जीवन में कब कौन सा मोड़ आ जाए, यह कोई पहले से नहीं जान सकता। उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद की रहने वाली राधा देवी की जिंदगी भी कुछ ऐसे ही अप्रत्याशित उतार चढ़ाव से होकर गुजरी है। कभी उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन पूरे घर की गृहस्थी का बोझ पूरी तरह से उनके ही कंधों पर आ जाएगा। जिस दौर में परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा और आजीविका का संकट खड़ा हो गया, उस कठिन समय में उनके मायके में सीखी गई कला ही सबसे बड़ा सहारा बनी। आज वह अपने दम पर फास्ट फूड सेंटर चलाकर पूरे परिवार का भरण पोषण बहुत ही मजबूती के साथ कर रही हैं।
पिता की आदत और मां के संघर्ष से मिली सीख
राधा देवी के जीवन में संघर्ष का दौर कोई नया नहीं था। उनके बचपन के दिन भी आसान नहीं रहे थे। उनके पिता को शराब पीने की लत थी, जिसकी वजह से घर का आर्थिक ढांचा हमेशा डगमगाया रहता था। ऐसे मुश्किल वक्त में उनकी मां ने हिम्मत नहीं हारी और परिवार का पेट भरने के लिए एक दुकान चलानी शुरू की। राधा देवी अपनी मां का हाथ बंटाने के लिए दुकान के कामों में सहयोग करती थीं। इसी दौरान उन्होंने समोसा, चाउमीन, मोमोज, घाटी और मंचूरियन जैसे लोकप्रिय व्यंजन तैयार करने की कला सीखी। उस समय उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि बचपन में खेल खेल में या मजबूरी में सीखी गई यह पाक कला आगे चलकर उनके ससुराल में जीवन की नैया पार लगाने का जरिया बन जाएगी।
शादी के बाद ससुराल में अचानक गहराया संकट
शादी के बाद जब राधा देवी अपनी ससुराल पहुंचीं, तो उन्हें उम्मीद थी कि अब एक सामान्य और खुशहाल वैवाहिक जीवन बीतेगा। उन्हें लगा था कि एक अच्छा परिवार मिला है, जहां उन्हें घर के कामकाज के अलावा बाहर जाकर कमाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन नियति की योजना कुछ और ही थी। ससुराल आने के कुछ ही समय बाद उनके ससुर गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। अभी परिवार इस संकट से पूरी तरह संभल भी नहीं पाया था कि उनके पति का एक गंभीर सड़क हादसा हो गया।
घर के दोनों प्रमुख कमाने वाले सदस्य एक साथ बिस्तर पर आ गए। इसके चलते न केवल घर के दैनिक खर्चों पर ताला लग गया, बल्कि उनके इलाज और दवाओं की व्यवस्था करना भी एक विकट चुनौती बन गया। बाद के वर्षों में उनके पति को तीन से चार बार भीषण दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ा। बार बार हुए इन हादसों ने परिवार की कमर तोड़कर रख दी थी।
कठिन हालात में शुरू किया फास्ट फूड सेंटर
जब चारों तरफ से आमदनी के सारे रास्ते बंद नजर आने लगे, तब राधा देवी ने मायके में मां के साथ काम करते हुए सीखी गई पाक कला को अपनी ताकत बनाने का फैसला लिया। उन्होंने हिम्मत जुटाकर इलाके में एक फास्ट फूड सेंटर की शुरुआत की। शुरुआती दौर में एक महिला के लिए दुकान संभालना बेहद चुनौतीपूर्ण था, लेकिन परिवार को भुखमरी और कर्ज के संकट से बचाने के लिए उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। पिछले 10 से 15 साल से वह लगातार इस दुकान को संचालित कर रही हैं और इसी की कमाई से घर का खर्च और बच्चों की जरूरतें पूरी कर रही हैं।
सुबह से देर रात तक बारह घंटे का कड़ा परिश्रम
राधा देवी की दिनचर्या बेहद व्यस्त और थका देने वाली होती है। वह प्रतिदिन सुबह 11 बजे अपनी दुकान खोलती हैं और रात के 11 बजे तक लगातार 12 घंटे ग्राहकों की सेवा में जुटी रहती हैं। दुकान पर वह ताजे समोसे, घाटी, मोमोज और मंचूरियन तैयार करती हैं। काम का दबाव इतना ज्यादा रहता है कि उन्हें घर के भीतर जाकर अलग से खाना पकाने का समय नहीं मिल पाता, इसलिए वह दुकान पर ग्राहकों के ऑर्डर तैयार करने के साथ साथ वहीं पर अपने परिवार का भोजन भी बनाती हैं। अब उनके पति के स्वास्थ्य में सुधार आ चुका है और वह भी दुकान के कामों में उनका हाथ बंटाते हैं। इतने वर्षों के निरंतर अभ्यास के बाद अब राधा देवी को इस काम की पूरी आदत हो चुकी है और वह अपनी इस जिम्मेदारी को गर्व और खुशी के साथ निभा रही हैं।



















