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कच्चे तेल की उछाल से रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब, आरबीआई ने डॉलर बेचकर संभाला मोर्चाबाज़ार
22 जुल॰ 2026, 2:33 am (28 दिन पहले)· 0

कच्चे तेल की उछाल से रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब, आरबीआई ने डॉलर बेचकर संभाला मोर्चा

कच्चे तेल की तेज़ी ने भारतीय रुपये को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले उसके अब तक के सबसे निचले स्तर के करीब पहुंचा दिया है, जिससे भारतीय रिज़र्व बैंक को देश और विदेश दोनों जगह डॉलर बेचने पड़े।

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तकनीकी विश्लेषण21 जुलाई 2026

RSIRelative Strength Index (14)

यह क्या है

RSI 0 से 100 तक का मोमेंटम मापक है जो हालिया बढ़त बनाम गिरावट दिखाता है। 70 के ऊपर ओवरबॉट (खिंचा हुआ), 30 के नीचे ओवरसोल्ड (बिकवाली से थका), और 50 तटस्थ रेखा है।

अभी यह कहाँ है

USD/INR का RSI 57 है।

आगे संभावित चाल

60 के ऊपर बढ़त या 40 के नीचे फिसलन पर नजर रखें।

भारतीय रुपया एक बार फिर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे कमज़ोर स्तर के करीब पहुंच गया है, और इस गिरावट को थामने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक सीधे बाज़ार में उतर आया है। कच्चे तेल की कीमतों में आई ताज़ा उछाल ने पहले से दबाव झेल रहे रुपये पर और बोझ डाल दिया, जिसके बाद रिज़र्व बैंक ने देश के भीतर और विदेशी बाज़ार दोनों में डॉलर बेचना शुरू कर दिया। जो देश अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर तेल बाहर से मंगाता है, उसके लिए गिरता रुपया और चढ़ता तेल बिल एक साथ आना बड़ी मुश्किल है, और नीति-निर्माता इसे थामने के लिए एक साथ कई पहलू आज़मा रहे हैं।

रिज़र्व बैंक डॉलर क्यों बेच रहा है

जब रुपया बहुत तेज़ी से गिरने लगता है, तो रिज़र्व बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बाज़ार में बेचता है ताकि आपूर्ति बढ़े और विनिमय दर संभल जाए। इस बार वजह बना कच्चा तेल। भारत अपनी ज़रूरत का ज़्यादातर तेल आयात करता है, इसलिए जब भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम चढ़ते हैं, आयातकों को भुगतान के लिए ज़्यादा डॉलर खरीदने पड़ते हैं और रुपया नीचे खिसक जाता है। तेल की कीमतों में उछाल और बाज़ार की बिगड़ती धारणा के बीच रुपया अपने सर्वकालिक निचले स्तर की ओर फिसला, जिसके चलते रिज़र्व बैंक को देश और विदेश दोनों बाज़ारों में दखल देना पड़ा, जहां रुपये का कारोबार होता है।

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देश में डॉलर खींचने की कोशिश

भंडार से डॉलर बेचना अकेला उपाय नहीं है। अधिकारियों ने देश में ज़्यादा विदेशी मुद्रा लाने के लिए भी कदम उठाए हैं। घरेलू बॉन्ड में विदेशी निवेश के नियमों को आसान बनाया गया है ताकि बाहर का पैसा भारतीय कर्ज़ बाज़ार में आसानी से आ सके, और अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) को डॉलर जमा रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। दिक्कत यह है कि ये कदम उन दो ताक़तों की पूरी भरपाई नहीं कर पाए हैं जो रुपये को दूसरी दिशा में धकेल रही हैं, यानी आयातकों की तरफ़ से डॉलर की तगड़ी मांग और महंगे कच्चे तेल से पैदा हुआ बाहरी दबाव। दूसरे शब्दों में, ये रियायतें कुछ हद तक मदद कर रही हैं, लेकिन नीचे का असली दबाव अब भी बना हुआ है।

रुपया और बॉन्ड यील्ड कहां हैं

रुपया 0.2% तक गिरकर प्रति डॉलर 96.4575 पर आ गया, जो मई के आखिर में छुए गए 96.965 के रिकॉर्ड निचले स्तर के बेहद करीब है। इसका असर बॉन्ड बाज़ार पर भी दिखा, बेंचमार्क 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड 4 बेसिस पॉइंट चढ़कर 6.82% पर पहुंच गई, जो बताता है कि रुपये के जूझने के बावजूद कर्ज़ की लागत ऊपर की ओर बढ़ रही है। लाइव बाज़ार आंकड़ों के मुताबिक USD/INR इस समय करीब 96.22 पर है, जो पिछले बंद भाव 96.49 से लगभग 0.27% नीचे है, और बीते 52 हफ्तों में यह 85.86 से 97.05 के दायरे में रहा है। 14 दिन का RSI करीब 57 पर है और जोड़ी अपने बोलिंगर बैंड के भीतर बनी हुई है, लेकिन लंबी अवधि का रुझान अब भी धीरे-धीरे कमज़ोर होते रुपये की ओर इशारा करता है।

दुनिया भर में मज़बूत डॉलर

रुपये की यह मुश्किल ऐसे समय आ रही है जब अमेरिकी डॉलर कुल मिलाकर मज़बूत बना हुआ है। ब्रिटिश पाउंड डॉलर के मुकाबले 1.3450 के ऊपर टिका रहा, लेकिन कोई ख़ास मज़बूती नहीं जुटा पाया, क्योंकि कारोबारी अब भी अमेरिका-ईरान तनाव से जुड़ी सप्ताहांत की झड़पों के असर को तौल रहे हैं और उनकी नज़र ब्रिटेन के रोज़गार आंकड़ों पर है। यूरो मध्य पूर्व संकट को लेकर सतर्क निवेशकों के बीच 1.1450 के नीचे एक सीमित दायरे में घूमता रहा, जबकि इसी हफ्ते यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) का ब्याज दर पर फैसला भी आना है। वहीं सोना पिछले हफ्ते की भारी गिरावट के बाद संभलकर 4,000 डॉलर के ऊपर ठहर गया, जिसे बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का सहारा मिला, हालांकि मज़बूत डॉलर और अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों की उम्मीद ने इसकी तेज़ी पर लगाम लगा दी।

क्रिप्टो की चाल और अमेरिकी महंगाई

क्रिप्टो बाज़ार में एथेरियम सबसे आगे रहा। पिछले हफ्ते से बुधवार के बीच इसने दहाई अंकों में बढ़त दर्ज की और बिटकॉइन, XRP तथा सोलाना जैसे बड़े क्रिप्टो को पीछे छोड़ दिया, इससे पहले कि गुरुवार को पूरा बाज़ार नीचे मुड़ जाए। हालांकि इस तेज़ी के पीछे के कुछ आंकड़े बताते हैं कि यह मज़बूती अभी भी नाज़ुक है। कार्डानो अपेक्षाकृत शांत रहा और मामूली उछाल के बाद करीब 0.165 डॉलर पर अटका रहा। शनिवार को इसका वैन रॉसेम हार्ड फोर्क लागू हुआ, जो पूरी तरह ऑनचेन गवर्नेंस के ज़रिए मंज़ूर हुआ कार्डानो का पहला अपग्रेड है और जो स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट की लागत घटाने के मकसद से प्रोटोकॉल वर्जन 11 लेकर आया। दूसरी ओर अमेरिका में महंगाई तेज़ी से नरम पड़ी। जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) महीने-दर-महीने 0.4% गिरा, जो अप्रैल 2020 के बाद की सबसे बड़ी एक-महीना गिरावट है। इससे सालाना दर मई के 4.2% से घटकर 3.5% पर आ गई और लगातार तीन महीने की तेज़ी का सिलसिला टूट गया। कोर कीमतें महीने भर में स्थिर रहीं और साल-दर-साल घटकर 2.6% पर आ गईं, दोनों ही अनुमान से कम।

सवाल-जवाब

भारतीय रुपया क्यों गिर रहा है?
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से आयातकों की डॉलर मांग बढ़ी और बाज़ार की धारणा बिगड़ी, जिससे रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर की ओर फिसल गया।
रिज़र्व बैंक ने क्या किया है?
उसने मुद्रा बाज़ार में दखल देते हुए रुपये को सहारा देने के लिए देश और विदेश दोनों जगह डॉलर बेचे हैं।
रुपया कितना नीचे गिरा?
यह 0.2% तक गिरकर प्रति डॉलर 96.4575 पर आ गया, जो मई के आखिर में छुए गए 96.965 के सर्वकालिक निचले स्तर के करीब है।
अधिकारियों ने और कौन से कदम उठाए हैं?
उन्होंने घरेलू बॉन्ड में विदेशी निवेश के नियम आसान किए और अनिवासी भारतीयों को डॉलर जमा रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
बॉन्ड यील्ड का क्या हुआ?
बेंचमार्क 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड 4 बेसिस पॉइंट चढ़कर 6.82% पर पहुंच गई।
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