सोमवार के कारोबारी सत्र के दौरान भारतीय शेयर बाजारों में चौतरफा बिकवाली का माहौल देखने को मिला, जिससे सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। कमजोर वैश्विक रुझानों, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण निवेशकों का रुख बेहद सतर्क हो गया। इस सुस्ती के चलते प्रमुख बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स में 500 अंकों से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह फिसलकर 76,800 के स्तर से नीचे आ गया। दूसरी ओर, निफ्टी 50 सूचकांक भी 150 अंकों से ज्यादा लुढ़क गया और 24,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर के काफी करीब पहुंच गया।
व्यापक बाजार में व्यापक बिकवाली
यह बिकवाली का दबाव सिर्फ चुनिंदा दिग्गज शेयरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर पूरे बाजार पर साफ तौर पर दिखाई दिया। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के आंकड़ों के मुताबिक बाजार की कुल चौड़ाई बेहद कमजोर रही और बिकवाल खरीदारों पर पूरी तरह हावी नजर आए। एनएसई पर कारोबार के दौरान 1,841 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई, जबकि इसके मुकाबले केवल 966 शेयरों में ही तेजी देखने को मिली। इसके अलावा, 148 शेयरों के भाव में पूरे दिन कोई बदलाव नहीं हुआ और वे स्थिर बने रहे। इस सुस्ती के बीच निफ्टी मिडकैप 100 और निफ्टी स्मॉलकैप 100 जैसे मिडकैप व स्मॉलकैप सूचकांकों में भी 0.8 प्रतिशत तक की गिरावट आ गई।
वैश्विक कारक और फेडरल रिजर्व का रुख
घरेलू बाजार में आई इस कमजोरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजारों का सतर्क रुख एक बड़ा और अहम कारण रहा। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के अधिकारियों की तरफ से आए तीखे बयानों के बाद निवेशकों की चिंताएं काफी बढ़ गईं। इन बयानों से एक बार फिर यह उम्मीदें गहरा गई हैं कि देश में ब्याज दरें लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रह सकती हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर उधार लेने की लागत प्रभावित होगी। इसके अलावा, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें उछलकर 90 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं, जिसने ऊर्जा बाजार को और असहज कर दिया।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, ऐसे में तेल के दामों में होने वाली हर हलचल का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम लगातार ऊंचे बने रहने से देश का आयात बिल काफी बढ़ सकता है, जिसका दबाव अंततः घरेलू मुद्रास्फीति यानी महंगाई पर पड़ना तय है। इसके अलावा, जिन कंपनियों का कामकाज ऊर्जा और ईंधन पर अत्यधिक निर्भर करता है, उनके लिए ये कीमतें बड़ी मुसीबत बन जाती हैं। यदि ये कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक ट्रांसफर करने में असमर्थ रहती हैं, तो उनके मुनाफे के मार्जिन पर गहरा असर पड़ता है।
प्रमुख सेक्टरों में भारी सुस्ती और बिकवाली
कारोबार के दौरान कई बड़े और प्रमुख सेक्टरों में जोरदार बिकवाली का दौर देखने को मिला। निफ्टी मेटल इंडेक्स में लगभग 2 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह इस सत्र का सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाला सेक्टर बन गया। इसके साथ ही, बैंकिंग और टेक्नोलॉजी शेयरों पर भी निवेशकों का दबाव साफ महसूस किया गया। निफ्टी पीएसयू बैंक और निफ्टी आईटी सूचकांकों में भी 1 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई।
आईटी सेक्टर और विदेशी बाजारों का दबाव
आईटी शेयरों को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहां की ब्याज दरों से जुड़ी चिंताओं के कारण अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़ा। भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों को अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों, खासकर अमेरिका से प्राप्त होता है। ऐसे में अमेरिकी आर्थिक वृद्धि की रफ्तार को लेकर कोई भी अनिश्चितता या वहां की कंपनियों के तकनीकी खर्च में कटौती सीधे तौर पर इस सेक्टर के प्रति निवेशकों के sentiment को कमजोर कर देती है।
सेंसेक्स के दिग्गज शेयरों का हाल
सेंसेक्स में शामिल प्रमुख कंपनियों में से इंफोसिस, एनटीपीसी, टाटा स्टील और इंडिगो के शेयरों में लगभग 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा पावर ग्रिड, एशियाई पेंट्स, एचसीएल टेक, अडानी पोर्ट्स, लार्सन एंड टूब्रो, अल्ट्राटेक सीमेंट और टीसीएस के शेयर भी 1 प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ कारोबार कर रहे थे। हालांकि, बाजार में हर तरफ गिरावट का माहौल नहीं था, क्योंकि कुछ चुनिंदा शेयरों ने इस दबाव के बीच भी खुद को संभाले रखा।
चयनित शेयरों में खरीदारी का सीमित समर्थन
गिरावट के इस माहौल में एचडीएफसी बैंक के शेयरों में लगभग 2 प्रतिशत की तेजी देखने को मिली, जिससे बेंचमार्क सूचकांकों को कुछ हद तक जरूरी समर्थन मिला। इसके साथ ही एटरनल के शेयर में भी 1 प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की गई। हालांकि, कुछ चुनिंदा बड़े शेयरों में आई यह मामूली तेजी बाजार में फैली व्यापक बिकवाली के असर को बेअसर करने के लिए नाकाफी साबित हुई। कमजोर बाजार चौड़ाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि निवेशक किसी एक क्षेत्र विशेष तक सीमित रहने के बजाय बाजार के कई अलग-अलग सेगमेंट में अपनी हिस्सेदारी और जोखिम को कम कर रहे हैं।



















