दिलीप कुमार का नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अभिनय गुरु के रूप में दर्ज है, जिन्हें अमिताभ बच्चन से लेकर राज कपूर तक अपना आदर्श मानते थे। वर्ष 1961 में रिलीज हुई उनकी फिल्म 'गंगा जमुना' केवल एक फिल्म नहीं थी, बल्कि यह भारतीय सिनेमा के लिए एक मील का पत्थर साबित हुई। हालांकि आधिकारिक तौर पर नितिन घोष इस फिल्म के निर्देशक थे, लेकिन हकीकत यह थी कि फिल्म का पूरा निर्माण और निर्देशन का काम खुद दिलीप कुमार ने ही संभाला था। उन्होंने ही इस फिल्म की पटकथा लिखी थी और वे स्वयं ही इसके निर्माता थे। 'गंगा जमुना' ने बॉलीवुड की आने वाली पीढ़ियों के लिए कहानी कहने का एक नया और गहरा तरीका पेश किया।
फिल्म की अनूठी विशेषताएं और चुनौती
इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अवधी भाषा थी, जो उस दौर के सामान्य सिनेमा से बिल्कुल अलग थी। साउथ की मशहूर अभिनेत्री वैजयंती माला ने फिल्म में अवधी के जो संवाद बोले, वे दिलीप कुमार द्वारा खुद रिकॉर्ड करके भेजे गए थे। वैजयंती माला ने उन संवादों को बार-बार सुनकर आत्मसात किया और पर्दे पर बेहतरीन प्रदर्शन दिया। फिल्म में दिलीप कुमार के सगे भाई नासिर हुसैन ने छोटे भाई का रोल निभाया था। इसके अलावा कन्हैया लाल, अनवर खान और लीला चिटनिस ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। दिलीप कुमार और नासिर हुसैन ने 'गंगा जमुना' के अलावा 1976 की फिल्म 'बैराग' में भी साथ काम किया था। दुर्भाग्यवश 'बैराग' के रिलीज होने से पहले ही नासिर हुसैन का निधन हो गया। संगीत के मामले में फिल्म बेजोड़ थी, जिसमें नौशाद का संगीत और शकील बदायुनी के गीत शामिल थे। फिल्म का गाना 'इंसाफ की डगर पे' आज भी देश के सबसे प्रभावशाली गीतों में गिना जाता है। 'गंगा जमुना' का नेट कलेक्शन उस जमाने में 3.5 करोड़ रुपये था, जो वर्तमान की अर्थव्यवस्था के अनुसार लगभग 1000 करोड़ रुपये के बराबर होता है। सेंसर बोर्ड के साथ हुए 200 कट्स के विवाद को सुलझाने के लिए दिलीप कुमार को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से सहायता लेनी पड़ी थी।
प्रेरणा स्रोत: दीवार
सलीम-जावेद की जोड़ी ने 'गंगा जमुना' के मूल कथानक से प्रेरित होकर 'दीवार' की पटकथा लिखी। यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित यह फिल्म 24 जनवरी 1975 को रिलीज हुई थी। अमिताभ बच्चन और शशि कपूर अभिनीत इस फिल्म में दो भाइयों की कहानी थी, जिसमें एक अपराधी और दूसरा पुलिस अधिकारी था। फिल्म का चरमोत्कर्ष, जहां एक भाई दूसरे की जान ले लेता है, आज भी हिंदी सिनेमा का सबसे आइकॉनिक दृश्य माना जाता है। 4.25 करोड़ रुपये के कलेक्शन के साथ यह फिल्म 1975 की चौथी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी।
नाम: एक और सफल कोशिश
12 सितंबर 1986 को रिलीज हुई फिल्म 'नाम' भी इसी तर्ज पर बनी थी। महेश भट्ट द्वारा निर्देशित इस फिल्म में संजय दत्त और कुमार गौरव ने भाइयों की भूमिका निभाई थी। फिल्म का बजट करीब 2 करोड़ रुपये था और इसने भारत में 4 करोड़ तथा विश्व स्तर पर 7 करोड़ रुपये की कमाई की थी। यह फिल्म सुपरहिट रही और 1986 की चौथी सबसे बड़ी कमाई करने वाली फिल्म बनी। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत इस फिल्म का मजबूत स्तंभ था, जिसमें 'चिट्ठी आई है' जैसा कालजयी गाना शामिल था।
आंदोलन: अंतिम कड़ी
1995 में रिलीज हुई फिल्म 'आंदोलन' भी भाइयों के द्वंद्व की इसी कहानी को दोहराती है। अजीज सेजवाल द्वारा निर्देशित इस फिल्म में संजय दत्त और गोविंदा लीड रोल में थे। 3.75 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने 10 करोड़ रुपये कमाए और यह बॉक्स ऑफिस पर औसत रही। फिल्म का संगीत नदीम-श्रवण ने दिया था और समीर ने इसके गीत लिखे थे।











