नारियल का पानी पीने या पूजा व भोजन में उसकी गिरी का उपयोग करने के बाद आमतौर पर लोग उसके सख्त बाहरी खोल को कचरा मानकर फेंक देते हैं। आंध्र प्रदेश के रेलवे कोडूर के रहने वाले युवा उद्यमी अव्वारु हरिकृष्ण ने समाज की इसी धारणा को बदलते हुए इस कचरे को एक लाभदायक और पर्यावरण के अनुकूल उद्यम की बुनियाद बना दिया। उन्होंने अपनी रचनात्मक सोच, शिल्प कौशल और लगन से नारियल के इन्हीं बेकार पड़े खोलों का उपयोग करके घरेलू बर्तन, सजावटी वस्तुएं और सांस्कृतिक कलाकृतियां तैयार करने की एक अनूठी पहल शुरू की है। उनका यह प्रयास न केवल प्रकृति के संरक्षण में योगदान दे रहा है, बल्कि स्थानीय कारीगरों के लिए आजीविका का जरिया भी बना है।
कॉलेज के दिनों से थी पर्यावरण हितैषी विचार की तलाश
अव्वारु हरिकृष्ण के मन में कॉलेज की पढ़ाई के समय से ही कुछ लीक से हटकर और प्रकृति के अनुकूल काम करने की तीव्र इच्छा थी। वे लगातार किसी ऐसे व्यावहारिक विचार पर विचार कर रहे थे जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना व्यावसायिक रूप से टिकाऊ साबित हो सके। इसी दौरान एक दिन जब वे अपने भाई के घर पहुंचे, तो उनकी नजर वहां बिखरे पड़े नारियल के कई सूखे खोलों पर पड़ी। आमतौर पर आग जलाने या कूड़े के ढेर में फेंक दिए जाने वाले इन खोलों की मजबूती ने उनका ध्यान खींचा। उन्होंने विचार किया कि क्या इन प्राकृतिक खोलों को तराशकर दैनिक जीवन में काम आने वाली सुंदर और उपयोगी चीजों में ढाला जा सकता है।
बिना किसी देरी के उन्होंने नारियल के रेशों और सख्त खोल पर अपने स्तर पर प्राथमिक परीक्षण आरंभ किए। शुरुआत में साधारण औजारों की मदद से खोलों की कटाई, सतह को चिकना करने के लिए घिसाई और उन्हें अलग-अलग रूप देने का अभ्यास किया गया। कई असफल प्रयासों और निरंतर सुधार के बाद जब पहले कुछ उत्पाद सही स्वरूप में सामने आए, तो इसने एक व्यवस्थित स्टार्टअप की नींव रखी। छोटे स्तर पर शुरू किया गया यह प्रयोग धीरे-धीरे एक सुव्यवस्थित निर्माण प्रक्रिया में बदलता चला गया।
ऑर्गेनिक मेलों से मिली पहचान और तकनीकी नवाचार
शुरुआती उत्पाद तैयार होने के बाद हरिकृष्ण ने सीधे उपभोक्ताओं के बीच जाकर उनकी उपयोगिता परखने की रणनीति बनाई। उन्होंने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के प्रमुख शहरों जैसे तिरुपति, हैदराबाद, नेल्लोर और अराकू घाटी में आयोजित होने वाले जैविक व प्राकृतिक उत्पादों के मेलों में अपने स्टॉल लगाए। इन प्रदर्शनियों में पर्यावरण के प्रति जागरूक ग्राहकों ने नारियल के खोल से बनी कलाकृतियों को हाथों-हाथ लिया और देखते ही देखते उनका सारा बना हुआ स्टॉक समाप्त हो गया। मेलों से मिले इस सकारात्मक प्रतिसाद ने उन्हें इस उद्यम को पूर्णकालिक रूप देने का भरोसा प्रदान किया।
मांग बढ़ने के साथ ही उन्होंने उत्पादन और डिजाइन प्रक्रिया को पेशेवर बनाने के लिए आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लिया। समकालीन बाजार की प्राथमिकताओं, नए कलात्मक डिजाइनों और उपभोक्ताओं की जरूरतों का विश्लेषण करने के लिए तकनीकी माध्यमों का उपयोग किया गया। इसके जरिए वे ऐसे उत्पाद तैयार करने में सफल रहे जो देखने में आकर्षक होने के साथ-साथ टिकाऊ और आधुनिक रसोई के मानकों के सर्वथा अनुकूल हैं।
100 से अधिक उत्पादों की श्रृंखला और सौर ऊर्जा से निर्माण
वर्तमान समय में अव्वारु हरिकृष्ण की इकाई में नारियल के खोल से 100 से भी अधिक प्रकार की विविध वस्तुएं बनाई जा रही हैं। इनमें मुख्य रूप से रसोई के बर्तन शामिल हैं, जैसे सर्विंग बाउल, चम्मच, चाय और कॉफी के कप तथा मसाले सुरक्षित रखने के पारंपरिक जार। इसके अतिरिक्त छोटे बच्चों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित प्राकृतिक फीडिंग चम्मच, घरेलू साज-सज्जा के लिए लैंप शेड, फ्लावर पॉट और दैनिक उपयोग की चाबी के छल्ले भी तैयार किए जा रहे हैं। त्योहारों के मौसम में उनकी बारीक नक्काशी वाली राखियों की विशेष मांग देखी जा रही है, जिसके लिए थोक बाजार से 200 से 300 पीस के ऑर्डर निरंतर मिल रहे हैं।
इस पूरे उद्यम की कार्यप्रणाली को पूरी तरह प्रकृति के अनुकूल रखा गया है। वर्कशॉप में कटाई और घिसाई के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मशीनों को चलाने के लिए मुख्य रूप से सौर ऊर्जा का प्रबंध किया गया है। शून्य कार्बन उत्सर्जन के सिद्धांत पर चलते हुए यह स्टार्टअप सिंगल-यूज प्लास्टिक के बर्तनों का एक सुरक्षित प्राकृतिक विकल्प पेश करता है। हरिकृष्ण का मुख्य लक्ष्य स्थानीय लोगों को इस निर्माण कला से जोड़कर ग्रामीण स्तर पर हरित रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना है।



















