झारखंड की राजधानी रांची के इटकी क्षेत्र की निवासी स्मिता ने आधुनिक खेती के जरिए सफलता की एक नई इबारत लिखी है। वे अपनी 70 डेसिमल जमीन पर पारंपरिक तरीके से हटकर मिश्रित खेती कर रही हैं, जिससे उन्हें कम जगह में अधिक उत्पादन मिल रहा है। स्मिता एक ही साथ खेत में मकई, लौकी और तोरई जैसी फसलों को लगाकर संसाधनों का अधिकतम उपयोग करती हैं। उनके इस खेती के मॉडल में मकई का पौधा ऊंचाई की ओर बढ़ता है, जबकि सब्जियां जैसे लौकी और तोरई जमीन के निचले स्तर पर फैलती हैं। इस वैज्ञानिक और स्मार्ट तकनीक के कारण एक ही टुकड़े से चार अलग-अलग किस्म की फसलें प्राप्त करना मुमकिन हो गया है, जो सीधे तौर पर किसान की आय में वृद्धि करता है।
खेती की विशेष खाद और तकनीक
स्मिता ने अपनी फसल की गुणवत्ता सुधारने के लिए खुद की एक खास विधि विकसित की है, जिसे वह 'ब्रह्मास्त्र खाद' का नाम देती हैं। यह खाद तैयार करने के लिए वह गोबर की खाद में जामुन का सिरका, नीम खली और सरसों की खली का मिश्रण तैयार करती हैं। उनके अनुसार, यह शक्तिशाली मिश्रण मिट्टी की उर्वरा शक्ति को कई गुना बढ़ा देता है, जिससे खेत में फसल लहलहा उठती है। इसके अलावा, वह खाद के रख-रखाव पर भी काफी ध्यान देती हैं। बारिश के मौसम में सिंचाई की चिंता कम रहती है, लेकिन वह हर 15 दिन में एक बार सूखी हुई गोबर की खाद खेत में डालना नहीं भूलतीं, जो मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।
मुनाफे का गणित और बाजार की पहुंच
इस अनूठी खेती के जरिए स्मिता केवल दो से तीन महीने के भीतर एक लाख से डेढ़ लाख रुपए तक का मुनाफा आसानी से कमा लेती हैं। उनकी फसल का चक्र कुछ इस प्रकार है कि मकई को तैयार होने में कुल चार महीने का समय लगता है, जबकि लौकी और तोरई मात्र दो महीने में ही पैदावार देना शुरू कर देती हैं। जब मकई का पौधा ऊपर की तरफ बढ़ रहा होता है, तब नीचे की सब्जियां तैयार होकर बाजार में जाने के लिए उपलब्ध हो जाती हैं। सब्जी खराब न हो और जमीन को न छुए, इसके लिए वह खेतों में छोटी-छोटी लकड़ी की स्टिक लगाती हैं, जिससे बेलें ऊपर की ओर सहारा पाकर फलती-फूलती हैं।
आपूर्ति और मांग का संतुलन
अपनी खेती की सफलता के पीछे स्मिता स्वीट कॉर्न की भारी मांग को भी एक प्रमुख कारण मानती हैं। उनके खेत के पास ही स्थित मदर डेयरी की फैक्ट्री में वह अपनी तैयार फसल की सीधी बिक्री करती हैं, जिससे उन्हें बाजार में ग्राहकों को ढूंढने की जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती। इस स्मार्ट खेती के माध्यम से वे एक तरफ तो लौकी और तोरई से शुरुआती आय सुनिश्चित करती हैं, वहीं दूसरी तरफ उसके एक महीने बाद मिलने वाली स्वीट कॉर्न की फसल से उन्हें अतिरिक्त आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। उनकी यह विधि न केवल टिकाऊ है, बल्कि इसे अपनाने वाले अन्य किसानों के लिए एक उदाहरण भी है।











