मशहूर अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर छिड़ा विवाद लगातार गहराता जा रहा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इस फिल्म के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद से ही मनोरंजन जगत और दर्शकों के बीच अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। इस संवेदनशील मुद्दे पर दिलजीत दोसांझ के समर्थन में अब तक फिल्म जगत के कई सितारे अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। इसी कड़ी में अब प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेत्री गुल पनाग का नाम भी जुड़ गया है। उन्होंने पंजाब के उस अशांत और हिंसक दौर को याद किया है, जब अनगिनत निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। गुल पनाग ने फिल्म पर लगाए गए प्रतिबंध को गलत बताते हुए कहा है कि इतिहास के कड़वे सच को कभी भी दबाया नहीं जाना चाहिए।
बचपन की भयावह यादें और हिंसा का वह दौर
गुल पनाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर अपने जीवन के उस कठिन दौर का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी परवरिश पंजाब में ही हुई है और उन्होंने उस दौर की क्रूरता तथा दहशत को बहुत करीब से महसूस किया है। जब पंजाब में हिंसक गतिविधियां अपने चरम पर थीं, तब की कई दहला देने वाली घटनाएं उनके दिमाग में आज भी पूरी तरह ताजा हैं। उन्होंने लिखा कि उन्हें अच्छी तरह याद है कि कैसे सुबह के अखबारों की मुख्य सुर्खियां खौफ से भरी होती थीं। उन दिनों अक्सर ऐसी खबरें आती थीं कि उग्रवादियों या दंगाइयों ने चलती बसों को जबरन रुकवाया और उनमें सफर कर रहे मासूम और बेगुनाह यात्रियों को बाहर निकालकर बेरहमी से मार डाला।
मासूमों पर हुए अत्याचार और गुल पनाग की दलील
अपनी आपबीती साझा करते हुए अभिनेत्री ने बताया कि हिंसा का यह साया उनके निजी जीवन के बेहद करीब तक पहुंच गया था। उन्होंने लिखा कि उन्हें आज भी याद है कि कैसे उनके अपने ही गांव के कुछ सीधे-सादे लड़कों को बिना किसी ठोस वजह के पुलिस हिरासत में ले लिया गया था। उन लड़कों को हिरासत के दौरान असहनीय शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गई थीं, जबकि सच्चाई यह थी कि उन बेगुनाह युवकों का चल रहे किसी भी राजनीतिक आंदोलन या उग्रवादी गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं था। गुल पनाग का दृढ़ता से मानना है कि इतिहास के इन स्याह और असहज करने वाले पन्नों को दबाने या छुपाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने साफ किया कि हमें अतीत की ऐसी वास्तविक कहानियों को पर्दे पर दिखाने से नहीं कतराना चाहिए और ‘सतलुज’ जैसी फिल्मों पर पाबंदी लगाना ऐतिहासिक सच से मुंह मोड़ने जैसा है।
सेंसर बोर्ड की आपत्तियां और अदालती लड़ाई
फिल्म ‘सतलुज’ की रिलीज की राह शुरू से ही बेहद जटिल और संघर्षपूर्ण रही है। यह फिल्म सबसे पहले साल 2022 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड के पास मंजूरी के लिए पहुंची थी। उस समय इस फिल्म का मूल शीर्षक ‘घल्लूघारा’ रखा गया था। सेंसर बोर्ड ने फिल्म की विषयवस्तु पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की थीं और मेकर्स को फिल्म में 21 कट्स लगाने का आदेश दिया था। इसके साथ ही फिल्म का नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ करने का निर्देश दिया गया था। सेंसर बोर्ड के इस कड़े रवैये के खिलाफ फिल्म के निर्माण बैनर आरएसवीपी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कानूनी विवादों के बीच ही इस फिल्म को टोरोंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया था, जहां इसे काफी सराहना मिली थी।
शीर्षक में कई बदलावों के बाद भी डिजिटल रिलीज पर लगा बैन
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करने के बाद फिल्म को दोबारा नए सिरे से समीक्षा के लिए सेंसर बोर्ड की संशोधित समिति के पास भेजने का आदेश दिया था। हालांकि, फिल्म निर्माताओं को राहत मिलने के बजाय और भी बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ा। संशोधित समिति ने फिल्म में 21 की जगह कुल 127 कट्स लगाने की भारी-भरकम सिफारिश कर दी। इतने सारे बदलावों के बाद फिल्म का मूल स्वरूप पूरी तरह प्रभावित हो गया। अंततः फिल्म का नाम ‘पंजाब 95’ से बदलकर ‘सतलुज’ करना पड़ा। सालों तक सिनेमाघरों में रिलीज का इंतजार करने के बाद आखिरकार इसके निर्माताओं ने इसे सीधे डिजिटल यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने का फैसला किया, लेकिन दुर्भाग्य से इसे वहां भी प्रतिबंध की मार झेलनी पड़ी।











