अक्सर सोशल मीडिया और अलग-अलग मंचों पर कई मिनटों तक सांस रोकने के साहसिक दावे सामने आते रहते हैं, जिससे प्रेरित होकर आम लोग भी ऐसे खतरनाक प्रयोग दोहराने की कोशिश करने लगते हैं। हाल ही में विद्युत जमवाल द्वारा 15 मिनट तक सांस रोके रखने की बात चर्चा में आने के बाद चिकित्सा जगत में इस पर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। सामान्य मानव शरीर की बनावट ऐसी है कि किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए महज दो मिनट तक भी अपनी सांस रोक पाना बेहद मुश्किल और असहज हो जाता है। जब कोई व्यक्ति अपनी सांस कुछ ही पलों के लिए थामता है, तो शरीर बेचैन होने लगता है और मन तुरंत सांस छोड़ने और ताजी हवा अंदर खींचने के लिए छटपटा उठता है। ऐसे में पंद्रह मिनट तक सांस थामे रहने का विचार ही चिकित्सा विज्ञान की स्थापित समझ के बिल्कुल उलट प्रतीत होता है।
फोर्टिस अस्पताल के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. कर्ण मेहरा के अनुसार, सामान्य चिकित्सीय दृष्टिकोण से बिना किसी विशेष बाहरी सहायता के 15 मिनट तक सांस रोक पाना पूरी तरह असंभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति विशेष के व्यक्तिगत दावे पर टिप्पणी किए बिना यह कहा जा सकता है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ऐसा कोई भी प्रामाणिक उदाहरण दर्ज नहीं है। जो लोग सामान्य से अधिक समय तक सांस थामने में सक्षम होते हैं, वे इसके लिए कई वर्षों तक कठोर और निरंतर अभ्यास करते हैं। इसके बावजूद, अब तक पानी के भीतर अधिकतम 7 से 8 मिनट तक सांस थामने के ही प्रामाणिक रिकॉर्ड देखे गए हैं, और वे भी बेहद कड़ी चिकित्सकीय निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के तहत बनाए गए थे। एक आम इंसान के लिए एक से दो मिनट से अधिक समय तक सांस रोके रखना जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसा करने से शरीर में ऑक्सीजन का भारी अभाव पैदा हो जाता है, जिससे दिल का दौरा, लिवर की क्षति और मस्तिष्क में हाइपॉक्सिया होने का जोखिम तेजी से बढ़ जाता है।
सांस थामने की प्राकृतिक सीमा और जरूरी सावधानियां
एक स्वस्थ और सामान्य व्यक्ति बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के आमतौर पर एक से दो मिनट तक ही सांस रोक सकता है। यदि कोई इससे आगे जाने का प्रयास करता है, तो उसके लिए महीनों या वर्षों के व्यवस्थित प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। प्राचीन काल में योग साधक और ऋषि-मुनि विशेष योग विज्ञान और प्राणायाम के गहन अभ्यासों के जरिए अपनी श्वास गति को नियंत्रित करते थे, जिसकी अपनी एक अलग वैज्ञानिक और पारंपरिक पद्धति थी। साधारण लोगों के लिए बिना मार्गदर्शन के ऐसी नकल करना अत्यंत खतरनाक है। यदि किसी ने पूर्व में 7 या 8 मिनट तक सांस रोकी भी है, तो वह असाधारण परिस्थितियों में हुआ और उस दौरान आपातकालीन चिकित्सा दल पूरी तरह तैनात रहता था।
डॉ. कर्ण मेहरा का कहना है कि किसी भी इस तरह के असाधारण दावे को प्रामाणिक मानने से पहले उसे वैज्ञानिक कसौटी पर कसना अनिवार्य होता है। इसके लिए व्यक्ति के शरीर पर विशेष वैज्ञानिक उपकरण लगाने पड़ते हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह त्वचा, छिपे हुए माध्यमों या किसी अन्य गुप्त स्रोत से ऑक्सीजन ग्रहण नहीं कर रहा है। पेशेवर फ्री-डाइवर्स अथवा योग के उच्च अभ्यासी विशेष शारीरिक तकनीकों, मानसिक नियंत्रण और सख्त डॉक्टरी देखरेख में ही सामान्य से कुछ अधिक समय तक सांस थाम पाते हैं। यदि कोई साधारण व्यक्ति बिना किसी मेडिकल विशेषज्ञ की उपस्थिति या बिना उन्नत प्रशिक्षण के दो मिनट से अधिक समय तक सांस रोकने की जिद करता है, तो यह उसके शरीर के भीतर विनाशकारी स्थितियां पैदा कर सकता है।
फेफड़ों और श्वास नली पर पड़ने वाला अत्यधिक दबाव
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक सांस रोकता है या किसी वजह से सांस का प्रवाह थम जाता है, तो शरीर के कई प्रमुख अंगों पर एक साथ घातक असर पड़ता है। इसका सबसे पहला और सीधा आघात फेफड़ों पर होता है। सांस थामते ही फेफड़ों में पहले से मौजूद ऑक्सीजन कुछ क्षणों के लिए रक्त कोशिकाओं में घुलती रहती है, लेकिन शरीर में तैयार हो रही कार्बन डाइऑक्साइड बाहर नहीं निकल पाती। इसका नतीजा यह होता है कि फेफड़ों के भीतर हवा की महीन थैलियों, जिन्हें एल्वियोलाई कहा जाता है, में आंतरिक दबाव खतरनाक सीमा तक बढ़ जाता है।
खून में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा का अत्यधिक बढ़ जाना मेडिकल भाषा में हाइपरकेप्निया कहलाता है। सांस रोके रखने से छाती की पूरी कैविटी के भीतर दबाव का स्तर तीव्र हो जाता है, जिससे फेफड़ों के सामान्य विस्तार की क्षमता बाधित होने लगती है और वहां की रक्त नलिकाओं पर भारी खिंचाव आता है। जैसे ही रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड तय सीमा से ऊपर जाती है, मस्तिष्क का श्वास नियंत्रण केंद्र हरकत में आ जाता है और डायाफ्राम को फौरन संकुचित होने के लिए जोरदार संकेत भेजता है। इसके चलते व्यक्ति को अपने पेट और छाती के बीच एक बहुत तेज झटका या धक्का महसूस होता है। जब डायाफ्राम पर यह झटका असामान्य रूप से हिंसक होता है, तो उसके अचानक फटने का भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाता है।
हृदय गति, रक्तचाप और परिसंचरण तंत्र पर दुष्प्रभाव
फेफड़ों में आंतरिक दबाव बढ़ने का सीधा नुकसान हृदय और रक्त परिसंचरण तंत्र को भुगतना पड़ता है। छाती के भीतर अत्यधिक खिंचाव के कारण रक्त वाहिकाओं पर इतना अधिक दबाव बन जाता है कि उनके फटने की आशंका पैदा हो जाती है। ऐसी नाजुक स्थिति में दिल का दौरा पड़ने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। जब शरीर लंबे समय तक ताजी हवा से वंचित रहता है, तो सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया के तौर पर मैमैलियन डाइविंग रिफ्लेक्स सक्रिय हो जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य हृदय द्वारा की जाने वाली ऑक्सीजन की खपत को घटाना होता है।
इस प्रक्रिया के दौरान हृदय गति सामान्य से बहुत नीचे गिर जाती है। दिल की धड़कन मंद पड़ते ही शरीर के हाथ, पैर और बाकी अंगों तक पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं पहुंच पाता, और शरीर का तंत्र रक्त के पूरे बहाव को केवल दो सबसे अनिवार्य अंगों यानी हृदय और मस्तिष्क की ओर मोड़ देता है। इससे परिधीय अंगों में रक्तचाप तेजी से गिरने लगता है। वहीं दूसरी तरफ, खून के भीतर कार्बन डाइऑक्साइड की अत्यधिक मौजूदगी के कारण सिस्टोलिक और डायस्टोलिक दोनों प्रकार का रक्तचाप अचानक बहुत ऊंचे स्तर पर पहुंच जाता है, जिससे कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम गंभीर असंतुलन की चपेट में आ जाता है।
मस्तिष्क की कोशिकाओं की क्षति और अचानक बेहोशी का खतरा
लंबे समय तक सांस रोके रखने पर शरीर के भीतर नई ऑक्सीजन का प्रवेश पूरी तरह बंद हो जाता है। शुरुआती पलों में शरीर अपने भंडार में मौजूद सीमित ऑक्सीजन को खर्च करता है, लेकिन जल्द ही यह भंडार खत्म हो जाता है और ऑक्सीजन का स्तर तेजी से नीचे गिर जाता है। मस्तिष्क की कोशिकाएं ऑक्सीजन की निरंतर आपूर्ति पर निर्भर होती हैं और वे बिना ऑक्सीजन के केवल 3 से 4 मिनट ही जीवित रह सकती हैं। इस समयावधि के बीतते ही मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाएं हमेशा के लिए नष्ट होने लगती हैं। एक बार जब ब्रेन की कोशिकाएं मृत हो जाती हैं, तो उन्हें दोबारा ठीक या पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता, जिससे व्यक्ति हमेशा के लिए कोमा में जा सकता है या ब्रेन डेड घोषित हो सकता है।
शरीर से सांस बाहर न छोड़े जाने के कारण खून में कार्बन डाइऑक्साइड का जमाव इतना तीव्र हो जाता है कि रक्त का पीएच स्तर तेजी से गिरने लगता है, जिसे रेस्पिरेटरी एसिडोसिस के नाम से जाना जाता है। इस अम्लीय अवस्था में शरीर की कोशिकाओं का सामान्य कामकाज ठप पड़ जाता है। जब मस्तिष्क को यह पता चलता है कि ऑक्सीजन पूरी तरह खत्म होने की कगार पर है, तो वह खुद को किसी तरह सुरक्षित रखने के लिए आपातकालीन शटडाउन मोड में चला जाता है, जिसके कारण व्यक्ति तुरंत अचेत होकर जमीन पर गिर पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति यह खतरनाक प्रयोग पानी के भीतर कर रहा हो, तो अचानक बेहोश होते ही अनियंत्रित होकर फेफड़ों में पानी भर जाता है, जिससे डूबने के कारण मौके पर ही मृत्यु हो सकती है। प्राचीन काल में भारत में योग और प्राणायाम की महान परंपरा रही है, लेकिन उसका उद्देश्य सुरक्षित और अनुशासित अभ्यास के जरिए जीवन ऊर्जा को बढ़ाना था, न कि जानलेवा जोखिम उठाना।



















