बिहार के जमुई जिले में फतेहपुर गांव की रहने वाली रेखा कुमारी ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों तो जिंदगी की कोई भी रुकावट शिक्षा की राह नहीं रोक सकती। एक समय ऐसा था जब रेखा को पढ़ने की इच्छा जताने पर अपने परिवार से लेकर ससुराल तक में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। उस दौर में पहले पति की प्रताड़ना, तलाक, मां की मौत और सामाजिक तानों ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया था कि उनके मन में आत्महत्या तक का विचार आने लगा था। हालांकि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पूरे दस साल के लंबे अंतराल के बाद आखिरकार 10वीं की परीक्षा पास कर अपने संकल्प को पूरा कर दिखाया। आज वह चार महीने के एक बच्चे की मां हैं और अपनी आगे की पढ़ाई को नई दिशा देने में जुटी हुई हैं।
कम उम्र में निकाह, घरेलू हिंसा और अलगाव का दौर
रेखा का जीवन बचपन से ही सामाजिक दबावों और पुरानी मान्यताओं की भेंट चढ़ गया था। उनका विवाह बहुत कम उम्र में ही कर दिया गया था। साल 2016 में उन्होंने पहली दफा 10वीं की परीक्षा देने की कोशिश की थी। जब उन्होंने आगे पढ़ने की इच्छा जाहिर की, तो उनके पहले पति ने उनका कड़ा विरोध किया। रेखा के साथ लगातार मारपीट की गई, उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया और अंत में पति ने उन्हें तलाक देकर बेसहारा छोड़ दिया।
पहले पति से अलग होने के बाद रेखा पूरी तरह अकेली पड़ गईं और उनकी पढ़ाई का सपना टूटता नजर आने लगा। विवश होकर वह अपने मायके फतेहपुर गांव लौट आईं और वहीं रहने लगीं। इसी मुश्किल दौर में रेखा की मां का भी देहांत हो गया। मां के असमय निधन के गहरे सदमे और पारिवारिक उथल-पुथल की वजह से वह साल 2016 में परीक्षा की समुचित तैयारी नहीं कर पाई थीं, जिसके चलते वह उस वक्त मैट्रिक परीक्षा में सफल नहीं हो सकी थीं।
मायके के तानों और अकेलेपन के बीच फिर जागी उम्मीद
मां के जाने और वैवाहिक जीवन के बिखरने के बाद गांव में रेखा को समाज के तीखे ताने सुनने पड़ते थे। लोग उनके पढ़ने के विचार पर बातें बनाते थे, जिसके कारण वह मानसिक रूप से काफी परेशान रहने लगी थीं। एक वक्त ऐसा भी आया जब निराशा के गहरे भंवर में उन्हें खुद को समाप्त करने का ख्याल सताने लगा था, मगर उन्होंने भीतर से अपनी हिम्मत को बिखरने नहीं दिया।
कुछ वर्षों के बाद रेखा का दूसरा विवाह हुआ। इस नए रिश्ते ने उनके जीवन को एक नया मोड़ दिया, क्योंकि उनके दूसरे पति ने उनकी पढ़ाई की चाहत को समझा और उनका पूरा समर्थन किया। हालांकि मायके और आसपास के लोगों का नकारात्मक रवैया पूरी तरह नहीं बदला और वे तरह-तरह की बातें बनाकर उन पर दबाव डालते रहे। सामाजिक दखल और पारिवारिक कठिनाइयों से बचने के लिए रेखा ने अपने गांव से करीब 20 किलोमीटर दूर जमुई शहर में एक कमरा किराए पर ले लिया और वहीं रहकर अपनी पढ़ाई में जुटने का कठिन फैसला किया।
समग्र सेवा संस्था का सहारा और सेकंड डिवीजन से मिली कामयाबी
जमुई में रहकर पढ़ाई के सफर को आगे बढ़ाने में रेखा को समग्र सेवा संस्था का भरपूर सहयोग मिला। संस्था से जुड़ी शिक्षिका अंबिका कुमारी ने रेखा को परीक्षा की व्यवस्थित तैयारी कराने में अहम भूमिका निभाई। शिक्षिका अंबिका कुमारी के अनुसार रेखा बेहद साहसी महिला हैं, जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच दिन-रात एक करके कड़ी मेहनत की।
करीब दस साल के लंबे इंतजार और संघर्ष के बाद रेखा ने दोबारा मैट्रिक की परीक्षा दी। जब परिणाम आया तो उन्होंने 286 अंक हासिल किए और सेकंड डिवीजन से 10वीं की परीक्षा पास कर ली। मैट्रिक पास करने के बाद अब वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रही हैं। रेखा का अंतिम लक्ष्य पढ़-लिखकर एक शिक्षिका बनना है, ताकि वह अपने गांव की दूसरी लड़कियों को शिक्षित कर सकें और उन्हें पढ़ाई के लिए उन जैसी तकलीफों और रुकावटों का सामना न करना पड़े।



















