सनातन परंपरा में पितृपक्ष का समय पूर्वजों के प्रति अपनी कृतज्ञता, आदर और श्रद्धा अर्पित करने का सबसे पावन काल माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों में पितर अपने वंशजों के निकट आते हैं। ऐसी पौराणिक मान्यता प्रचलित है कि पितृलोक में जल की कमी रहती है, इसलिए जो भी परिजन इस पक्ष के दौरान अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करते हैं, उनके पितर तृप्त होकर सुख और समृद्धि का वरदान देते हैं। इसी विश्वास और आध्यात्मिक भाव के साथ हर वर्ष पितृपक्ष में तर्पण और पिंडदान के कर्मकांड किए जाते हैं।
तिथियों का गणित और अष्टमी तिथि का क्षय
पंचांग की गणना के अनुसार इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि का क्षय हो रहा है। तिथि क्षय होने की स्थिति में दो तिथियों से जुड़े श्राद्ध एक ही दिन या विशेष समय चक्र के भीतर संपन्न किए जाते हैं। पंचांग के सही समय का ध्यान रखना तर्पण कर्म के लिए बेहद आवश्यक माना गया है, क्योंकि श्राद्ध का समय दोपहर यानी कुतुप और रौहिण मुहूर्त के समय ही सबसे फलदायी होता है।
30 सितंबर (बुधवार) को आश्विन कृष्ण चतुर्थी तिथि दोपहर 02.56 मिनट तक प्रभावी रहेगी। जिन पूर्वजों का देहावसान चतुर्थी तिथि को हुआ था, उनका चतुर्थी श्राद्ध 30 सितंबर को दोपहर 02.56 मिनट तक किया जाएगा। इसके बाद पंचमी तिथि का आरंभ हो जाएगा।
अगले दिन 1 अक्तूबर (गुरुवार) को आश्विन कृष्ण पंचमी तिथि दोपहर 12.36 मिनट तक विद्यमान रहेगी। इस कारण पंचमी तिथि का श्राद्ध दोपहर 12.36 मिनट से पूर्व ही संपन्न करना शास्त्रसम्मत रहेगा। 1 तारीख को दोपहर 12.36 मिनट के बाद षष्ठी तिथि लग जाएगी, जिसके कारण षष्ठी श्राद्ध का मुहूर्त 1 तारीख को दोपहर 12.36 मिनट के बाद से आरंभ होगा।
02 अक्तूबर (शुक्रवार) के दिन आश्विन कृष्ण षष्ठी तिथि प्रातः 10.16 मिनट तक रहेगी। इस दिन मुख्य रूप से सप्तमी का श्राद्ध किया जाएगा। इसके पश्चात 3 अक्तूबर (शनिवार) को आश्विन कृष्ण सप्तमी तिथि प्रातः 08 बजे तक रहेगी और उसके तुरंत पश्चात अष्टमी तिथि लग जाएगी जो रात्रि 05.52 मिनट तक प्रभावी रहेगी।
चूंकि इस दिन अष्टमी तिथि का क्षय हो रहा है, इसलिए इस दिन नवमी तिथि का संयोग भी बनता है। 3 अक्तूबर को ही श्री महालक्ष्मी व्रत संपन्न होगा, जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाएगा और अष्टमी का श्राद्ध भी इसी दिन विधिपूर्वक किया जाएगा। इसके बाद 4 अक्तूबर (रविवार) को आश्विन कृष्ण नवमी तिथि रात्रि 03.54 मिनट तक रहेगी। इस दिन को मातृ नवमी अथवा सौभाग्यवतीनां श्राद्ध कहा जाता है, जिसमें कुल की दिवंगत सुहागिन महिलाओं और माताओं के निमित्त विशेष तर्पण किया जाता है। फिर 5 अक्तूबर (सोमवार) को आश्विन कृष्ण दशमी तिथि रात्रि 02.08 मिनट तक रहेगी, जिस दौरान दशमी तिथि का श्राद्ध संपन्न होगा।
महालय पक्ष का महत्व और पितरों की विदाई
पुरोहित संतोष त्रिपाठी के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावस्या तक की पूरी अवधि को श्राद्ध अथवा महालय पक्ष कहा जाता है। यह पूरे पंद्रह दिनों का वह समय होता है जब मनुष्य अपने ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों का स्मरण करता है। इस पूरी अवधि का समापन आश्विन अमावस्या को होता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहते हैं। इस अंतिम दिन सभी पितरों को विदा किया जाता है। माना जाता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से प्रसन्न होकर पितर अपने परिवार को सुख, शांति और वंश वृद्धि का शुभाशीर्वाद देकर पितृलोक लौट जाते हैं।
तर्पण की आवश्यक सामग्री और पंचबली का शास्त्रीय विधान
पितरों की तृप्ति के लिए किए जाने वाले तर्पण में कुश, काले तिल, जल और उड़द दाल का विशेष महत्व होता है। हाथ में कुश की पवित्री धारण करके और काले तिल मिश्रित जल से पूर्वजों को अंजलि दी जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, काले तिल और कुश भगवान विष्णु के अंश माने गए हैं, जिससे तर्पण का फल अनंत गुना हो जाता है।
श्राद्ध कर्म में ब्राह्मण भोजन कराने से ठीक पहले पंचबली दान निकालने का विधान है। पंचबली का अर्थ सृष्टि के पांच विशेष जीवों और शक्तियों के लिए भोजन का अंश निकालना है
- गो बलि: पहला ग्रास गाय माता के लिए निकाला जाता है, क्योंकि गाय में समस्त देवी-देवताओं का वास माना गया है।
- श्वान बलि: दूसरा ग्रास श्वान यानी कुत्ते के लिए समर्पित किया जाता है, जिसे यमराज का दूत माना जाता है।
- काक बलि: तीसरा भाग कौए के लिए निकाला जाता है। लोकमान्यता है कि कौआ पितृलोक का संदेशवाहक होता है और उसके भोजन ग्रहण करने से पितर तृप्त होते हैं।
- देवादि बलि: चौथा भाग देवताओं और समस्त प्राकृतिक शक्तियों के निमित्त अर्पित किया जाता है।
- पिपीलिकादि बलि: पांचवां और अंतिम भाग चींटियों और अन्य सूक्ष्म कीट-पतंगों के लिए भूमि पर रखा जाता है।
पंचबली निकालने के उपरांत ही ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराया जाता है और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। हिंदू धर्म की मान्यता के मुताबिक, जो व्यक्ति इन नियमों का निष्ठा से पालन करते हुए तर्पण और अन्नदान करता है, उसे जीवन में पितृदोष से मुक्ति मिलती है और उसके घर में सदैव बरकत बनी रहती है।


















