फिल्म 'सतलुज' को लेकर मचे बवाल के बीच अब अनुभवी अभिनेता कंवलजीत सिंह का एक बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने अपनी बात रखते हुए कहा कि किसी फिल्म को बनकर तैयार होने के बाद रिलीज से रोकना पूरी टीम की मेहनत का अपमान है और यह उनके साथ सरासर अन्याय है। कंवलजीत के अनुसार, फिल्म निर्माण में लगे हर व्यक्ति की ईमानदारी पर सवाल उठाना या उसके फल को आने से रोकना उचित नहीं है।
किरदार की तैयारी और चुनौती
कंवलजीत सिंह ने स्वीकार किया कि उनके फिल्मी करियर में 'सतलुज' उन चुनिंदा फिल्मों में से है, जिसने उन्हें कलाकार के तौर पर सबसे ज्यादा चुनौती दी। उन्होंने बताया कि इस फिल्म में उन्होंने एक बेहद कठोर और बेरहम व्यक्ति की भूमिका निभाई है, जो उनके पिछले काम से बिल्कुल अलग है। उन्होंने कहा कि इसी कारण से यह किरदार उन्हें निभाने में बहुत दिलचस्प लगा। साथ ही, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यह फिल्म इतिहास के एक ऐसे पन्ने से जुड़ी है जिस पर पहले कभी खुलकर चर्चा नहीं हुई थी, जो इसे और भी महत्वपूर्ण बनाता है।
अधिकारी से प्रेरित था पात्र
अपने किरदार के बारे में विस्तार से बात करते हुए अभिनेता ने बताया कि यह पात्र पंजाब के एक वरिष्ठ अधिकारी के व्यक्तित्व से काफी हद तक प्रेरित है। भूमिका को सही ढंग से उतारने के लिए उन्होंने उस अधिकारी से जुड़ी तमाम जानकारियां इंटरनेट के माध्यम से जुटाईं, उनके पुराने भाषणों को सुना और उनके बात करने के तरीके का गहराई से अध्ययन किया। हालांकि, निर्देशक ने उन्हें यह स्पष्ट निर्देश दिया था कि उन्हें किसी की हूबहू नकल नहीं करनी है, बल्कि अपने अभिनय के जरिए उस किरदार में जान फूंकनी है। कंवलजीत ने यह भी माना कि मेकअप और लुक के कारण फिल्म में वह बिल्कुल उसी वास्तविक अधिकारी की तरह दिख रहे थे।
रिलीज में देरी के कारण
फिल्म की राह में आने वाली रुकावटों के बारे में बात करते हुए कंवलजीत सिंह ने कहा कि हर बार रिलीज रुकने की वजह केवल विवाद ही नहीं होते हैं। कई मौकों पर आर्थिक तंगी, तकनीकी कमियां या व्यावहारिक चुनौतियां भी रिलीज के रास्ते में बाधा बनती हैं। उन्होंने दर्द व्यक्त करते हुए कहा कि जब कोई पूरी टीम वर्षों तक खून-पसीना एक करके फिल्म बनाती है और अंत में वह रिलीज नहीं हो पाती, तो यह स्थिति किसी भी लेखक की उस किताब जैसी होती है जो सालों की मेहनत के बाद भी छप नहीं पाती।
निर्माताओं का संकल्प
फिल्म से जुड़े विवादों पर कंवलजीत ने जानकारी दी कि यह पूरा मामला पिछले ढाई से तीन साल तक अलग-अलग चरणों और मंचों पर चलता रहा। इसके बावजूद फिल्म के निर्देशक और निर्माता पूरी तरह से अपने फैसले पर अडिग रहे। उन्होंने बाहरी दबावों के आगे घुटने टेकने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने याद दिलाया कि एक समय फिल्म के बड़े हिस्से को काटने का दबाव डाला गया था, और बाद में कनाडा के एक फिल्म फेस्टिवल से भी इसे हटा लिया गया था।
अग्रिम चर्चा की वकालत
अपनी बात के अंत में कंवलजीत सिंह ने एक बड़ा सुझाव दिया। उनका मानना है कि यदि किसी फिल्म की विषय-वस्तु को लेकर किसी भी समुदाय या समूह को आपत्ति है, तो यह सब फिल्म शुरू होने से पहले ही सुलझा लिया जाना चाहिए। सभी तरह की चर्चाएं और आवश्यक मंजूरियां प्रोजेक्ट के निर्माण से पहले हो जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि करोड़ों रुपये खर्च होने, टीम की मेहनत लगने और पूरी फिल्म तैयार होने के बाद उस पर बैन लगाना या बड़े बदलाव की मांग करना किसी भी लिहाज से सही नहीं है।











