फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर बड़े बजट और बड़े स्टार्स वाली फिल्मों को ही बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी माना जाता है। लेकिन बधाई हो ने इस पुरानी धारणा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। सिर्फ 29 करोड़ रुपये के बजट में तैयार की गई इस फिल्म ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करते हुए 221 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की। दमदार पटकथा और आम जीवन से जुड़ी कहानी के बल पर इस फिल्म ने न केवल अपनी लागत को आसानी से वसूल किया, बल्कि साल 2018 की सबसे बड़ी सुपरहिट फिल्मों में भी अपना नाम दर्ज कराया।
गंभीर पटकथा से कॉमेडी तक का सफर
यह कुल 123 मिनट यानी 2 घंटे और 3 मिनट लंबी फिल्म दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधे रखती है और बोर नहीं होने देती। बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि इस फिल्म का शुरुआती ड्राफ्ट बेहद गंभीर और भावुक ड्रामा के रूप में तैयार किया गया था। जब लेखक शांतनु श्रीवास्तव और अक्षत घिल्डियाल इस विषय पर मंथन कर रहे थे, तो कहानी का मुख्य केंद्र समाज के ताने, शर्मिंदगी और पारिवारिक दबाव हुआ करते थे। लेकिन निर्देशक अमित शर्मा ने इसमें परिस्थितियों के अनुसार उत्पन्न होने वाली कॉमेडी और व्यंग्य का पुट जोड़ने का निर्णय लिया। इसके परिणामस्वरूप, एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दे को इतने शालीन और हास्यप्रद तरीके से परोसा गया कि दर्शक उससे आसानी से जुड़ गए।
कहानी और सामाजिक वर्जनाएं
बधाई हो की पूरी कहानी कौशिक परिवार के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है, जहां एक अधेड़ उम्र के जोड़े यानी गजराज राव और नीना गुप्ता के घर अचानक अनचाही प्रेग्नेंसी की स्थिति बनती है। जब उनके युवा और विवाह योग्य बेटे नकुल जिसकी भूमिका आयुष्मान खुराना ने निभाई है, को इस बात की भनक लगती है, तो पूरा परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा खोने के डर और तानों की चिंता में घिर जाता है। हमारे मध्यमवर्गीय भारतीय समाज में माता-पिता के निजी जीवन और ढलती उम्र में संतान उत्पत्ति जैसे विषयों पर खुलकर बात करना आज भी वर्जित माना जाता है। इस फिल्म ने इस बेहद संवेदनशील विषय को बिना किसी फूहड़ता के बेहद सम्मानजनक और हास्यपूर्ण अंदाज में बड़े पर्दे पर पेश किया।
भले ही आयुष्मान खुराना और सान्या मल्होत्रा ने अपनी भूमिकाओं में बेहतरीन अभिनय किया हो, लेकिन इस फिल्म की असली ताकत इसकी वरिष्ठ कलाकारों की टोली थी। दिवंगत अभिनेत्री सुरेखा सीकरी द्वारा निभाया गया दादी का किरदार इतना जीवंत और मार्मिक था कि उन्हें इसके लिए प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया। गजराज राव जो जितेंद्र कौशिक की भूमिका में थे और नीना गुप्ता जो प्रियंवदा कौशिक बनी थीं, उनके बीच की परिपक्व और मासूम केमिस्ट्री ने देखने वालों का दिल जीत लिया। घर के बड़ों के बीच खट्टे-मीठे रिश्ते और संकट के समय परिवार का एकजुट होना इस कलाकृति को محض एक कॉमेडी फिल्म न बनाकर एक संपूर्ण पारिवारिक ड्रामा बनाता है।
सिनेमा पर प्रभाव और विरासत
बधाई हो ने यह साबित कर दिया कि यदि किसी कहानी की नींव मजबूत हो और उसे प्रस्तुत करने का तरीका ईमानदार हो, तो दर्शक किसी भी बोल्ड या लीक से हटकर चुने गए विषय को खुले दिल से स्वीकार करते हैं। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा जगत में विषय-आधारित फिल्मों की एक नई धारा को जन्म दिया। इसने समाज को इस सच्चाई का सामना करने पर मजबूर किया कि माता-पिता का भी अपना निजी जीवन और भावनाएं होती हैं, तथा उम्र कभी भी खुशियों का स्वागत करने के रास्ते में रुकावट नहीं बननी चाहिए। आज इतने साल बीत जाने के बाद भी जब दर्शक इस फिल्म को दोबारा देखते हैं, तो उनके चेहरों पर अनायास ही मुस्कान आ जाती है।





















