ़ते व्यवसायीकरण के खिलाफ ऑनलाइन याचिका दायर की है। इन छात्राओं का कहना है कि उनकी रोजमर्रा की पोशाक को कामुक रूप में पेश किए जाने से वास्तविक जीवन में उनका बाहर निकलना और सुरक्षित महसूस करना कठिन होता जा रहा है।
छात्राओं की व्यथा और याचिका की मुख्य मांगें
इस याचिका को शुरू हुए कुछ ही समय बीता है और इस पर 647 से अधिक लोग अपने हस्ताक्षर कर चुके हैं। याचिका में सीधे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने की अपील की गई है। इसमें कहा गया है कि वयस्क सामग्री में स्कूल यूनिफॉर्म का प्रदर्शन एक नाबालिग बच्चे का अनुकरण करने के उद्देश्य से किया जाता है, जो पूरी तरह से घृणास्पद और अनुचित है। छात्राएं चाहती हैं कि जिस पोशाक को उनके स्कूल और समाज में सुरक्षा तथा समानता का प्रतीक माना जाता है, उसे अश्लील उद्योग में वस्तु की तरह इस्तेमाल करने पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध लगाया जाए।
अपनी आपबीती साझा करते हुए 15 वर्षीय रोज ने बताया कि उन्हें स्कूल से घर लौटते समय अपनी यूनिफॉर्म पहनकर सफर करने से बेहद डर और नफरत महसूस होती है। रोज के अनुसार, यह समस्या कपड़े के सहज होने या न होने की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि सड़क पर लोग उस पोशाक को किस नजर से देखते हैं। रोज ने कहा कि विशेष रूप से स्कर्ट पहनने को लेकर उनके मन में इस कदर असुरक्षा भर गई है कि अब उन्होंने स्कूल स्कर्ट पहनना पूरी तरह बंद कर दिया है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ता यूनिफॉर्म का व्यवसायीकरण
वयस्क मनोरंजन उद्योग और सोशल मीडिया नेटवर्क पर स्कूली छात्राओं के रूप में पोशाक पहनकर सामग्री बनाना बेहद आम हो गया है। उदाहरण के लिए, जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर 'स्कूलगर्ल' शब्द खोजा जाता है, तो शीर्ष परिणाम अश्लील वीडियो के आते हैं। इन वीडियो में कम उम्र जैसी दिखने वाली युवतियां यूनिफॉर्म उतारती हुई दिखाई देती हैं या अश्लील पोशाक पहने नजर आती हैं। इन शीर्ष वीडियो को सामूहिक रूप से 50,000 से अधिक बार देखा जा चुका है।
डिजिटल दुनिया के अन्य कोनों में भी यही स्थिति बनी हुई है। ऑनलाइन चर्चा मंच रेडिट पर स्कूलगर्ल विषय से जुड़े सात से अधिक प्रमुख वयस्क समुदाय मौजूद हैं। इन प्लेटफॉर्म्स और सब-रेडिट्स पर प्रति सप्ताह लगभग 3,06,000 आगंतुक आते हैं। इसके अतिरिक्त, पारंपरिक प्रसारण माध्यमों में भी ऐसे मामलों पर विवाद खड़ा हुआ है, जैसे हाल ही में बॉनी ब्लू से जुड़े चैनल 4 के वृत्तचित्र में पोर्न कलाकारों को कक्षा के माहौल में युवा दिखने वाले मॉडल के साथ स्कूल यूनिफॉर्म में दिखाया गया था।
वास्तविक जीवन में उत्पीड़न और आंकड़े
इंटरनेट पर स्कूली पोशाक का यह कामुकीकरण केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आम जीवन में लड़कियों की सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है। प्लान इंटरनेशनल द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, ब्रिटेन में 14 से 21 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 58 प्रतिशत युवतियों और किशोरियों ने अपने शिक्षण संस्थान या उसके आसपास यौन उत्पीड़न का सामना किया है।
इन आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि सार्वजनिक स्थानों पर किशोरियों को कई तरह की प्रताड़ना सहनी पड़ती है। सर्वेक्षण में शामिल 26 प्रतिशत लड़कियों ने बताया कि उन पर फब्तियां कसी गईं और सीटी बजाई गई, जबकि 22 प्रतिशत को अवांछित यौन टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, 12 प्रतिशत छात्राओं का पीछा किया गया और 10 प्रतिशत को जबरन छूने या पकड़ने की कोशिश की गई।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण और सहमति की कानूनी सीमा
बीएसीपी पंजीकृत मनोचिकित्सक अमांडा मैकडोनाल्ड ने इस बात पर जोर दिया है कि वयस्क सामग्री में स्कूल यूनिफॉर्म के प्रयोग पर रोक क्यों बेहद आवश्यक है। ब्रिटेन की व्यवस्था में अगर कोई व्यक्ति स्कूल यूनिफॉर्म पहने हुए है, तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि वह व्यक्ति सहमति की कानूनी उम्र यानी 16 वर्ष से कम आयु का है। ब्रिटेन के अधिकांश स्कूलों में सिक्स्थ फॉर्म (16 से 18 वर्ष की आयु) के लिए यूनिफॉर्म का नियम लागू नहीं होता, और यदि होता भी है तो इस आयु वर्ग का कामुकीकरण करना भी सर्वथा अनुचित है।
अमांडा मैकडोनाल्ड का कहना है कि जब हम जानते हैं कि यह पोशाक नाबालिगों से जुड़ी है जो कानूनन यौन संबंधों के लिए सहमति देने में असमर्थ हैं, तो बालिगों को ऐसी किसी भी सामग्री का निर्माण या उपभोग नहीं करना चाहिए जो नाबालिगों से संबंधित हो। उनका मानना है कि जो लोग वयस्क सामग्री का निर्माण करते हैं, उनकी यह जिम्मेदारी बनती है कि वे समझें कि उनकी सामग्री समाज में किस प्रकार की सोच को बढ़ावा दे रही है।
कानूनी पेंच और भविष्य के नियम
हालांकि ब्रिटेन में जल्द ही एक नया कानून लागू होने वाला है जिसके तहत किसी बालिग द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चे का नाटक या अनुकरण करते हुए अश्लील सामग्री बनाना या अपने पास रखना जेल की सजा वाला अपराध होगा, लेकिन यूनिफॉर्म का मामला एक कानूनी उलझन बना हुआ है। डरहम यूनिवर्सिटी में कानून की प्रोफेसर और पोर्नोग्राफी कानून सुधारों की प्रमुख अध्येता क्लेयर मैक्ग्लिन ने स्पष्ट किया कि कुछ सिक्स्थ फॉर्म संस्थानों में यूनिफॉर्म होने के कारण कंटेंट निर्माता यह तर्क देकर कानूनी कार्रवाई से बच सकते हैं कि उनकी सामग्री 16 वर्ष से अधिक आयु के छात्रों को दर्शाती है।
इसके बावजूद मनोचिकित्सकों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध से समाज में एक कड़ा संदेश जाएगा। भले ही प्रतिबंध लगाने से अवैध तरीके से सामग्री खोजने वाले पूरी तरह न रुकें, लेकिन कानूनन छूट मिलने से ऐसी चीजें सामान्य मान ली जाती हैं। जब कोई घृणास्पद सामग्री कानूनी होती है, तो लोगों के मन में उसकी गंभीरता खत्म हो जाती है और वे उससे भी अधिक गंभीर अपराधों की ओर बढ़ते हैं। इसके साथ ही विशेषज्ञों ने मांग की है कि बच्चों के प्रति अनुचित यौन रुझान रखने वाले व्यक्तियों के लिए समय रहते चिकित्सीय सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि वे कोई अपराध करने से पहले मदद पा सकें।
सरकारी रुख और बच्चों द्वारा आवाज उठाने की स्थिति
ब्रिटेन में पीड़ितों की सहायता, महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा की रोकथाम तथा अंतरराष्ट्रीय न्याय मंत्री एलेक्स डेविस-जॉन्स ने छात्राओं के इस कदम की सराहना की है। सरकारी प्रतिनिधि के अनुसार, युवा महिलाओं और लड़कियों को अपनी स्कूल यूनिफॉर्म का अश्लीलीकरण देखते हुए बड़ा नहीं होना चाहिए। सरकार का स्पष्ट मानना है कि अश्लील सामग्री को बच्चों के यौन शोषण को सामान्य बनाने या बढ़ावा देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
ब्रिटेन सरकार ने दोहराया है कि वह कानूनों को कड़ा कर रही है ताकि 16 वर्ष से कम उम्र का अनुकरण करने वाली अश्लील सामग्री को संज्ञेय अपराध बनाकर जेल की सजा तय की जा सके। वहीं दूसरी ओर, विशेषज्ञों का कहना है कि यद्यपि 14 और 15 साल की लड़कियों द्वारा अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाना प्रेरणादायक है, लेकिन यह स्थिति दुखद भी है। बच्चों को खुद की सुरक्षा के लिए याचिकाएं नहीं चलानी पड़नी चाहिए, यह बड़ों और नीति निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि वे समाज को सुरक्षित बनाएं।



















